Friday, September 15, 2023

अछूत एक चमार की कहानी || अछूत चमार और पंडित || चमारों की कहानी #चमार

 अछूत एक चमार की कहानी || अछूत चमार और पंडित || चमारों की कहानी #चमार

सभी साथियों को हमारी ओर से जय भीम जय बहुजन जय संविधान बाकि जिसको जो पसंद हो हमारी ओर से स्वीकार करें  साथियों आज की इस कड़ी में हमने अछूत कहानी को सामिल किया है जो एक गरीब चमार की कहानी है यह कहानी बड़ी ही मार्मिक ह्रदयस्पर्शी, हृदयविदारक घटना पर आधारित है जिसे सुनकर  आप भी शॉक्ड हो जायेंगे मेरे हिसाब से इस कहानी को आप पूरा सुने तो ज्यादा अच्छा होगा बाकि आपकी मर्जी है साथियों 

साथियों इस कहानी में बताई गई घटना से हजारों सालों से लेकर वर्तमान समय में भी यह सब देखने को मिलता है साथियों  अछूत कही जाने वाली सभी जातियों में सबसे ज्यादा उत्पीड़ित जाति है जो आज भी हर वर्ग के निशाने पर रहती है  

चाहे गलती किसी दूसरे की ही क्यों ना हो 

लेकीन कमी हमेशा हमारे समाज के लोगों की ही निकलती है हमारे समाज के लोग चाहे नौकरी करते हों या फिर कोई काम धंधा करते हो उसी स्थान पर उनके साथ आज भी भेदभाव देखा जाता है और उनका लगातार उत्पीडन किया जाता है या तो वो खुद ही काम छोड़कर भाग जायेगा या उस पर तरह तरह के इल्जाम लाग दिए जाते रहे है ताकि वह अपना काम छोड़कर चला जाए कई बार ऐसे मामले देखने को मिलते है जिसकी वजह से दुखी होकर बहुत से दलित भाइयों ने अपनी जान तक दे दी या फिर उनकी जान तक ले ली गई  

साथियों मैंने भी इस तरह की प्रताड़ना को झेला है  साथियों तो चलो कहानी शुरू करते है और समझते है कि क्या वास्तव में चमार इसी तरह की घृणा और नफरत का शिकार हमेशा होता रहेगा जो नफरत की इस खाई को इन्होंने खड़ा किया है उसे भरने का काम कौन करेगा कौन लोग इसके जिम्मेदार है जो इस तरह की बदसलूकी और अत्याचार करने का काम करते है क्या ये लोग जातिवादी मानसिकता के शिकारी नही है तो और क्या है जानिए इस वीडियो में 

साथियों                       

अछूत कहानी एक ऐसे पंडित ब्राह्मण सेठ की कहानी है, जिसके यहाँ काम करते हुए एक चमार जाति के मज़दूर की जान चली जाती है। चमार मज़दूर के मरने पर सेठ क़ानूनी कार्रवाई से बचने के लिए आनन-फ़ानन में उसकी लाश को अपने यहाँ से उठवा देता है। एक दिन की बात है 

शकुरवा चमार अपनी झोंपड़ी में बैठा नारीयल पी रहा था। पास में ही उसका इकलौता लड़का ‘बेनी’ खेल रहा था। बेनी के सिवा शकुरवा का इस दुनिया में कोई न था। वही लड़का अब उस के बुढ़ापे का सहारा था। दिन-भर मेहनत मज़दूरी से जो कुछ मिल जाता था उसी में दोनों का ख़र्च चलता था। लेकिन दो दिन से वो गांव के ज़मींदार पण्डित राम प्रशाद के यहां बेगार यानि मजदूरी  कर रहा था। ज़मींदार को सरकार ने राय साहिब के ख़िताब से नवाजा था। 

जिसकी ख़ुशी में जश्न मनाया जा रहा था। दिन-भर की  बेगार यानि मजदूरी से फ़ुर्सत पाकर थोड़ी ही देर में शकुरवा ने अपनी झोंपड़ी में जब क़दम रखा था।तो बेटे बेनी ने बाप के गले से लिपट कर कहा, “बाबा मुझको नई धोती मंगा दो ना” 


शकुरवा ने ठंडी सांस भर कर कहा, “मालिक के यहां  काम ख़त्म हो जाये और कुछ इनाम मिले तो उसी से तुझको धोती मंगा दूंगा।” बेनी ने बाल हट से काम लिया, नही नही  मैं तो अभी लूँगा। मालिक के यहां सब लोग अच्छे-अच्छे कपड़े पहनते हैं। मैं भी पहनूँगा।” 


शकुरवा ने कहा, “पागल न बन हम ग़रीब है वो लोग अमीर है। हमारा उनका क्या मुक़ाबला?” बेनी ने भोलेपन से कहा, “हमें ग़रीब और उनको अमीर किस ने बनाया है?” 


शकुरवा ने क़हक़हा मार कर कहा, “तू बड़ा पागल है। भगवान बनाता हैं और कौन बना सकता है!” 

साथियों बच्चें को क्या मालूम होता है कि अमीर गरीब क्या होते है। साथियों कड़ी मेहनत लगन और परिश्रम के बल पर इंसान इस गरीबी को अपने जीवन से दूर कर सकता है इसके पीछे किसी भगवान का कोई हाथ नहीं होता है भगवान नाम से तो केवल पांडे पुजारी या ब्राह्मण लोग ही अमीर होते है बाकी सबको  

परिश्रम करना पड़ता है  लेकिन पिता अपने बच्चे को कैसे समझा सकता है

 साथियों 

बच्चा बेनी अपनी मासूमियत से बोला     

“तो भगवान ने हमको अमीर क्यों नहीं बनाया?” 


“अब राम जानें पिछले जन्म में हमसे कोई ग़लती हो गई होगी। उसी की सज़ा मिली है।” 


“अगर भगवान हमसे ख़ुश हो जायें तो क्या वो हमको अमीर कर देंगे?” 


“और नहीं तो क्या? भगवान के हाथ में तो सब कुछ है।” 


“ तो भगवान कैसे ख़ुश होते हैं?” 


“पूजापाट से।” 


“तो हम पूजापाट करेंगे।” 


“लेकिन हम मंदिर में नहीं घुस सकते।” 


“क्यों?” 


“हम लोग अछूत हैं। पण्डित लोग कहते हैं कि हमारे घुसने से मंदिर नापाक हो जाएगा।” 


“तो क्या, भगवान मंदिर में ही रहते हैं और कहीं क्यों नहीं?” 


“नहीं भगवान तो हर जगह हैं।” 


“तो मैं भी अपनी झोंपड़ी में एक छोटा सा मंदिर बनाऊँगा और भगवान की पूजा किया करूँगा।” 


“लेकिन बग़ैर किसी पण्डित की मदद के पूजा नहीं मानी जाएगी।” 


बेनी का दिल टूट सा गया और इससे ज्यादा कुछ और पूछ ही न सका।

 इतने में किसी ने बाहर से आवाज़ दी, “अबे शकुरवा!” बाहर निकल 

शकूरवा ने बाहर निकलकर देखा कि ज़मींदार का प्यादा,

बाहर दाता दीन खड़ा है। शकुरवा ने अदब से पूछा, “महाराज का हुक्म?” 

तुम्हे मालिक ने बुलाया है 

“अबहिन, हाँ अभी!” 


“सरकार अभी  तो दिन-भर की बेगार से वापस आया हूँ।” 


“मैं कुछ नहीं जानता। मैंने तुझे मालिक का हुक्म सुना दिया है। अगर तू अभी स्टेशन पर नहीं जायेगा तो फिर तेरी ख़ैर नहीं।” ये कह कर महाराज दाता दीन तो अकड़ते हुए चल गए और शकुरवा आसमान की तरफ़ हसरत से देखता रह गया। दिन-भर बेगार में रहा। समझता था कि रात को आराम मिलेगा, मगर ग़रीबों की क़िस्मत में आराम कहाँ? कुछ चने अपने बेटे बेनी को देकर उसे गुदड़ी पर लिटा दिया और ख़ुद स्टेशन की तरफ़ रवाना हो गया। 


राय साहिब राम प्रशाद के मकान के सामने एक आ’लीशान शामियाने में पंडितों को भोज दे रहा था। पण्डित कौन थे? जो बाहर से आए हुए ग़रीब ब्रह्मन बने हुए थे, लेकिन जिनके घरों में सोना बरसता था। जो दा’वतें खा-खा कर इतने मोटे हो गये थे कि दो क़दम चलना भी मुश्किल था। इसी तरह के ब्राह्मण आज ता’ल्लुक़ेदार के यहाँ आव भगत सत्कार से मिठाईयां खा रहे थे। उनसे  चंद दूर भूखों मरने वाले बेगारी मज़दूर 

जिन्हें पंडितों ने अछूत का ख़िताब दे रखा है, हसरत भरी नज़रों से पंडितों की तोंद को देख रहे थे। 


शकुरवा चमार को रात-भर स्टेशन पर रहना पड़ा। वो थोड़ी देर बाद  मेहमानों का सामान लेकर गांव में वापस आया था, और अब तक उसे घर जाने की इजाज़त न मिली थी। वो एक तरफ़ लंगोटी बाँधे चुप-चाप खड़ा था कि एक तिलक धारी पण्डित शिबू शंकर लुटिया में गंगा जल लिये खड़ाऊँ पहने राम-राम की माला जपते हुए उस तरफ़ से निकले। ज़मीन कुछ ऊंची नीची थी। पंडितजी लड़खड़ाए और उनका बदन शकुरवा चमार से छू गया। बात मा’मूली थी। पंडितजी अपने घर की मरम्मत अछूतों से ही कराते थे। महराजिन का डोला यानि स्त्रियों की एक सवारी जिसे कहार  और कहीं कही चमार भी  ढोते हैं ,  लेकिन इस वक़्त उनके हाथ में गंगा जल था। वही गंगा माई का जल जिससे सारी दुनिया सैराब यानि कि जलथल होती है। जिसमें भंगी, चमार, ब्राहम सब स्नान करते हैं। वही ब्राह्मण गंगा जल लुटिया में भर कर ख़ुद को देवता से भी बढ़कर समझने लगे। ग़लती थी अपनी लेकिन क़सूर बताया गया था शकुरवा चमार का। जब उसने पंडितजी को अपने पास से गुज़रते हुऐ देखा तो हटा क्यों नहीं। भरी सभा में उसने जान-बूझ कर पंडितजी की बैजती की है  अब उनको फिर से स्नान करना पड़ेगा। इसी किस्म की बातें सोच कर पंडितजी शकुरवा चमार पर बरस पड़े।“ पापी चण्डाल। बदमाश है तू”पूरी तरह से ग़रज़ कर पंडितजी को जितनी गालियां याद थीं वो सुना कर ख़त्म कर दीं। ता’ल्लुक़ेदार साहिब सौर सराबा सुनकर दौड़े आये और पंडितजी से पूछा, “महाराज क्या बात है?” 


महाराज ने बिगड़ कर कहा, “जहां पंडितों को भोज दिया जाता है वहां चमारों का क्या काम? देखिए  इस पापी ने जान-बूझ कर मुझे छू लिया। अब आप ही बताईए मुझे ग़ुस्सा क्यों न आये। राम-राम! आपने चमारों को बहुत सर चढ़ा रखा है।” महाराज के आख़िरी जुमले ने ता’ल्लुक़ेदार को आग बगूला कर दिया। उन्होंने शकुरवा चमार से पूछने की ज़रूरत ही न समझी। प्यादे को इशारा कर दिया कि “मार साले को,” वहां तो हुक्म की देर थी। शकुरवा भूख  के मारे यूंही मरा जा रहा था। मार पड़ी तो ज़मीन पर गिर कर लोटने लगा। प्यादे ने समझाया कि तूने ऐसा क्यों किया  तुझे पंडित से दूर हटना था  उसने कस कर शकुरवा चमार को एक जोर की लात दे मारी। चोट तली पर लगी और वो फट गई और देखते ही देखते शकुरवा ने दम तोड़ दिया। जश्न में ऐसी बदशगुनी यानि अपशगुन हुआ , कि सब लोग बहुत घबरा गये। थोड़ी देर के लिए ता’ल्लुक़ेदार साहिब भी परेशान हो गये। उनको इसका तो कोई गम और डर ना था कि एक ग़रीब की हत्या हो गई। बल्कि इसका सदमा था कि कम्बख़्त आज ही क्यों मरा। सब ब्रह्मण खा पी चुके थे, वो सब राम-राम कहते हुए चलने के लिए तैयार हो गये। वो ऐसे पाप की जगह पर कैसे रह सकते थे। बिरादरी उनको छोड़ देती। लेकिन ता’ल्लुक़ेदार के पास पंडितों को राम राम करने का नुस्ख़ा मौजूद था। लक्ष्मी देवी उन पर मेहरबान थीं दौलत मंद जो ठहरे थे । ऐसी सूरत में उन्होंने चमारों को बुला कर हुक्म दिया कि “शकुरवा की लाश को ले जा कर फ़ौरन जला दो।” साथ ही धमकी दी कि अगर किसी ने पुलिस में मार पीट की ख़बर दी तो उसके हक़ में अच्छा न होगा। 


शकुरवा को मरे बीस साल हो चुके थे। ता’ल्लुक़ेदार राय साहिब राम प्रशाद ज़िंदा थे। लेकिन जीवन के इस अंतिम मोड़ पर यानि बुढ़ापे की उम्र में भी जब परगने का हाकिम उनके इ’लाक़े में आता तो राय साहिब फ़ौरन हाकिम के सलाम के लिए हाज़िर होते। एक दिन राय साहिब ने सुना कि एक नये हाकिम मिस्टर डेविड उनके इलाक़े में आये हैं। फ़ौरन पड़ाव पर पहुंचे। सबसे पहले पेशकार से मिले। वो राय साहिब के पुराने सलाह मशविरा देने वालों में से एक था  उसने राय साहिब से कहा, “ये साहिब रईसों से बहुत कम मिलते हैं। आप उनसे ना मिलें तो बेहतर है।” 


“तो क्या मुझसे भी न मिलेंगे?” 


“नहीं आप जैसे रईस से तो ज़रूर मिलेंगे लेकिन जैसा कि मैं अ’र्ज़ कर चुका हूँ। उनसे मिलकर आपकी तबीयत ख़ुश न होगी।” 


“मैंने तो सुना है कि ये नीच ज़ात वालों से भी मिलते हैं। फिर मुझसे क्यों न मिलेंगे।” 


“हाँ ये साहिब अछूतों से बहुत मिलते हैं और उनको कुर्सी पर बिठाते हैं लेकिन रईसों से सीधे मुँह बात भी नहीं करते।” 


“ईसाई है ना, लेकिन अब तो मैं आ गया हूँ, मिल कर ही के जाऊँगा। मेरी इत्तिला  तो कर दीजिए ।” 


“जैसे आपकी मर्ज़ी।” इतना कह कर पेशकार, डेविड साहिब के खे़मे में दाख़िल हुआ और इत्तिला की हजूर राय साहिब राम प्रशाद मिलने के लिए आये हैं। 


डेविड साहिब ने कुछ सोच कर कहा, “अच्छा अंदर भेज दो।” राय साहिब ने खे़मे में दाख़िल हो कर निहायत अदब से साहिब को झुक कर सलाम किया और फिर हमेशा की तरह, रीति के अनुसार, दस्तूर के हिसाब से  हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़े लेकिन डेविड साहिब ने उनसे हाथ न मिलाया और कहा, “मा’फ़ कीजिए मैं आप जैसे  ऊंचे घराने वाले और अमीरज़ादे पंडितों से हाथ नहीं मिला सकता हूं  क्योंकि मैं अछूत हूँ।” राय साहिब बोले, “हुज़ूर ऐसी बातें न करें।  हम हजूर को ईश्वर का साया समझते है 


डेविड बोला “लेकिन मैं तो अछूत हूँ।” 


“वो कैसे?” 


“ये आपको बहुत जल्द मा’लूम हो जायेगा। हाँ ये तो बताइये आपके गांव में कोई शकुरवा रहता था?” 


शकुरवा का नाम सुनकर पंडितजी को बीस बरस पहले की बातें याद आगईं। डर के मारे उनका चेहरा फीका पड़ गया  उन्होंने दबी ज़बान से कहा, “जी हाँ मेरा एक नौकर  इस नाम का ज़रूर था लेकिन उसको मरे हुए बीस साल हो गये।” 


डेविड साहिब ने कहा, “मैंने सुना है आपने उसको जान से मरवा डाला था।” 


राय साहिब तन गये, “झूट, बिल्कुल झूट। भला कहीं ऐसी जीव हत्या हो सकती है?” 


“जी हाँ, आप जैसे बेदर्द कपटी धर्मांध दृष्टि वाले लोगों से जीव हत्या हो सकती है! राय साहिब इधर देखिए। जिसको इस वक़्त आप हुज़ूर कह कर पुकार  रहे हैं, जिसको सलाम करने आप यहां हाज़िर हुए हैं, वो उसी बदनसीब शकुरवा चमार का लड़का बेनी है।” राय साहिब ये सब सुनकर बेहोश हो गये। डेविड साहिब ने उन्हें घर भेज दिया, ब्राह्मण सेठ यह बात बर्दाश्त नहीं कर पाया है जहां वो इस सदमे से उबर न सका और गिरकर मर गया ।

 जब उनकी अर्थी डेविड साहिब के कैंप से गुज़री तो वो “राम नाम सत है”, की आवाज़ सुन रहे थे  

साथियों जो दूसरों के लिए खाई खोदने का काम करता है एक ना एक दिन उसके साथ भी अंजाम बुरा ही होता है साथियों चाहे कोई गरीब हो मजदूर हो दलित हो लाचार हो या मजबूर हो हमे उसके साथ भी ऐसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसा हम खुद के लिए चाहते है सबको मानव प्रेम करना चाहिए और जाति भेद भाव की नीति का सभी को  त्याग करना चाहिएं 

वीडियो देखने के लिए आपका शुक्रिया जानकारी अच्छी लगी हो तो चैनल को सब्सक्राइब करके लाइक और कमेंट करे और अपने सभी साथियों तक वीडियो को शेयर जरूर कर दें जय भीम साथियों dhanywad 


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