दलितों के लिए व्यवसायिक कम्पनी डिक्की के उद्देश्य लक्ष्य कार्य योजना
साथियों यह कहानी ज्ञान यानि नॉलेज से भरपूर है आपके जीवन में काम आने वाले महत्वपूर्ण तथ्य शामिल किए गए है साथियों किसी ने खूब कहा है कि अपने ही दगा देते है गैरो में कहां दम एक सफल दलित बिजनेस मैन की कहानी जिसे उसके ही भाईयो ने बार बार धोखा दिया लेकिन फिर भी वह आज एक सफल बिजनेसमैन बन गया
साथियों इस मार्मिक एवं मोरल कहानी को आगे बताएंगे उससे पहले दलितों की विश्वस्तरीय सफल कम्पनी के बारे में थोड़ा कुछ जान लेते है साथियों दलितों की कंपनी डिक्की है डिक्की क्या है डिक्की की हकीकत क्या है डिक्की का उद्देश्य क्या है
साथियों डिक्की का एक खूबसूरत सा नारा है यह नारा उनके लिए है जो बेरोजगार घूमते है डिक्की कहती है कि
नौकरी ढूढ़ने वाले नहीं, बल्कि नौकरी देने वाले बनो
डिक्की का उद्देश्य है कि भारत के मानस-पिता परम पूज्य बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के आर्थिक दर्शन का प्रचार-प्रसार करना ही डिक्की का उद्वेश्य है
डिक्की का उद्देश्य यह सिद्ध करना कि बाबा साहेब के अनुयायी देने वाले हैं, लेने वाले नहीं।
डिक्की क्या है?
डिक्की का यह सिद्ध करना है कि देशभर के दलित उद्यमी जितना कर (टैक्स)सरकार को देते हैं, वह राशि सरकार द्वारा दलित कल्याण पर खर्च की जाने वाली राशि से कहीं अधिक है।
यह सिद्ध करना कि सरकार आरक्षण द्वारा दलितों को जितनी
नौकरियां देती है, उससे कहीं अधिक नौकरियां दलित उद्यमी
गैर-दलितों को देते हैं।
दलित उद्यमी भी देश की जी.डी.पी. (GDP) में प्रतिवर्ष अरबों रुपये का योगदान कर रहे हैं आदि आदि।
दलित इंडियन चैम्बर्स ऑफ़ कॉमर्स एण्ड इंडस्ट्री (डिक्की) का
परिचय-डिक्की की स्थापना वर्ष 2005 में पूणे में हुई। डिक्की के संस्थापक चैयरमैन श्री मिलिन्द कांबले हैं। फोरच्यून कस्ट्रकशन कम्पनी के संस्थापक सी.ई.ओ.माननीय कांबले जी के पिता स्कूल शिक्षक हैं तथा माता गृहिणी। फोरच्यून संगठन
का संयुक्त वार्षिक टर्नओवर अस्सी करोड़ से अधिक का है।
आखिर डिक्की ही क्यों?
जातिव्यवस्था से मुक्ति के आकांक्षी दलित, समाज में सर्वांगीण नेतृत्व में हैं-राजनीतिक नेतृत्व, सामाजिक नेतृत्व, दलित अफसरों कर्मचारियों के बीच एवं नेतृत्व, धार्मिक नेतृत्व, छात्रों का नेतृत्व, दलित महिलाओं के बीच नेतृत्व। फिर,दलित उद्यमियों का संगठन एवं दलित बिजनेस नेतृत्व क्यों नहीं?
डिक्की, दलित उद्यमियों का एक राष्ट्रव्यापी संगठन है, जो दलितों
में बिजनेस लीडरशिप विकसित कर रहा है।
डिक्की, देश की आर्थिक सम्पदा में दलितों की हिस्सेदारी सुनिश्चत करना चाहता है।
डिक्की, दलित समाज के भीतर दलित पूंजीवाद विकसित करना
चाहता है।
डिक्की, दलित उद्यमियों को दलित समाज के भीतर एक नये रुप
में प्रस्तुत कर रहा है।
साथियों इसे भी समझ लेते है उसके बाद एक सफल और शानदार मोरल मार्मिक कहानी सुनेंगे
साथियों देश में भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कथित अछूत वर्ग को सामाजिक
और आर्थिक क्षेत्र से वंचित रखा गया, इसीलिए वह आजादी के 67 साल बाद भी विधायिका एवं प्रशासनिक सेवाओं में आरक्षण के बावजूद वह बराबरी और खुशहाली की दहलीज पर ही खड़ा है, जबकि उद्यमिता, श्रमशीलता, कर्मठता
तथा बौद्धिकता में किसी से कहीं भी कम नहीं है। राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, उप-प्रधानमंत्री, कैबिनेट मंत्री, मुख्यमंत्री, संघ लोक सेवा आयोग, विश्वविद्यालय
अनुदान आयोग के चेयरमैन तथा भारतीय बखूबी निभाकर इस वर्ग के लोग अपनी योग्यता का लोहा मनवा चुके हैं। वैसे तो शक की सुई इनकी तरफ बराबर रही, इन्हें इन पदों के लिए अयोग्य की समझा जाता रहा, लेकिन इस वर्ग के लोगों को जब भी अवसर मिले, इन्होंने इसे चुनौती के रूप में लिया और
दूसरों की अपेक्षा बेहतर परिणाम दिए हैं।
चाहे चिकित्सा का क्षेत्र हो या शिक्षा का अथवा इंजीनियरिंग का, सभी व्यवसायों में ये सफलतापूर्वक कार्य कर रहे हैं। जहां तक उद्यमिता की बात है,इस क्षेत्र में भी दलित समाज का पहले से ही दखल रहा है। आगरा और कानपुर के प्रतिष्ठित कारोबारियों के उदाहरण सामने हैं, जिन्होंने ब्रिटिश काल में कारोबार
किया है, पंजाब के सेठ किशनदास का कारोबार पश्चिम बंगाल के कलकत्ता तक रहा है, जालंधर की बूटा मंडी विश्व प्रसिद्ध थी हालांकि कथित अछूत समाज का कारोबार चमड़े और चमड़े से बनी वस्तुओं तक ही सीमित था। इस सवाल का सीधा जवाब यही है कि आजादी से पहले जाति से संबंधित कारोबार
ही किया जा सकता था, जैसे - बढुई- लकड़ी का, लुहार-लोहे का, तेली - तेल का और जुलाहा-कपड़े के कारोबार से जुड़ा रहा। इसी प्रकार दक्षिण भारत में ब्रिटिश कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी से डॉ. अम्बेडकर के समकालीन और उनके सहयोगी एन. शिवराज के पिता जी का कारोबार सिंगापुर तक फैला परंतु पहले मीडिया संबंधी सुविधा न होने के कारण अछूत समाज के विश्व स्तर के
कारोबारी प्रचार नहीं पा सके।
लेकिन बदलते विश्व परिवेश में दलित उद्यमी इस क्षेत्र में नई ऊंचाइयों की ओर अग्रसर हैं और वे जाति आधारित कारोबार के मिथक को तोड़कर हर हुनरपरस्ती और बौद्धिकता का लौहा मनवा रहे हैं। शीर्ष उद्यमियों में मिलिंद कांबले तथा कल्पना सरोज के नाम उल्लेखनीय हैं, जो दलितों के लिए ही नहीं,दूसरों के लिए भी रोल मॉडल हैं। टाटा जैसे स्थापित उद्यमी उन्हें अपना भागीदार
बनाने के लिए उत्सुक हैं और भारत सरकार उद्यमिता के क्षेत्र में उनके विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें ' पदमश्री' से अलंकृत कर चुकी है। सर्वनाम धन्य मिलिंद कांबले अपने प्रयासों से डिक्की (दलित इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री) में हजारों दलितों को सहभागी बनाकर डॉ. अम्बेडकर का सपना- दलित
बने धनवान' साकार करने के लिए प्रयत्नशील हैं।
साथियों इस कड़ी को आगे बढ़ाते हुए आइए एक हकीकत कहानी को सुनते है
विश्वास के साथ मैं अपना व्यवसाय कर रहा था। किसी भी व्यवसाय में
विनम्रता और मीठे बोलों की जरूरत होती है। मैंने इस बात का स्मरण रखा। मेरा
व्यवसाय अच्छी तरह चलने लगा। युवा वर्ग के लोग ज्यादा-से-ज्यादा तादाद में
मेरे पान ठेले पर आते थे। अब पान के साथ- साथ मैंने चाय का स्टॉल भी शुरू
किया। इस स्टॉल का नाम प्रकाश टी स्टॉल था। मुझे दोगुणा मुनाफा मिलने लगा।
सुबह सात बजे मैं दुकान खोला करता था। दुकान खुलने का तो एक निश्चत
समय था, मगर दुकान बंद होने का कोई ऐसा समय नहीं था। देर रात तक
इक्का-दुक्का ग्राहक आया करते थे और उनके लिए मैं अपनी दुकान खुली
रखता था। बहुत कष्ट होता था। थक जाता था। मगर मन में लगन थी आगे बढ़ने
की, इस लगन के कारण ही मुझे कभी थकान महसूस नहीं हुई।
जब गर्मी के दिन आए तो लोग प्यास से लहकने लगे। चाय मांगने वालों
की भीड़ कम हो गई। मैंने वक्त का तकाजा समझ लिया और रसवंती शुरू
करके गन्ने का रस बेचना शुरू किया। इस काम में मुझे मेरी मां एवं मेरे भाई
ज्ञानेश्वर और हंसराज सहायता करते थे।
अब मेरा व्यवसाय अच्छी तरह चल रहा था। कुछ पैसा बचत करना शुरू
किया। मुझे बचपन से पैसे का मोल (महत्त्व ) पता था। फिजूल पैसा खर्च करने
से मुझे नफरत थी। पैसा इकट्ठा करके मैंने एक यजदी मोटर साइकिल खरीदी
थी। पिताजी ने एक पुराना मकान खरीदा था। उसे गिराकर स्लॅम का नया सुंदर
मकान बनाया। व्यवसाय से पूंजी इकट्ठा करके बड़े और छोटे भाई की शादी
करा दी। आब हमारी आर्थिक स्थिति अच्छी हुई थी। सो मैंने अपनी भी शादी
कर ली। मेरी ससुराल अमरावती जिले के अंतर्गत आने वाला बेनोडा (शहीद)
गांव में है। हम सब भाई मिलकर काम करते थे। हमारा व्यवसाय फलता-फूलता
नजर आ रहा था। हंसी-खुशी से हम अपनी जिंदगी के दिन गुजार रहे थे।
हमारी एकता को न जाने किसकी नजर लग गई और हमारे घर में गृह
कलह आरंभ हो गया। भाइयों ने धंधे पर अपना भी हक जताया। आखिर मैं दोनों
दुकानों को भाइयों को सौंपकर दूसरे धंधे की तलाश में निकल पड़ा। चार माह
तक मैंने ट्रांसपोर्ट व्यवसाय में नौकरी की और अपनी उपजीविका चलाने लगा।
मगर इसमें मैं खुश नहीं था। अन्य व्यवसाय की ओर मेरी नजर लगी थी। उस
समय कमाल चौक मार्कंट में व्यवसाय के लिए चबूतरे देने का काम चल रहा
था। मैंने एक चबूतरा खरीद लिया। उस पर शेड बनाकर मैंने अनाज का व्यवसाय
शुरू किया। अब मेरे पास बहुत कम पूंजी थी। मुझे नए सिरे से ऊपर उठना था
मैंने तीन-चार बोरी अनाज लेकर अपना व्यवसाय शुरू किया। इसमें भी मेरा
व्यवसाय बढ़ने लगा। बड़ा भाई पारस अब मेरे साथ काम करने लगा। उसके
साथ आने पर मेंने तेल का व्यवसाय भी शुरू किया। इस व्यवसाय में भी मुझे
कामयाबी मिलने लगी। अभी आगे बढ़ने के दिन थे कि फिर भाई ने धोखा दे दिया
और मुझे खाली हाथ बाहर जाना पड़ा।
जब अपने दगा देते हैं तो पराए अपने बन जाते हैं । हमारे दुकान के पड़ोस
में रोकड़े की दुकान थी। वे दुकान बेचना चाहते थे। जब उन्होंने मेरी हालत देखी
तो उन्हें तरस आया। उन्होंने बिना किसी अग्रिम या डिपोजिट के मुझे दुकान की
चाबी सौंप दी। वे मुझ पर पुत्रवत प्रेम करते थे। जब मैंने उस दुकान के माध्यम
से अनाज व्यवसाय शुरू किया, तो मुझे अल्प समय में ही कामयाबी मिली। इस
दुकान ने मेरे दिन बदल दिए। मैं अनाज की थोक और खुदरा बिक्री करता था।
यहां मैंने अपने भांजे को सहायता के लिए बुलाया था। अब तक मैंने वैशाली
नगर में एक बड़ा प्लॉट खरीद लिया था। वहां कुछ कमरे बनवाकर अपने भाई
को रखा, लेकिन भाई ने फिर बेईमानी कर मुझे अदालत में घसीटा। भांजे ने भी
गड़बड़ की और मैं पीछे के हालात में आ गया।
अब दोबारा मुझे नए सिरे से व्यवसाय करना था। इसलिए मैंने एक फाइव
व्हीलर ऑटो खरीद लिया। घर में ही दुकान बनाकर दुकान शुरू किया। 1995
में जमीन के ले -आउट गिराकर उसे बेचने का व्यवसाय शुरू किया। दो
ले-आउट बनाकर बेचने में मुझे ज्यादा समय नहीं लगा। प्रॉपटी डीलिंग के
व्यवसाय में मुझे अच्छा-खासा अनुभव प्राप्त हुआ।
इसके बाद मुनाफे की सारी पूंजी मैंने अलग-अलग व्यवसायों में इंवेस्ट
करनी शुरू की। मैंने एस. टी. डी. सेंटर शुरू किया। पार्टनरशिप में मारूति वैन
और टेम्पो ट्रंक्स गाड़ियां लेकर ट्रांस्पोर्टिंग का व्यवसाय शुरू किया। 1997 में
टाइपिंग सेंटर की नींव रखी।
मैंने 1999 में अपने व्यावसायिक जीवन में एक और बड़ा कदम रखा। मैंने
'पी. के. बिल्डर्स एंड डेवलपर्स' के नाम से रजिस्ट्रेशन करा कर अपना स्वतंत्र
व्यवसाय शुरू किया। वैशाली नगर में 15 प्लैट्स एवं दुका्ने बनाई। उसके बाद
मेरी गति बढ़ती रही। अब मेरे हाथ में बड़े-बड़े प्रोजेक्ट हैं। शहर के नामी
बिल्डरों की कतार में मेरा नाम गिना जाने लगा। आज मैं अपनी सफलता से
संतुष्ट हूं। जीवन के कटु अनुभवों को मैंने भुला दिया है। और बेईमानी करने
वालों को मैंने माफ कर दिया है। शिक्षा के प्रति लगाव होने के कारण मैंने प्रकाश
समिति का मैं पदाधिकारी था। मैंने अपनी सामर्थ्थ के अनुसार विहार बनाने में
सहायता की एवं अपनी ओर से बुद्ध मूर्ति का दान दिया। राजनीति में मैं ज्यादा
सक्रिय नहीं हूँ। मगर रिपब्लिकन एकता के लिए हमने बाबा साहेब डॉ.
अम्बेडकर एकीकरण कृति समिति की स्थापना की थी। एकीकरण के लिए
आंदोलन भी किए थे। इसमें हमें मुंबई घाटकोपर के मा. डॉ. अहिरेजी का सहयोग
मिला। रिपब्लिकन पैंथर ऑफ इंडिया का भी मैं पदाधिकारी रहा मा. एस.
के. गजभिए और तुलसी के सहयोग से मैंने वैशाली नगर में प्लॉट खरीदा। वहीं
पर अब मेरा आलिशान बंगला बना है।
आज मेरे पास सब कुछ है। कल मैं अंधेरे में भटक रहा था। आज मेरे
जीवन में उजाला आया है। सुख, शाति और चैन की जिंदगी मैं बसर कर रहा
हूं। आज मैं लेखन, वाचन, संगीत और चित्रकला के शौक भी पूरे कर रहा हूं।
धम्मसेवा मेरे जीवन का मकसद है। तथागत एवं बाबा साहेब मेरी प्रेरणा हैं।
मैंने अपनी कहानी का बहुत संक्षेप में जिक्र किया है। आदमी दुःखभरे दिन
भूलना चाहता है। मगर मैं अपना अतीत कभी नहीं भूला। बच्चों को भी मैं बताता
हूं कि हमारे पैर हमेशा जमीन पर रहने चाहिए । मेरी कहानी, मेरा अतीत और मेरे
सुख-दुःख मैंने आपके साथ बाटे हैं। उसका भी एक मकसद है। आज हमारे
बीच भी मेरे जैसे कई लोग हैं। कई युवक हैं, जो निराशा के अंधेरे में भटक
रहे हैं। गरीबी उनका लगातार पीछा कर रही है। समस्याएं अनेक हैं। उन
समस्याओं से ठोकर खाकर उनका हौसला टूट रहा है। मैं अपनी कहानी के
माध्यम से उन्हें बताना चाहता हूं कि कठिनाइयों से डरो मत। चट्टान की तरह
मजबूत बनकर उनका सामना करो। अपना लक्षय निर्धारित करो और परी लगन,
परिश्रम, महत्त्वाकांक्षा और साहस से उस लक्ष्य को पाने का प्रयास करो।
कामयाबी जरूर तुम्हारे कदम चूमेगी
साथियों जानकारी अच्छी लगी हो तो चैनल को भी subscribe करके जाना लाइक कमेंट भी कर देना जय भीम धन्यवाद साथियों
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