Saturday, November 18, 2023

एक दलित बस्ती की कथा कैथ का पेड़ अपना गांव

 एक दलित बस्ती की कथा कैथ का पेड़ अपना गांव 

आज की इस इस कहानी में कटु सत्य का सामना करना पड़ेगा इस कहानी में जूठन के कड़वे सच और दलित जाटव की दर्दनाक घटना का सामना भी इस वीडियो में सुनने को मिलेगा

एक दलित बस्ती की कथा कैथ का पेड़ 

डॉ. आंबेडकर का मत था कि किसी भी जाति के लोग अपनी इच्छा से जूठन और मरे हुए जानवर का सड़ा मांस नहीं खाते थे। दलित जाति के लोग अगर जूठन और मरे हुए जानवर का सड़ा मांस खाते थे, तो इसलिए कि उसे स्वच्छ खाना और ताजा मांस उपलब्ध नहीं होता था। उन्हें स्वतंत्र जीविका के अवसरों से वंचित और जीवित रहने के लिए पराश्रित बनाकर रखा गया था। 

बुद्ध ने जन्म को भी दुख कहा है और मरण को भी। मैं नहीं जानता कि बुद्ध ने सही कहा है या गलत? पर, आज जब मैं पीछे मुड़कर अपनी बस्ती के लोगों को देखता हूं, तो बुद्ध मुझे गलत दिखाई नहीं देते। हमारे लोगों का संपूर्ण जीवन दुख से शुरू होता था और दुख में ही खत्म हो जाता था। वे कीड़े-मकोड़ों की तरह पैदा होते थे और कीड़े-मकोड़ों की तरह ही मर जाते थे। उनका जन्म भी दुख था और मरण भी। शायद बुद्ध को यह संबोधि ऐसे ही श्रमिक लोगों को देखकर प्राप्त हुई होगी। पर इन दुखी श्रमिकों में भी, जो रोज थोड़ा-थोड़ा मरता था गजब की उत्सवधर्मिता थी। वे दुखी थे, पर दूसरों का दुख बांटते थे। वे असहाय थे, पर सबकी सहायता करते थे। वे, हर्ष-शोक, सब मिलकर मनाते थे।




आती थीं। यह समझ में आता है कि औरत की गणना पितृसत्ता में अंत में ही होती है, पर पत्तलों और कुल्हडों के होते हुए उनका अपने बर्तनों को लेकर आने का कारण यह था कि उनकी पंगत नहीं लगती थी, वे सब एक कमरे में समा जाती थीं और थाली को घुटनों पर रखकर या हाथ में लेकर अपने छोटे बच्चों के साथ खाती-खिलाती थीं। वे बचे हुए खाने को साथ में भी ले जाती थीं, जबकि मर्द ऐसा नहीं कर सकते थे। खैर, बहुत बार ऐसा भी होता था कि औरतों का नंबर आने तक अक्सर कोई सब्जी या कोई अन्य आईटम कम पड़ जाता था या खत्म हो जाता था। तब बेचारी उन औरतों को ही या तो फिर से बनाना पड़ता था या जो उपलब्ध होता था, उसी से काम चलाना पड़ता था। इसी समय परोसने वाले सेवक भी खाना खाते थे। वे परोसते भी थे और इस अवसर का लाभ उठाते हुए अपनी दिलकश भाभियों के साथ हंसी-मजाक भी कर लेते थे। वे भाभियां भी उसका लाभ उठाते हुए उनसे लड्डुओं का अतिरिक्त भोग लगवा लेती थीं। माहौल कुछ ऐसा हो जाता था कि कुंवारे देवरों को भाभियों से नसीहत भी मिल जाती थी। कोई-कोई तो यहां तक कह देती थी कि ‘देवर जी, जल्दी शादी कर लो, तुम्हाए बच्चे पिछाए होते जा रए हैं।’ उन देवरों के पास जवाब भी तैयार रहता था। तुरंत कहते, ‘भौजी, कोई तुम जैसी मिलै तो कर लूं।’ कोई कहता, ‘भाभी अपनी भैन से करा दो न, मेरी शादी!’ इसी हंसी-मजाक में औरतों का भी खाना निबट जाता।


लेकिन ऐसे सभी अवसरों का एक घृणित, मार्मिक और हृदयविदारक दृश्य भी मेरी स्मृतिपटल पर साथ-साथ चलता है, जो भुलाए नहीं भूलता। यह दृश्य जूठन बटोरने का है। जिन जूठी पत्तलों को उठाकर बाहर घूरे पर फेंका जाता था, वहां उनमें से जूठन निकालने के लिए एक मेहतर परिवार कुछ बर्तन लिए बैठा होता था। उनके साथ ही मुहल्ले के कुत्ते भी खड़े होते थे। जब पत्तलें फेंकी जातीं, तो कुत्ते उन पर टूट पड़ते थे, जिन्हें वे मेहतर अपने डंडे से भगाकर उन पत्तलों पर से बची हुई पूड़ी और सब्जी को अपने बर्तनों में अलग-अलग रखना शुरु कर देते थे। उनका यह सिलसिला अंतिम पंगत के खाना खाने तक चलता था। जूठन बटोरने की यह प्रथा पूरे शहर के मेहतरों में प्रचलित थी। मेरी शादी 1975 में हुई थी, और 1975 तक मैंने इस प्रथा को देखा था। ये मेहतर उसी मुहल्ले में इस प्रथा को अंजाम देते थे, जो उनके ठिकाने में आते थे। दलित लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपनी आत्मकथा ‘जूठन’ में इस प्रथा का जो चित्रण किया है, वह अक्षरशः सत्य है। दलित लेखक सूरजपाल चौहान ने तो अपनी आत्मकथा ‘तिरस्कृत’ में जूठन से भरी बाल्टी को अपने सिर पर ढोने की बेबसी का भी चित्रण किया है। 

 अगर किसी नौते पर विवाद होता, तो उसका निबटारा पुरानी कॉपियों में देखकर किया जाता था। अक्सर विवाद उतारू नौते पर होता था। अगर कोई उतारू में दो या एक रुपया कम नौता लिखवाता, तो वहां मौजूद कन्या या वर का पिता अपनी कॉपी देखकर कहता कि उसने तुम्हारी फला लड़की की शादी में, जो फला तारीख को हुई थी, पांच रुपए नौते में चढ़ाऊ दिए थे। कॉपी देखकर उसे भी बात माननी पड़ती थी। कॉपी का लिखा ही सही माना जाता था। इसमें भूल-चूक तो हो जाती थी, पर बेईमानी एक पैसे की भी नहीं होती थी। नौते की यह परंपरा विवाह में आर्थिक सहायता का एक अतिरिक्त स्रोत थी। आर्थिक सहायता का एक अन्य स्रोत ‘भात’ की परंपरा भी थी, जो आज भी है। इस परंपरा में वर या कन्या की माता के मायके से नकदी और कपड़ों के रूप में मदद आती थी। आम तौर से यह भाईयों की ओर से अपनी बहिन की सहायता होती है। नौता उतारू के रूप में लौटाना होता था, पर भात नहीं लौटाया जाता। उन दिनों नौते की रकम रुपए-दो रुपए की ही होती थी। उस दौर में यह रकम भी बहुत थी। यह एक आदमी की दिनभर की मजदूरी होती थी। इस रस्म से पांच-छह सौ रुपए इकट्ठे हो जाते थे, जो सस्ती की उस दौर में काफी मायने रखते थे।

विवाह और नौते में सामुदायिकता का यह भाव अब दिखाई नहीं देता। एक तरह से सहकारिता पर आधारित यह व्यवस्था अब पूरी तरह खत्म हो गई है।


यही सामुदायिकता और सहकारिता की भावना मृत्यु के अवसर पर भी देखी जाती थी। विवाह के सद्दे की खबर की तरह ही मृत्यु की खबर भी सातों मुहल्लों में भिजवाई जाती थी। जिस बस्ती में मौत होती, उसकी खबर सभी बस्तियों में भेजने के लिए एक आदमी को भेजा जाता। वह न सिर्फ यह खबर देता कि फलां मुहल्ले में गमी हो गई है, बल्कि मरने वाले का नाम और मैयत या मिट्टी उठने का समय भी बताता था। खबर सुनकर लोग अपने काम से जल्दी उठ जाते और समय से पहले ही गमी वाले घर पहुंच जाते थे। जो समय पर नहीं आ पाते थे, वे सीधे श्मशान पर पहुंचते थे। मृतक के घर के पास एक खाली जगह पर दरियां बिछा दी जाती थीं, जिन पर लोग आकर बैठते जाते थे। उनके बीच में एक-दो हुक्के और कुछ बीड़ी के बंडल व माचिसें रख दी जाती थीं। हर बस्ती में कुछ लोग थे, जो अर्थी को बांधने में निपुण होते थे। उन्हीं लोगों को अर्थी बांधने का काम सौंपा जाता था। कफन अन्य सामग्री को छोड़कर अर्थी का सामान कुम्हारों के यहां से लाया जाता था, जिनमें बांस, फूंस, खपच्चियां होती थीं। कफन बाज़ार जाकर कपड़े की दुकान से लाया जाता था। यह भी नियम था कि जिस घर में मौत होती थी, उस घर का सदस्य कफन आदि सामग्री लेने नहीं जाता था। पर खर्चा सारा अंतिम क्रिया का मौत वाला वही परिवार करता था। अगर वह परिवार बहुत गरीब होता, तो अंतिम क्रिया का सारा इंतजाम परस्पर सहयोग से इतनी आसानी से हो जाता था कि पता ही नहीं चलता था। यह सामुदायिकता थी बस्ती में। अमूमन शाम को चार बजे तक अर्थी उठ जाती थी। इसके बाद रात में अंतिम संस्कार नहीं किया जाता था।


रामपुर की कोसी नदी के तट पर बने श्मशान घाट तक शवयात्रा पैदल ही जाती थी। आज यह श्मशान घाट बहुत ही खूबसूरत और मनमोहक ‘स्वर्गधाम’ बना दिया गया है, जहां आराम से बैठाकर बतियाया जा सकता है। पर तब वह एक डरावना स्थल होता था। जब तक चिता जलती, तब तक सभी लोगों को खड़े रहना ही पड़ता था। जब चिता में आग लग जाती, तो उपस्थित लोगों की गणना की जाती थी, और यह पता लगाया जाता था कि किस मुहल्ले और किस घर से गमी में कौन नहीं आया है। उस अनुपस्थित व्यक्ति पर उसी वक्त अर्थदंड लगाया जाता था। अगर कोई व्यक्ति गमी के अवसरों पर लगातार अनुपस्थित रहता था, तो उसका हुक्कापानी बंद कर दिया जाता था, अर्थात् सामाजिक बहिष्कार। इसलिए कुछ लोग, जो किसी कारण से खुद नहीं आ सकते थे, दंड से बचने के लिए अपने लड़के को भेज दिया करते थे। ऐसी थी सामुदायिकता! जब घर से श्मशान तक शवयात्रा गुजरती थी, तो कम-से-कम उसमें डेढ़-दो सौ लोग शामिल होते थे।

एक दिन मैंने देखा कि कारखाने के अंदर एक कारीगर मुर्गा बना हुआ है और उसके ऊपर दो ईंटें रखी हुई हैं। मैं उस समय 14-15 साल का रहा होऊंगा, स्कूल में ऐसे दृश्य देख चुका था, इसलिए किसी के मुर्गा बनने का मतलब अच्छी तरह जानता था। मैं डर गया। मेरे पिता ही नहीं, वहां के सभी कारीगरों के चेहरों पर डर साफ दिखाई दे रहा था। कंवल भारती द्वारा लिखित आत्मकथात्मक शृंखला का अंतिम भाग

. आंबेडकर ने अपने लेख ‘हेल्ड एट बे’ में लिखा है कि “जब सवर्ण और दलित मिलते हैं, तो वे मनुष्य से मनुष्य के रूप में नहीं मिलते, बल्कि परस्पर दो भिन्न समुदायों के रूप में या दो भिन्न राज्यों के नागरिकों की तरह मिलते हैं।” दुखद रूप से यह आज भी सच है। यह यथार्थ सिर्फ गांवों का ही नहीं है, शहरों का भी है। शहर में भी एक और शहर पीड़ितों, उपेक्षितों और दलितों का होता है। इस पृथक शहर के साथ किसी की कोई सहानुभूति नहीं होती है। हम कह सकते हैं कि वे सदैव अजनबियों की तरह जीते हैं। एक ही शहर में रहने वाले एक समुदाय के लोग सड़क पार करते ही दूसरे समुदायों के लिए अजनबी हो जाते हैं। डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि गांवों में दलित जातियों के लोग इसलिए सामाजिक बहिष्कार के शिकार होते हैं, क्योंकि वे परंपरा के विरुद्ध खड़े होते हैं। सामाजिक बहिष्कार और अत्याचारों के कारण ही वे गांव छोड़कर शहरों में जाकर बसते हैं। लेकिन यह पलायन गांवों में ही नहीं होता, बल्कि शहरों में भी होता है। वह परिस्थिति बहुत पीड़ादायी होती है, न केवल विस्थापितों के लिए, बल्कि उनके प्रियों के लिए भी। एक बार बहुजन नायक कांशीराम ने दलित विस्थापितों पर बहुत ही सही सवाल उठाया था। उन्होंने कहा था कि भारत सरकार सिर्फ कश्मीरी पंडितों की चिंता करती है, जिन्होंने आतंकवाद से बचने के लिए विस्थापन किया था। वह उनके लिए दिल्ली में पुनर्वास मंत्रालय कायम करती है, पर उसे उन लाखों विस्थापित दलितों की कभी चिंता नहीं हुई, जो दबंगों, सूदखोरों और जमींदारों के आतंक से बचने के लिए अपनी जड़ों से उखड़ते हैं। क्या उनके लिए कोई मंत्रालय सरकार ने कायम किया?

इस अंतिम भाग में मैं इसी विस्थापन पर बात करूंगा, जिसकी यादें आज भी शूल-सी चुभती हैं। अभी पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बहुल क्षेत्र कैराना में कुछ हिंदुओं के पलायन पर नेताओं ने बहुत हो-हल्ला मचाया था। उसके पीछे वोट की राजनीति थी। वोट की राजनीति तो सत्तर के दशक में भी थी, पर उसे दलितों की चिंता नहीं थी। उस समय भी मीडिया के अपने सामाजिक-राजनीतिक सरोकार थे। इसलिए, हमारी बस्ती के जाटवों का विस्थापन किसी के लिए भी चिंता का विषय नहीं बन सका था। मैं भी आज आधी सदी के बाद उसे इतिहास में इसलिए दर्ज कर रहा हूं, क्योंकि कबीर साहेब के शब्दों में वह मुर्दों का गांव था– संवेदनहीन, पाषाणतुल्य, प्रतिरोध-विहीन, घोर अशिक्षित और घोर दयनीय। हालांकि, औरतें प्रतिरोध-विहीन नहीं थीं, वे खूब विरोध करती थीं और लड़ती भी थीं, लेकिन, मर्द उन्हें, पता नहीं क्यों, चुप करा देते थे। इसलिए वे लोग पलायन या विस्थापन को समाज-व्यवस्था से जोड़कर नहीं देखते थे, बल्कि उसे अपने नसीब का खेल समझते थे।


चूंकि हिंदू समाज व्यवस्था में दलित-पिछड़ी जातियों के सारे काम-धंधे पैतृक समझे जाते हैं, इसलिए हमारी बस्ती के जाटव दूध या सब्जी बेचने-जैसा कोई काम नहीं कर सकते थे, क्योंकि अगर वे ऐसा करते, तो कोई भी उनसे यह सामान नहीं खरीदता। इसी का फायदा कारखाना-मालिक और साहूकार उठाते थे। मैं पीछे लिख चुका हूं कि कारखाना-मालिक कारीगरों को उधार में कच्चा माल देकर अपने कारखाने में ही उनसे जूते तैयार करवाते थे, और वही जूते वे उनसे सस्ते में खरीद कर अपना उधार काटकर, जो धन बचता था, वह उन्हें दे देते थे। कच्चा माल और जूते की कीमत कारखाना-मालिक ही तय करते थे। इस जाल में सारा लाभ मालिकों को ही मिलता था, कारीगरों के हाथ में उतना पैसा भी नहीं आता था, जिससे वे हफ्ते भर की दाल-रोटी चला लेते, या घर की कोई और जरूरत पूरी कर लेते। शोषण के इस जाल को वे इस खूबसूरती से बुनते थे कि उन भोले-भाले कारीगरों का उसे समझना मुश्किल था। फिर भी किसी प्रकार दाल-रोटी तो उनकी चल जाती थी, एकाध वक्त चूल्हा नहीं भी जलता था, तो उसे वे भगवान की मर्जी मानकर सब्र कर लेते थे, लेकिन इसके सिवा भी जीवन-निर्वाह की जरूरतें थीं, हारी-बीमारी थी, तीज-त्योहार थे, बरसात से पहले घर की मरम्मत और बच्चों के शादी-ब्याह की चिंता थी। हालांकि बच्चों की पढ़ाई-लिखाई उन गरीबों की भी चिंता में नहीं थी, पर जिनकी चिंता में थी, उनके लिए घर चलाना और भी मुश्किल होता था। इन सारी जरूरतों को वे कर्ज लेकर पूरा करते थे, जो वे बनियों से लेते थे या अपने कारखाना-मालिकों से। कुछ लोग दोनों से कर्ज लेते थे। और उनकी पूरी जिंदगी उस कर्ज को चुकाते हुए ही गुजर जाती थी। वे बनिए का ब्याज देते रहते थे, और कारखाना-मालिक का तो जाल ही इतना मजबूत था कि वे उसमें बंधे रहते थे। ऐसे लोग इज्जत की नहीं, जिल्लत की जिंदगी जीते थे। कारखाने का मालिक और बनिए का मुनीम उनके साथ गारी-गुफ्तारी (गालियां) से लेकर मारपीट तक करता था।

 कुछ दिन काम करके उसने वहां के माहौल से डरकर काम छोड़ दिया था। इस अपराध की उसे भारी सजा दी गई। उसे पकड़कर कारखाने में लाया गया, और मुर्गा बनाकर उसके नीचे मोमबत्ती जला दी गई। जब मोमबत्ती की लौ उसके चूतड़ को जलाने लगी, तो उसकी चीखें शटरबंद हॉल के अंदर से बाहर तक जा रहीं थीं। पर, राह चलते किसकी हिम्मत थी कि वह शटर खुलवा कर देखता कि अंदर क्या हैवानियत चल रही थी? 


इस हैवानियत ने जाटवों के दिलों पर जख्म तो कर दिए थे, लेकिन उनमें विरोध करने का साहस नहीं हो रहा था। सबकी अपनी-अपनी कमजोरियां थीं, और सब ही उसके कर्जदार थे। वे कर्जा चुका नहीं सकते थे और कर्जे की राजनीति को जानते नहीं थे। वे पहली पीढ़ी के लोग थे, जिनकी दूसरी पीढ़ी भी उन जैसी ही थी, पर उसके अचेतन में गुस्सा जरूर जमा हो रहा था। फिर भी बिरादरी के कुछ जिम्मेदार लोग इस घटना पर विचार करने के लिए हमारी बस्ती में नेतराम के घर में इकठ्ठा हुए। इनमें बन्नीराम, रामसरन, प्यारेलाल, मुरारी लाल, नत्थूलाल और मेरे बाप थे। मेरे बाप ने धूमी खां से बात करने का सुझाव रखा था। वह हमारे मुहल्ले के करीब ही घेर नज्जू खां में रहते थे और कांग्रेस के नेता थे। पर रामसरन बोले, “हमें बात को बढ़ाना नहीं है। हमें इशरत मियां से जाकर शिकायत करनी चाहिए।” पर किसी ने भी यह कहने का साहस नहीं किया कि इस हैवानियत की रिपोर्ट प्रशासन में जाकर करनी चाहिए। अगर वे उस दिन पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की हिम्मत कर लेते, तो, भले ही ताकत के सामने वे हार जाते, पर जाटवों के प्रतिरोध का इतिहास बन जाता। लेकिन, जब मैंने अपने बाप से पूछा, “इशरत मियां ने क्या इंसाफ किया था?” तो उनका जवाब था कि “इशरत मियां के पास कोई गया ही नहीं था।” इतना खौफ था, उस समय के जाटवों में, कि अपने ऊपर हो रहे जुल्म का बदला लेना तो दूर, उसकी शिकायत भी वे नहीं कर सकते थे। लेकिन बाप ने बताया कि उस घटना के बाद, फिर कोई कारीगर वहां काम करने नहीं गया था, और वह कारखाना बंद हो गया था। यह भी एक प्रतिरोध ही था।

साथियों इस कहानी में इतना ही है आप सभी का वीडियो देखने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया जय भीम नमस्कार साथियों 


No comments:

Post a Comment