दलित वीरांगना झलकारी बाई की सत्य घटना
प्यारे साथियों नमस्कार साथियों हमारे देश भारत में सदियों से दलितों की वीरता और उनके बलिदानों को इस जातिवादी वर्ण व्यवस्था ने हमेशा से नजर अंदाज किया देश की आजादी की बात हो या फिर राजे रजवाड़ों की सब जगह दलितों को इतिहास के पन्नो से गायब कर दिया गया है ऐसी ही एक कहानी दलित महिला वीरांगना झलकारी बाई के बलिदान और वीरता की भी है जिसको इतिहास से गायब करके उसकी जगह रानी लक्ष्मीबाई को इतिहास में जगह दी गई है ।
दलित महीला झलकारी बाई की प्रेरणा का असर हम आज देख सकते हैं. जगह-जगह लगीं उनकी मूर्तियाँ, उनके नाम पर जारी डाक टिकट- इसके गवाह हैं. वे दलित समाज की चेतना और गर्व की प्रतीक रही हैं.
जो लोग झलकारी के होने न होने का मुद्दा बनाते हैं, मोहनदास नैमिशराय उन लोगों से एक अहम सवाल पूछते हैं, "झलकारी बाई जी के आने से रानी लक्ष्मीबाई जी को तो बहुत सम्मान मिला. तो वे क्यों नहीं झेल पाते हैं कि एक दलित समाज की महिला ने भी उस समय ऐसा काम किया होगा."
सन् 1857 की जंग-ए-आज़ादी में झलकारी बाई
एक स्त्री जिसके हौसले और बहादुरी को इतिहास के दस्तावेज़ों में जगह नहीं मिली. आम लोगों ने उसे अपने दिलों में जगह दी. क़िस्से - कहानियों- उपन्यासों- कविताओं के ज़रिये पीढ़ी दर पीढ़ी ज़िंदा रखा. सालों बाद उसकी कहानियाँ दबे- कुचले, हाशिये के समाज के लोगों की प्रेरणा बनीं. तब ही तो घोड़े पर सवार उनकी मूर्तियाँ आज कई शहरों में दिख जाती हैं.वही झलकारी बाई हैं.
1857 की पहली जंग-ए-आज़ादी का ज़िक्र आता है तो झाँसी की रानी का ज़िक्र लाज़िमी तौर पर आता है. ऐसा कहा जाता है कि रानी झाँसी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर झलकारी बाई भी अंग्रेज़ों से लड़ीं थीं.
अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास की किताबों में समाज के दबे-कुचले- वंचित समुदायों के लोग लगभग ग़ायब हैं. रानी लक्ष्मीबाई का नाम तो हममें से ज़्यादातर लोग छुटपन से जानते और सुनते आये हैं लेकिन झलकारी बाई का नाम इतिहास की किताबों में नहीं मिलता है.
कहानी कुछ यों है, झाँसी के पास भोजला गाँव है. उस गाँव के लोगों का कहना है कि झलकारी बाई इसी गाँव से थीं. परिवार पेशे से बुनकर था. बहुत आम और ग़रीब परिवार की थीं. ऐसे परिवारों के बच्चे-बच्चियाँ जैसे पलते हैं, झलकारी बाई का जीवन भी वैसा ही था. झलकारी बाई झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के क़िले के सामने रहती थीं. भोजला उसका गाँव था और इस गाँव में पहाड़ों पर और जंगलों में लोग जा कर लकड़ियाँ इकट्ठा करते थे. क़िले के दक्षिण में उन्नाव गेट है. झलकारी बाई के घराने के लोग वहीं रहते थे. उस घराने के लोग आज भी हैं. अगर पता करेंगे तो झलकारी बाई के घराने के लोग भी ये इतिहास बताते हैं. वे कहते हैं, ये लड़ाई तो हम लोगों ने लड़ी है. हम लोगो की यहाँ पर पूरी बस्ती है. हम लोगों का पूरा इतिहास है. झलकारी बाई हम लोग के समाज की थीं."
इतिहास से ग़ायब वंचित महिलाएं
हालाँकि, उस दौर के अब तक मिले ऐतिहासिक दस्तावेज़ों में झलकारी बाई का नाम नहीं आता है. मगर सवाल है कि हाशिये के लोगों को इतिहास में कब जगह मिली है? इनमें वंचित समाज भी हैं और महिलाएँ भी. झलकारी बाई दोनों का प्रतिनिधित्व करती हैं.समाजशास्त्री और दलित चेतना के उभार पर काम करने वाले बद्रीनारायण इस बात को थोड़ा और साफ़ करते हैं, ब्रिटेनी रिकॉर्ड में उन्हीं का वर्णन होता है, जो उनको महान लगते हैं. महत्वपूर्ण होते हैं. या जिनसे ब्रिटेनी शासन बहुत घबराया हुआ रहता होगा
वृंदावनलाल वर्मा भी तो अपने उपन्यास में झलकारी बाई और उन जैसी अनेक महिलाओं का ज़िक्र करते हैं और बताते हैं, 'रानी ने स्त्रियों की जो सेना बनायी थी, उसकी एक सिपाही झलकारी भी थीं.'
इसके बाद वह हुआ जो इतिहास बन गया
"जब 1857 के युद्ध में ब्रिटेनी सैनिकों का हमला हुआ तो उस समय उन्होंने रानी को कहा कि अपने बच्चे को लेकर तुम भाग जाओ. मैं तुम्हारी शक्ल लेकर अंग्रेज़ों को रोके रखूँगी. अंग्रेज़ सोचेंगे कि लक्ष्मीबाई से लड़ रहे हैं लेकिन तुम जा चुकी होगी. लक्ष्मीबाई बन कर वे ब्रिटिश सैनिकों को धोखा देती रहीं. बहुत वीरता से लड़ीं. कोई पहचान नहीं पाया कि लक्ष्मीबाई नहीं हैं."
झलकारी ने अपना श्रृंगार किया. बढ़िया से बढ़िया कपड़े पहने, ठीक उसी तरह जैसे लक्ष्मीबाई पहनती थीं. गले के लिए हार न था, परंतु काँच के गुरियों का कण्ठ था. उसको गले में डाल दिया.
झांसी की रानी की परछाई बनी झलकारी बाई , जिसने लक्ष्मीबाई बनकर दिया अंग्रेजों को चकमा
आपने झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की कहानियां तो सुनी होंगी। लेकिन क्या उनकी सेना की बहादुर सिपाही झलकारी बाई के बारे में आप जानते हैं। झलकारी बाई ने लक्ष्मीबाई के प्राणों की रक्षा के लिए अंग्रेजों के खिलाफ ऐसी चाल चली जिसे देखकर ब्रिटिश सेना के होश उड़ गए।
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के शौर्य के किस्से हम सभी ने बचपन से पढ़े और सुने हैं। लेकिन क्या आप उनके साथ ही अंग्रेजों के दांत खट्टे करने वाली झलकारी बाई के बारे में जानते हैं। झलकारी बाई के सिर पर न रानी का ताज था न ही झांसी की सत्ता। लेकिन फिर भी अपनी मातृभूमि की रक्षा करने के लिए उन्होंने अपने प्राणों की आहूति दे दी। झलकारी बाई के बारे में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी कविता में लिखा है-
"जा कर रण में ललकारी थी,
वह तो झांसी की झलकारी थी ।
गोरों से लडना सिखा गई,
है इतिहास में झलक रही,
वह भारत की ही नारी थी ।।"
एक बार झलकारी ने
तेंदुए को कुल्हाड़ी से मार डाला था
झलकारी बाई बचपन से ही साहसी थीं। जब वो छोटी थी तभी उनकी मां का देहान्त हो गया। पिता ने उन्हें घुड़सवारी और हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया। कहा जाता है कि एक बार जंगल में एक तेंदुए ने उन पर हमला कर दिया था । लेकिन झलकारी ने कुल्हाड़ी से उसे मार दिया। इतना ही नहीं एक बार कुछ डकैतों ने उनके गांव के व्यापारी के घर पर धाबा बोला, तो झलकारी ने उनका मुंहतोड़ जवाब देते हुए गांव से भागने पर मजबूर कर दिया। झलकारी के साहस से प्रभावित होकर उनकी शादी झांसी की सेना के सैनिक पूरन कोरी से कर दी।
लक्ष्मीबाई से कैसे हुई मुलाकात?
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और झलकारी बाई का पहली बार आमना सामना एक पूजा के दौरान हुआ। झांसी की परंपरा के अनुसार गौरी पूजा के मौके पर राज्य की महिलाएं किले में रानी का सम्मान करने गईं। इनमें झलकारी भी शामिल थीं। जब लक्ष्मीबाई ने झलकारी बाई को देखा तो वो हैरान रह गईं। क्योंकि झलकारी बाई बिल्कुल लक्ष्मीबाई जैसी दिखती थीं। जब उन्हें झलकारी की बहादुरी के किस्से सुनने को मिले तो उन्हें सेना में शामिल कर लिया। झांसी की सेना में शामिल होने के बाद झलकारी ने बंदूक चलाना, तोप चलाना और तलवारबाजी का प्रशिक्षण लिया।
लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर किया अंग्रेजों का मुकाबला
डलहौजी की नीति के तहत झांसी को हड़पने के लिए ब्रिटिश सेना ने किले पर हमला कर दिया। इस दौरान पूरी झांसी की सेना ने लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर अंग्रेजों को मुंहतोड़ जवाब दिया। अप्रैल 1858 में झांसी की रानी ने अपने बहादुर सैनिकों के साथ मिलकर कई दिनों तक अंग्रेजों को किले के भीतर नहीं घुसने दिया। लेकिन सेना के एक सैनिक दूल्हेराव ने महारानी को धोखा दे दिया। उसने अंग्रेजों के लिए किले का एक द्वार खोल कर अंदर घुसने दिया। ऐसे में जब किले पर अंग्रेजों का अधिकार तय हो गया तो झांसी के सेनापतियों ने लक्ष्मीबाई को किले से दूर जाने की सलाह ही। इसके बाद वो कुछ विश्ववसनीय सैनिकों के साथ किले से दूर चली गईं।
अंग्रेजों को चमका देने के लिए बनाई खास योजना
किले के भीतर हुए इस युद्ध में झलकारी बाई के पति शहीद हो गए। लेकिन इसके बाद भी उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ एक योजना बनाई। उन्होंने लक्ष्मीबाई की तरह कपड़े पहने और सेना की कमान अपने हाथ में ले ली। इतना ही नहीं अंग्रेजों को इस बात की भनक न पड़ पाए कि लक्ष्मीबाई किले से जा चुकी हैं ये सोचकर वो अंग्रेजों को चकमा देने के लिए किले से निकलकर ब्रिटिश जनरल ह्यूग रोज के कैंप में पहुंच गईं। जब तक अंग्रेज उन्हें पहचान पाते तब तक लक्ष्मीबाई को पर्याप्त समय मिल गया।
इस घटना का जिक्र मशहूर साहित्यकार वृंदावनलाल वर्मा के ऐतिहासिक उपन्यास 'झांसी की रानी-लक्ष्मीबाई' में भी है। उन्होंने लिखा है, "झलकारी ने अपना श्रृंगार किया। बढ़िया से बढ़िया कपड़े पहने, ठीक उसी तरह जैसे लक्ष्मीबाई पहनती थीं। गले के लिए हार न था, परंतु कांच के गुरियों का कण्ठ था। उसको गले में डाल दिया। प्रात:काल के पहले ही हाथ मुंह धोकर तैयार हो गईं। पौ फटते अर्थात सुबह होते ही घोड़े पर बैठीं और ऐंठन अकड़ के साथ अंग्रेजी छावनी की ओर चल दी साथ में कोई हथियार न लिया। चोली में केवल एक छुरी रख ली। थोड़ी ही दूर पर गोरों का पहरा मिला। टोकी गई। झलकारी को अपने भीतर भाषा और शब्दों की कमी पहले-पहल जान पड़ी। परंतु वह जानती थी कि गोरों के साथ चाहे जैसा भी बोलने में कोई हानि नहीं होगी। झलकारी ने टोकने के उत्तर में कहा, 'हम तुम्हारे जडैल के पास जाउता है।' यदि कोई हिन्दुस्तानी इस भाषा को सुनता तो उसकी हंसी बिना आये न रहती। एक गोरा हिन्दी के कुछ शब्द जानता था। बोला, 'कौन?'
रानी -झांसी की रानी, लक्ष्मीबाई, झलकारी ने बड़ी हेकड़ी के साथ जवाब दिया। गोरों ने उसको घेर लिया। उन लोगों ने आपस में तुरंत सलाह की, 'जनरल रोज के पास अविलम्ब ले चलना चाहिए।' उसको घेरकर गोरे अपनी छावनी की ओर बढ़े। शहर भर के गोरों में हल्ला फैल गया कि झांसी की रानी पकड़ ली गई. गोरे सिपाही खुशी में पागल हो गये। उनसे बढ़कर पागल झलकारी थी. उसको विश्वास था कि मेरी जांच - पड़ताल और हत्या में जब तक अंग्रेज उलझेंगे तब तक रानी को इतना समय मिल जावेगा कि काफी दूर निकल जावेगी और बच जावेगी।" झलकारी रोज के समीप पहुंचाई गई। वह घोड़े से नहीं उतरी। रानियों की सी शान, वैसा ही अभिमान, वही हेकड़ी- रोज भी कुछ देर के लिए धोखे में आ गया।"
अगर भारत की 1% महिलाएं भी झलकारी बाई जैसी हो जाएं, तो अंग्रेजों को जल्दी ही भारत छोड़ना होगा
ब्रिटिश जनरल ह्यूग रोज
बहादुरी देख अंग्रेजों के उड़े होश
वृंदावनलाल वर्मा ने आगे लिखा है कि दूल्हेराव ने जनरल रोज को बता दिया कि ये असली रानी नहीं है। इसके बाद रोज ने पूछा कि तुम्हें गोली मार देनी चाहिए। इस पर झलकारी ने कहा कि मार दो, इतने सैनिकों की तरह मैं भी मर जाऊंगी। झलकारी के इस रूप को अंग्रेज सैनिक स्टुअर्ट बोला कि ये महिला पागल है। इस पर जनरल रोज ने कहा नहीं स्टुअर्ट अगर भारत की 1 फीसदी महिलाएं भी इस जैसी हो जाएं तो अंग्रेजों को जल्दी ही भारत छोड़ना पड़ेगा '। रोज ने झलकारी को नहीं मारा। झलकारी को जेल में डाल दिया गया और एक हफ्ते बाद छोड़ दिया गया। आज भी झलकारी बाई की वीरता की कहानियां देशभर में पढ़ी और सुनी जाती हैं। साथियों इस वीडियो में इतना ही है आप सभी का वीडियो देखने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया धन्यवाद जय नमस्कार साथियों
No comments:
Post a Comment