Monday, December 4, 2023

दलितों के नर्ककुंड में बास

दलितों के नर्ककुंड में बास 

 पार्ट 2

प्यारे साथियों नमस्कार साथियों इस कहानी का पहला भाग दलितों के लिए नर्क का कुंड यदि आपने नही देखा तो आप डिस्क्रिप्शन में दिए गए लिंक पर जाकर देख सकते है साथियों यह कहानी भूतकाल से लेकर वर्तमान समय में दलितों की वास्तविक स्थिति को भी चरितार्थ करती है 

साथियों Part 2 दलितों के नर्क कुंड से बास आना जातिय संघर्ष और वर्ग संघर्ष का बुनियादी फर्क उत्पीड़न और सवर्णों के आतंक का 

परिणाम है। बाहर और घरों में काम करने वाली दलित स्त्रियाँ आर्थिक रूप से इन्हीं चौधरियों

पर निर्भर है। उनकी आर्थिक निर्भरता व सामाजिक स्थिति, जिसके कारण इनके अस्तित्व,

अस्मिता को नकारकर इन्हें अपमानित कर सवर्ण जाति अपना अधिकार मानती है। पुरुष

प्रधानता का वर्चस्व इस प्रकार के व्यवहार से स्पष्ट होता है। दलित स्त्री होने के नाते तीहरे

शोषण की शिकार है। आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक सुरक्षा के अभाव में उसके

अस्तित्व व अस्मिता को बार-बार कुचला जाता है। ज्ञानो ने अपने अस्तित्व के लिए परिवार व

अपने ही पुरुष प्रधान समाज से संघर्ष करने का प्रयास किया था लेकिन इसमें उसे अपनी

जान ही देनी पड़ी। लच्छो जैसी अबोध व असहाय लड़की को यौन शोषण को झेलने के लिए मजबूर किया जाता है। चेतना के विकास के अभाव में वह इसे नियति समझकर चुप रहती है।

उसके इस अपमान को उसका बाप और माँ भी चुपचाप सहने में ही अपनी भलाई समझते हैं।

परिस्थितियों और जातिगत शोषण के दबाव को दलित परिवार संघर्ष या विद्रोह किए बिना ही

सहने के लिए विवश कर दिए गए हैं।

बाबा फत्तो व ताया बसंता एक तरह से दलित समुदाय के प्रतिष्ठित बुजुर्ग हैं, जो अपने समाज

के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं। समय-समय पर उन्हें पंचायत में या चौधरियों से किसी

झगड़े या विवाद को हल करने के लिए दलितों की ओर से बात करनी होती है। काली के

गाँव-आने पर व उसका स्वतंत्र व्यक्तित्व देख कर दलित युवक उसकी ओर नेतृत्व के लिए

देखते हैं, लेकिन चमार-चौधरी संघर्ष का फैसला फिर ताऊ बसंते से बात करके ही हल निकलता

है।


चौधरी वर्ग, जो गाँव का वर्चस्वकारी वर्ग है और ज़मीनों का मालिक है, इस कहानी 

 में शोषक अमानवीय और क्रर चरित्रों के रूप में सामने आते हैं। उनमें लालू पहलवान

जेसे न्याय प्रिय व्यक्ति भी हैं, जो अपने मजदूरों के साथ मानवीय व्यवहार करते हैं और दुख-

तकलीफ के समय उनके घरों में जाने से भी संकोच नहीं करते। चौधरी हरनाम सिंह, हरदेव,

चौधरी मुंशी आदि कुछ अधिक उद्दंड स्वभाव के हैं। लेकिन चौधरी -दलित संघर्ष के समय लालू

का अपने वर्ग के साथ रहना समाज में वर्गीय स्थिति के प्रभावी होने के यथार्थ को संकेतित

करता है। चौधरियों मे ही एक चरित्र मुंह फट चौधरी है, जो कहानी में कुछ हास्य-व्यंग्य की

स्थिति पैदा करता है। धडम्म अर्थात मुंह फट चौधरी हर गाँव में पाए जाते हैं ऐसे लोग निठल्ले रह कर बातों की

कमाई खाते हैं। यहाँ भी मुंह फट चौधरी कानून का विशेषज्ञ बन कर गाँव पर अपना आतंक

जमाए हुए है और उसी से अपना कमीशन निकाल कर काम चलाता है।

इस कहानी में चौधरियों और चमारों के बीच के जो चरित्र हैं, वे अधिक दिलचस्प

और जीवंत हैं। इनमें एक गाँव का बनिया छज्जू शाह है, जो चौधरियों और दलितों दोनों से

मधुर संबंध रखता है और दोनों को ही समान रूप से ब्याज आदि के द्वारा लूटता है। जहाँ

उसका हित चौधरियों-दलितों को लड़वाने में है, वहाँ वह उन्हें उक्सा देता है और जब उसके

अपने हितों की हानि होती है तो समझौते के लिए दोनों पक्षों को समझाने लगता है। उसके

लिए पैसा ही बड़ी सामाजिक सत्ता है, इसीलिए कानपुर से कुछ कमाई करके लौटा काली

उसके लिए "बाबू कालीदास'" है और उसकी जेब खाली होते ही वह फिर काली ही रह जाता

है। छज्जू शाह बनिया समुदाय का प्रतिनिधि चरित्र है। पं. संतराम, महाशय और पादरी

अचितराम धार्मिक समुदायों सनातनी, आर्य समाज और ईसाई धर्म के प्रतिनिधि चरित्र हैं ।

तीनों ही अपने व्यवहार में कपटी व पाखंडी हैं। पं. संतराम दलितों से छुआछूत का व्यवहार

रखता है, लेकिन दलित स्त्रियों पर उसकी लार टपकती है। महाशय या पादरी भी दलितों कें

मानवीय दुखों में कोई सहायता देने को तैयार नहीं हैं। अलबत्ता वह अवसर का लाभ उठा कर

उनका धर्म परिवर्तन जरूर करवाना चाहता है। अपने व्यवहार में ये सारे धार्मिक चरित्र अपने

खोखलेपन को प्रकट करते हैं।

डॉ. बिशनदास व उसका साथी टहल सिंह कम्युनिस्टों के व्यंग्य चित्र हैं।  गाँव वाले उसे बहुत बड़ा "चाटू' समझते हैं और बहुत बार वह अपनी बोलने की आदत

के कारण झिड़कियाँ भी खाता है। चौधरी-दलित संघर्ष के समय उसका व पड़ोसी गाँव के

मध्यवर्गीय जाट कामरेड टहल सिंह का व्यंग्यचित्र खूब उभर कर सामने आता है। ये दोनों

किताबी कामरेड स्तालिन, ट्राट्स्की लाईन पर बहसे करते हैं। दलित खेत मज़दूरों की हड़ताल

में मजदूर इन्कलाब शुरू होने के सपने देखने लगते हैं। रात में काली व कुछ और दलितों

को बुला कर मीटिंगे करते हैं व उन्हें इन्कलाब के भाषण पिलाने लगते हैं। दलितों के संघर्ष जारी रखने की जो बुनियादी शर्त है कि उन्हें अ्नाज इकटठा करके दिया जाए ताकि वे

चौधरियों का मुकाबला जारी रख सकें, इसे वे "रिफार्मिस्ट अप्रोच" बता कर उन्हें फाकेकशी

करते हुए अर्थात उन्हें "सुधारवादी दृष्टिकोण" कहकर "इन्कलाबी जजबा" मजबूत करने की हवाई बाते कहते हैं। उनके लिए अनाज

इकट्ठा न करके वे गाँव में जलसे करने के ऐलान करने लगते हैं, जिनके होने से पहले ही

दोनों पक्ष बिना हार-जीत के फैसला करके कामरेडों के "मजदूर तबके के ज़ेहन साफ

करने" और उन्हें "आईडिलाजीकली" पुख्ता करने की योजना ठस्स कर देते हैं। 

वास्तव में डॉ. बिशनदास व कामरेड टहल सिंह दोनों ही सुविधाभोगी मध्यवर्गीय चरित्र हैं,

इसलिए उन्हें कम्युनिजम का किताबी शौक है, जिंदगी के संघर्षों से उनका कोई वास्ता नहीं

है, इसलिए उनका समूचा व्यवहार उनके वर्गीय चरित्र को ही प्रस्तुत करता है। जाति संघर्ष के

बुनियादी आधार को वर्ग संघर्ष की वैचारिक सोच के अनुसार 

समस्याओं का समाधान ढूंढने और संघर्ष के व्यावहारिक स्वरूप में फर्क आ जाता है।

कम्युनिस्ट दलितों के शोषण को आर्थिक शोषण मानते हैं। जाति विभाजन के कारण मानव

निर्मित व्यवस्था में दलितों की निम्न स्थिति का मूल आधार वर्ण व जाति व्यवस्था है और उसे

जन्म से माना गया है। विभाजन व बंटवारा भी जाति की श्रेष्ठता व   नीचता के आधार पर

किया गया है। निम्न मानी गई जातियों के लिए श्रम से जुड़े और आय की दृष्टि से निम्नतर

व्यवसाय ही सौप दिए गए है। जिससे उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में परिवर्तन नहीं

हो रहा। जब भी परिवर्तन के लिए कोई व्यक्तिगत या सामुहिक प्रयास दलित जातियों द्वारा

किया जाता है, तब दमन की प्रक्रिया अधिक तीव्र हो जाती है। सामाजिक बहिष्कार जैसी

अमानवीय आदिम व्यर्थ की पंरपराओं के द्वारा दलितों को आर्थिक दृष्टि से दयनीय अवस्था

तक पहुँचाकर, जातिय भेदभाव के कारण अपमानित करके उनके मनोबल को तोड़ दिया जाता

है। स्थितियों से समझौता करने के अलावा कोई दूसरा पर्याय न देखकर दलित अपना संघर्ष

भूलकर फिर से अधीनता की स्थिति में पहुँचा दिए जाते। दलितों का अस्तित्व के लिए संघर्ष,

जाति संघर्ष है। आर्थिक संघर्ष जाति संघर्ष का ही अभिन्न अंग है। दलितों का आर्थिक व

सामाजिक शोषण उनकी निम्न जाति के कारण है, जो कि जन्म के आधार पर तय है। काली

की आर्थिक स्थिति में हुए परिवर्तन से उसकी सामाजिक स्थिति नहीं बदली है। इस बदलाव

को चौधरियों ने स्वीकार नहीं किया। क्योंकि आर्थिक स्थिति बदलने से भी उसकी दलित

पहचान को, उसके चमार होने को किसी ने भी नहीं भूलाया यही जाति संघर्ष और वर्ग संघर्ष

का बुनियादी फर्क है।


गाँव में दाखिल होते ही काली के नाक को गाँव की विशिष्ट गंध की पहचान मिलती है, भले

ही वह छह वर्ष बाद ही गाँव लौटा है।

इस अंचल विशेष की संस्कृति के अनुरूप काली की चाची प्रतापी उसे बिना तेल छुए 

घर में दाखिल नहीं होने देती, भले ही उसकी शीशी में मुश्किल से तेल की एक बूंद ही

निकले।  पंजाबी लोग स्वभाव में प्रायः भावुक, संबंधों में सुरीले

होते हैं, इसलिए अपने संबंधों की चर्चा वे ऊँचे सुरों में करते हैं। वैसे तो प्रायः उनका प्रत्येक

व्यवहार ऊँचे सुर वाला होता है। यही स्थिति 'घोड़ेवाहा" गाँव के दलितों के संबंध में सच है

और अन्य समुंदायों संबंधी भी। घोड़ेवाहा गाँव के दलित समाज पर भारतीय समाज के उच्च

वर्णों के सांस्कृतिक मूल्य' वर्चस्व बनाए हुए हैं,  यह सही है कि किसी धर्म विशेष के प्रति चमादड़ी का आग्रह नजर नहीं आता,

विशेष धार्मिक रस्मों में पड़े हुए भी नजर नहीं आते, लेकिन जीवन में कुछ निर्णायक क्षणों में

वे उच्च वर्ग की रूढ्धियों से परिचालित हो जाते हैं। इससे उनके दिमागी पिछेडपन व उच्च

वर्णों द्वारा अपने जाल में फंसाए रखने की स्थिति स्पष्ट हो जाती है। काली की चाची की

बीमारी के समय, जब काली कानपुर में छह वर्ष रह कर लौटने पर भी इतना तर्कशील व

समझदार नहीं बन पाता है कि वह ओझा के जाल से बच जाता और चाची का इलाज डाक्टर

से जारी रखता। वह झाड़-फूक के चक्कर में पड़ कर चाची के प्राण भी गँवाता है, अपना चैन

भी व चाची के दिए गहने और अपने रुपए आदि भी।

इस गाँव में स्कूल भी है, लेकिन वहाँ दलित बच्चों को पढने की इजाजत नहीं है। शिक्षा का

यह अभाव भी उनहें सांस्कृतिक रूप से पिछ्डेपन में जकड़े रखता है। उनकी संस्कृति का

सर्वाधिक दमनकारी रूप उभर कर सामने आता है - काली और ज्ञानो के प्रेम के प्रति दलित

समाज की प्रतिक्रिया में। गाँव में एक भी ऐसा उदारमन व्यक्ति नजर नहीं आता (दलित - गैर

दलित दोनों में ही), जो उनके प्रेम का प्रशंसक हो। मिस्त्री संता सिंह काली को ज्ञानो का

यौवन लूटने के लिए ही उकसात है, उनके सच्चे प्रेम का वह प्रशंसक नहीं है। 

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