Wednesday, September 13, 2023

माधव चमार की गरीबी और कफन || चमारों के हालात की असली वजह || चमारों की आँखें खोल देने वाली कथा

 


साथियों दो बाप बेटों की कहानी है घिसू चमार और माधव चमार दोनो ही निकम्मे थे उनके घर में एक औरत जो माधव की पत्नी थी साथ में ही रहती थी 

दोनों की ही काम करने की फितरत नहीं थी इसी वजह से लोग उनसे नफरत करते थे कहानी बड़ी ही हृदय विदारक है यानि शोक उत्पन करने वाली घटना है इस कहानी की स्थिति आज भी अपनी छाप छोड़ देती है कहीं कही आज भी दलितों में ऐसा देखने को मिल ही जाता हैं

साथियों कहानी में बताई घटना का असर आज भी दलितों में देखने को मिल जाता है नशा गरीबी को बढ़ावा देता है और व्यक्ति की मान प्रतिष्ठा को भी चूर चूर कर देता दलितों में अधिकांस लोग शराब या अन्य नशे को बहाना बना कर पीते है कि आज हमारे घर में शादी है आज बच्चे का जन्म दिन है आज कथा है आज घर में मेहमान आए है आज मैं बहुत दुखी हूं आज मैं गम भूलना चाहता हूं आज मैं बड़ा ही खुश हूं इसलिए मैं शराब पी रहा हूं साथियों हम अपनी सुध बुध खो रहे है अपना विवेक और अपनी समझ आदि को समाप्त कर रहे है पैसे की बरबादी और समय की बरबादी कर रहे है हमे ज्ञान होना चाहिए कि पैसे हमारी जरूरत है और पैसे ही हमे हमारे दुखों को दूर करता है हमारी जिंदगी के कष्टों का निवारण करता है हमे नई जिंदगी देता है हमे मेहनत से काम करना चाहिए और लगन करके आगे बढ़ना चाहिए साथियों जिनमे हौसला और जज्बा होता है वहीं लोग नई बुलंदियों को छूते है आसमा भी उनका स्वागत करता है आप कहानी को पूरा सुने वास्तव में आपको एक हकीकत नजर आएगी की हमारे समाज कैसी जिंदगी जीने पर मजबूर था और आज भी हम लोग किस तरह अपनी जिंदगी को काट रहे है हम पशुओं के भांति ही अपनी जिंदगी को ढौ रहें है हमे अपने जीवन में बहुत से बदलाव लाने ही होंगे तभी हम अन्य समाज के लोगो की बराबरी कर सकेंगे जिसने इस कहानी को अपने भीतर उतार लिया वो अपनी जिंदगी में कभी मार नही खा सकता है और जो इस कहानी को कहानी की तरह सोचने की भूल कर बैठेगा मैं समझता हूं कि वो अपनी जिंदगी में कभी आगे नहीं बढ़ पाएगा इस कहानी से हमे अपने समाज के लोग प्रेरणा देते है कि तुम हम जैसे मत बनो अपनी हिंदी में कुछ नया करके दिखाओ और नशे और गरीबी को घर से ही नही समाज से उखाड फेंको ताकि तुम्हे एक कफन के लिए भीख तक न मांगनी पड़े 

तो साथियों आइए कहानी का भरपूर आनंद लीजिए और अपनी जिंदगी की एक नई शुरुआत करने की कसम लीजिए कि हम और हमारा समाज इस बीमारी को जड़ से खत्म करें ताकि आगे। आने वाली पीढ़ी इस बुरे दौर से ना गुजरे हमने कहानी को बड़ी ही सूझ बुझ से चुना है ताकि समाज में एक नया परिवर्तन पैदा हो सके सभी साथियों को हमारी ओर से सादर जय भीम जय गुरु जी और जय संविधान सभी मूलनिवासी महापुरुषों की जय तो कहानी थोड़ी लंबी होगी लेकिन आपके द्वारा बिताए गए स्माय की भरपूर कीमत जरूर देगी कहानी को अंत तक देखना ना भूले साथियों कहानी इस प्रकार से है

आइए देखते है


 चमारों का एक कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम था। घिसु एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम करता। माधव इतना काम-चोर था कि आधे घण्टे काम करता तो घण्टे भर चिलम पीता। इसलिए उन्हें कहीं मजदूरी नहीं मिलती थी। घर में मुठ्ठी-भर अनाज था दोनो काम करना नही चाहते थे जब तक अनाज है तब तक काम पर जाने का कोई मतलब नहीं था। जब दो-चार फांके ही रह जाते तो घीसू पेड़ पर चढक़र लकडिय़ाँ तोड़ लाता और माधव बाज़ार में लकड़ियां बेच आता था और जब तक वे पैसे रहते, तो दोनों इधर-उधर बैठते फिरते थे। गाँव में काम की कमी न थी। किसानों का गाँव था, मेहनती आदमी के लिए पचास काम थे। मगर किसान इन दोनों को उसी वक्त बुलाते थे, जब जमीदार को कोई मजदूर ना मिलता और कोई चारा न होता। यह तो इनकी प्रकृति थी। विचित्र जीवन था इनका! घर में मिट्टी के दो-चार बर्तन के सिवा कोई सम्पत्ति नहीं थी फटे चिंथड़ों से अपने तन को ढक लेते थे। संसार की चिन्ताओं से मुक्त थे कर्ज़ से लदे हुए थे । गालियाँ भी खाते थे और मार अलग से पड़ती थे। फिर भी यारो को कोई गम न थी। दीन इतने थे कि कहीं से भी पैसे आदि मिलने की कोई आशा न थी फिर भी लोग इन्हें कुछ-न-कुछ कर्ज़ दे देते थे। मटर आलू की फसल के दौरान दूसरों के खेतों से मटर या आलू उखाड़ लाते और भून-भानकर खा लेते थे या दस-पाँच और आलू उखाड़ लाते और उन्हें रात में खा लेते थे। घीसू ने इसी तरह अपनी जिंदगी के करीब साठ साल काट लिए थे और माधव भी एक सच्चे बेटे की तरह बाप के पद-चिह्नों पर चल रहा था, बल्कि उसका नाम और भी उजागर कर रहा था। इस वक्त भी दोनों अलाव के सामने बैठकर आलू भून रहे थे, जो कि किसी के खेत से खोद कर लाये थे। घीसू की स्त्री का तो बहुत दिन पहले देहान्त हो गया था। माधव का ब्याह पिछले साल हुआ था। जब से माधव की पत्नी आयी थी, तब से उसने इस ख़ानदान में बदलाव की नींव डाल दी थी और इन दोनों बाप बेटों का पेट भी भरने लगी थी। जब से वह आयी, यह दोनों और भी आरामतलब हो गये थे। बल्कि कुछ अकडऩे भी लगे थे। कोई इन्हे काम पर बुलाता, तो दुगुनी मजदूरी माँगते थे एक दिन 

झोपड़े के द्वार पर दोनो बाप बेटा एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे थे और अन्दर बेटे की जवान बीबी बुधिया प्रसव-वेदना से परेशान थी। रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल दहला देने वाली आवाजे निकलती थी, कि दोनों ही अपना कलेजा थाम लेते थे। जाड़ों की रात थी, प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई थी, सारा गाँव अन्धकार में डूबा हुआ था।

घीसू ने कहा-मुझे तो ऐसा लगता है कि बचेगी नहीं मार जायेगी सारा दिन दौड़ते हो गए, जा देख तो आ।

माधव चिढक़र बोला-मरना ही तो है जल्दी मर क्यों नहीं जाती? देखकर क्या करूँ?

‘तू बड़ा बेदर्द है बे! साल-भर जिसके साथ सुख-चैन से रहा, उसी के साथ इतनी बेवफाई कर रहा है


‘तो मुझसे तो उसका तड़पना और हाथ-पाँव पटकना नहीं देखा जाता।’


वही औरत आज प्रसव-वेदना से मर रही थी और यह दोनों इसी इन्तजार में थे कि वह कब मरे तो आराम से सोयें।



घीसू ने आलू निकालकर छीलते हुए कहा-जाकर देख तो ले, क्या दशा होगी उसकी माधव बोला चुड़ैल का फिसाद होगा और क्या यहाँ तो ओझा भी झाड़ने का एक रुपया माँगता है

माधव अपने बाप से बोला 

तुम्हीं जाकर देखो न?’

घीसू बोला

‘मेरी औरत जब मरी थी, तो मैं तीन दिन तक उसके पास से हिला तक नहीं था और फिर वो मुझसे लजाएगी भी तो जिसका कभी मुँह नहीं देखा,उसे आज इस हाल में देखूं उसे अपने तन की सुध भी तो न होगी? 


‘मैं सोचता हूँ कोई बाल-बच्चा हुआ, तो क्या होगा? सोंठ, गुड़, तेल, कुछ भी तो नहीं है घर में!’


‘सब कुछ आ जाएगा। भगवान् दें तो! जो लोग अभी एक पैसा नहीं दे रहे हैं, वे ही कल बुलाकर रुपये देंगे। मेरे नौ लड़के हुए, घर में कभी कुछ न था; मगर भगवान् ने किसी-न-किसी तरह बेड़ा पार ही लगाया।’

हमारे समाज में रात-दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से कुछ ज्यादा अच्छी न थी, और किसानों के मुकाबले में वे लोग जो किसानों से लाभ उठाना जानते थे, कहीं ज़्यादा सम्पन्न थे, वहाँ इस तरह की मनोवृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी। हम तो कहेंगे, घीसू किसानों से कहीं ज़्यादा विचारवान् था और किसानों के विचार-शून्य समूह में शामिल होने के बदले बैठक बाजों की मण्डली में जा मिला था।हां उसमें यह शक्ति न थी, कि बैठकबाजो के नियम और नीति का पालन करता। इसलिए जहा उसकी मण्डली के लोग गाँव के सरगना और मुखिया बने हुए थे, इसीलिए घीसू पर सारा गाँव उँगली उठाता था। फिर भी उसे यह तसल्ली तो थी ही कि अगर वह फटेहाल है तो कम-से-कम उसे किसानों के जैसी जी-तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ती,और उसकी सरलता और गरीबी की वजह से दूसरे लोग बेवजह फ़ायदा तो नहीं उठाते है! दोनों बाप बेटे आलू निकाल-निकालकर जलते-जलते खाने लगे।


 कल से कुछ नहीं खाया था। इतना सब्र न था कि ठण्डा हो जाने दें। कई बार दोनों की जबानें जल गयीं। छिल जाने पर गर्म आलू का बाहरी हिस्सा जबान, हलक और तालू को जला देता था और उस अंगारे को मुँह में रखने से ज़्यादा जल्दी इसी बात की थी कि किसी तरह जल्दी पेट में पहुंचे । इसलिए दोनों जल्दी से जल्दी निगल जाते। हालाँकि इस कोशिश में उनकी आँखों से आँसू निकल आते थे


घीसू को उस वक्त ठाकुर की बरात याद आयी, जिसमें बीस साल पहले वह गया था। उस दावत में उसे जो तृप्ति मिली थी, वह उसके जीवन में एक याद रखने लायक़ बात थी, और आज भी उसकी याद ताजी थी, बोला-वह भोज नहीं भुलाया जाता । तब से आज तक उस तरह का भरपेट खाना नहीं मिला। लडक़ी वालों ने सबको भर पेट पूडिय़ाँ खिलाई थीं,छोटे-बड़े सबने पूडिय़ाँ खायीं और वो भी असली घी की! चटनी, रायता, तीन तरह के सूखे साग, एक रसेदार तरकारी, दही, चटनी, मिठाई, अब क्या बताऊँ कि उस भोज में क्या स्वाद मिला, कोई रोक-टोक नहीं थी, जो चीज़ चाहो, माँगो, जितना चाहो, खाओ। लोगों ने ऐसा खाया, ऐसा खाया, कि किसी से पानी न पिया गया। मगर परोसने वाले हैं कि पत्तल में गर्म-गर्म, गोल-गोल कचौडिय़ाँ डाल देते हैं। मना करते हैं कि नहीं चाहिए, पत्तल पर हाथ से रोके हुए हैं, मगर वह हैं कि दिये जाते हैं। और जब सबने मुँह धो लिया, तो पान-इलायची भी मिली। मगर मुझे पान लेने की कहाँ सुध थी? खड़ा हुआ न जाता था। चटपट जाकर अपने कम्बल पर लेट गया। ऐसे स्वभाव का था वह ठाकुर!


माधव ने इन पदार्थों का मन-ही-मन मजा लेते हुए कहा-अब हमें कोई ऐसा भोज नहीं खिलाता।


‘अब कोई क्या खिलाएगा? वह जमाना दूसरा था। अब तो सबको बचत की पड़ी है। सादी-ब्याह में खर्चा मत करो, क्रिया-कर्म में मत खर्च करो। पूछो, गरीबों का माल बटोर-बटोरकर कहाँ रखोगे? बटोरने में तो कमी नहीं है इनकी और हाँ, खर्च में बचत की सूझती इन्हें है!’


आलू खाकर दोनों ने पानी पिया और वहीं अलाव के सामने अपनी धोतियाँ ओढ़कर पाँव पेट में डाले सो रहे। जैसे दो बड़े-बड़े अजगर कुंडलियां मारे पड़े हों।


और बुधिया जो माधव की पत्नी है वो अभी तक कराह रही थी।

सबेरे माधव ने कोठरी में जाकर देखा, तो उसकी पत्नी ठण्डी हो गयी थी। उसके मुँह पर मक्खियाँ भिनक रही थीं। पथराई हुई आँखें ऊपर टँगी हुई थीं। सारी देह धूल से लथपथ हो रही थी। उसके पेट में बच्चा मर गया था।


माधव भागा हुआ घीसू के पास आया। फिर दोनों जोर-जोर से हाय-हाय करने और छाती पीटने लगे। पड़ोस वालों ने यह रोना-धोना सुना, तो दौड़े हुए आये और पुरानी मर्यादा के अनुसार इन अभागों को समझाने लगे।


मगर ज़्यादा रोने-पीटने का अवसर न था। कफ़न की और लकड़ी की फ़िक्र करनी थी। घर में तो पैसा इस तरह गायब था, जैसे चील के घोंसले में से माँस?


बाप-बेटे रोते हुए गाँव के जमींदार के पास गये। जमींदार इन दोनों की सूरत से ही नफ़रत करते थे। कई बार इन्हें अपने हाथों से पीट चुके थे। चोरी करने के लिए, वादे पर काम पर न आने के लिए। पूछा-क्या है बे घिसुआ, रोता क्यों है? अब तो तू कहीं दिखलाई भी नहीं देता! मालूम होता है, इस गाँव में रहना नहीं चाहता।


घीसू ने ज़मीन पर सिर रखकर आँखों में आँसू भरे हुए कहा-सरकार! बड़ी विपत्ति में हूँ। माधव की घरवाली रात को गुजर गयी। रात-भर तड़पती रही सरकार! हम दोनों उसके सिरहाने बैठे रहे। दवा-दारू जो कुछ हो सका, सब कुछ किया, मुदा यह कि वह हमें दगा दे गयी। अब कोई एक रोटी देने वाला भी न रहा मालिक! तबाह हो गये। घर उजड़ गया। आपका ग़ुलाम हूँ, अब आपके सिवा कौन उसकी मिट्टी पार लगाएगा। हमारे हाथ में तो जो कुछ था, वह सब तो दवा-दारू में उठ गया। सरकार ही की दया होगी, तो उसकी मिट्टी उठेगी। आपके सिवा किसके द्वार पर जाऊँ।


जमींदार साहब दयालु थे। मगर घीसू पर दया करना काले कम्बल पर रंग चढ़ाना था। जी में तो आया, कह दें, चल, दूर हो यहाँ से। यों तो बुलाने से भी नहीं आता, आज जब गरज पड़ी तो आकर खुशामद कर रहा है। हरामखोर कहीं का, बदमाश! लेकिन यह क्रोध या दण्ड देने का अवसर न था। जी में कुढ़ते हुए दो रुपये निकालकर फेंक दिए। मगर सान्त्वना का एक शब्द भी मुँह से न निकला। उसकी तरफ ताका तक नहीं। जैसे सिर का बोझ उतारा हो।


जब जमींदार साहब ने दो रुपये दिये, तो गाँव के बनिये-महाजनों को इनकार का साहस कैसे होता? घीसू जमींदार के नाम का ढिंढोरा भी पीटना जानता था। किसी ने दो आने दिये, किसी ने चारे आने। एक घण्टे में घीसू के पास पाँच रुपये की अच्छी रकम जमा हो गयी। कहीं से अनाज मिल गया, कहीं से लकड़ी। और दोपहर को घीसू और माधव बाज़ार से कफ़न लाने चले। इधर लोग बाँस-वाँस काटने लगे।


गाँव की नर्मदिल स्त्रियाँ आ-आकर लाश देखती थीं और उसकी बेकसी पर दो बूँद आँसू गिराकर चली जाती थीं।


बाज़ार में पहुँचकर घीसू बोला-लकड़ी तो उसे जलाने-भर को मिल गयी है, क्यों माधव!


माधव बोला-हाँ, लकड़ी तो बहुत है, अब कफ़न चाहिए।


‘तो चलो, कोई हलका-सा कफ़न ले लें।’


‘हाँ, और क्या! लाश उठते-उठते रात हो जाएगी। रात को कफ़न कौन देखता है?’


‘कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते जी तन ढकने को चीथड़ा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए।’


‘कफ़न लाश के साथ जल ही तो जाता है।’


‘और क्या रखा रहता है? यही पाँच रुपये पहले मिलते, तो कुछ दवा-दारू कर लेते।’


दोनों एक-दूसरे के मन की बात ताड़ रहे थे। बाज़ार में इधर-उधर घूमते रहे। कभी इस की दूकान पर गये, तो कभी उसकी दूकान पर!गए तरह-तरह के कपड़े, रेशमी और सूती देखे, मगर कुछ जँचा नहीं। यहाँ तक कि शाम हो गयी। तब दोनों न जाने किस दैवी प्रेरणा से एक मधुशाला के सामने जा पहुँचे। और जैसे किसी पूर्व निश्चित व्यवस्था से अन्दर चले गये। वहाँ जरा देर तक दोनों असमंजस में खड़े रहे। फिर घीसू ने गद्दी के सामने जाकर कहा-साहूजी, एक बोतल हमें भी देना।


उसके बाद कुछ चखना आया, तली हुई मछली आयी और दोनों बरामदे में बैठकर शान्तिपूर्वक पीने लगे।


कई कुज्जियाँ ताबड़तोड़ पीने के बाद दोनों सरूर में आ गये।


घीसू बोला-कफ़न लगाने से क्या मिलता? आखिर जल ही तो जाता। कुछ बहू के साथ तो न जायेगा।


माधव आसमान की तरफ देखकर बोला, मानों देवताओं को अपनी निष्पापता का साक्षी बना रहा हो-दुनिया का दस्तूर है, यूहीं लोग ब्राह्मणों को हजारों रुपये क्यों दान दे देते हैं? कौन देखता है, परलोक में मिलता है या नहीं!


‘बड़े आदमियों के पास धन है, हमारे पास लास फूँकने को भी धन नहीं है?’


‘लेकिन लोगों को जवाब क्या दोगे? लोग पूछेंगे नहीं, कफ़न कहाँ है?’


घीसू हँसा-अबे, कह देंगे कि रुपये कमर से खिसक गये। बहुत ढूँढ़ा, मिले नहीं। लोगों को विश्वास न आएगा, लेकिन फिर वही रुपये देंगे।


माधव भी हँसा-इस अनपेक्षित सौभाग्य पर। बोला-बड़ी अच्छी थी बेचारी! मरी तो खूब खिला-पिलाकर!


आधी बोतल से ज़्यादा उड़ गयी। घीसू ने दो सेर पूडिय़ाँ मँगाई। चटनी, अचार, कलेजियाँ। शराबखाने के सामने ही दूकान थी। माधव लपककर दो पत्तलों में सारे सामान ले आया। पूरा डेढ़ रुपया खर्च हो गया। सिर्फ थोड़े से पैसे बच रहे थे


दोनों इस वक्त इस शान में बैठे पूडिय़ाँ खा रहे थे जैसे जंगल में कोई शेर अपना शिकार उड़ा रहा हो। न जवाबदेही का खौफ था, न बदनामी की फ़िक्र। इन सब भावनाओं को उन्होंने बहुत पहले ही जीत लिया था।


घीसू दार्शनिक भाव से बोला-हमारी आत्मा प्रसन्न हो रही है तो क्या उसे पुन्न न होगा?


माधव ने श्रद्धा से सिर झुकाकर तसदीक़ की-जरूर-से-जरूर होगा। भगवान्, तुम अन्तर्यामी हो। उसे बैकुण्ठ ले जाना। हम दोनों हृदय से आशीर्वाद दे रहे हैं। आज जो भोजन मिला वह कभी उम्र-भर न मिला था।


एक क्षण के बाद माधव के मन में एक शंका जागी। बोला-क्यों दादा, हम लोग भी एक-न-एक दिन वहाँ जाएँगे ही?


घीसू ने इस भोले-भाले सवाल का कुछ उत्तर न दिया। वह परलोक की बातें सोचकर इस आनन्द में बाधा न डालना चाहता था।


‘जो वहाँ हम लोगों से पूछे कि तुमने हमें कफ़न क्यों नहीं दिया तो क्या कहोगे?’


‘कहेंगे तुम्हारा सिर!’


‘पूछेगी तो जरूर!’


‘तू कैसे जानता है कि उसे कफ़न न मिलेगा? तू मुझे ऐसा गधा समझता है? साठ साल क्या दुनिया में घास खोदता रहा हूँ? उसको कफ़न मिलेगा और बहुत अच्छा मिलेगा!’


माधव को विश्वास न आया। बोला-कौन देगा? रुपये तो तुमने चट कर दिये। वह तो मुझसे पूछेगी। उसकी माँग में तो मैंने सिंदूर डाला था।


‘कौन देगा, बताते क्यों नहीं?’


‘वही लोग देंगे, जिन्होंने अब दिया है। हाँ, अबकी रुपये हमारे हाथ न आएँगे।’


‘ज्यों-ज्यों अँधेरा बढ़ता था और सितारों की चमक तेज होती थी, मधुशाला की रौनक भी बढ़ती जाती थी। कोई गाता था, कोई डींग मारता था, कोई अपने संगी के गले लिपटा जाता था। कोई अपने दोस्त के मुँह में कुल्हड़ लगाये देता था।


वहाँ के वातावरण में सरूर था, हवा में नशा था। कितने तो यहाँ आकर एक चुल्लू में मस्त हो जाते थे। शराब से ज़्यादा यहाँ की हवा उन पर नशा करती थी। जीवन की बाधाएँ यहाँ खींच लाती थीं और कुछ देर के लिए यह भूल जाते थे कि वे जीते हैं या मरते हैं। या न जीते हैं, न मरते हैं।


और यह दोनों बाप-बेटे अब भी मजे ले-लेकर चुसकियाँ ले रहे थे। सबकी निगाहें इनकी ओर जमी हुई थीं। दोनों कितने भाग्य के शाली हैं! पूरी बोतल बीच में है।


भरपेट खाकर माधव ने बची हुई पूडिय़ों का पत्तल उठाकर एक भिखारी को दे दिया, जो खड़ा इनकी ओर भूखी आँखों से देख रहा था। और देने के गौरव, आनन्द और उल्लास का अपने जीवन में पहली बार अनुभव किया।


घीसू ने कहा-ले जा, खूब खा और आशीर्वाद दे! जिसकी कमाई है, वह तो मर गयी। मगर तेरा आशीर्वाद उसे ज़रूर पहुँचेगा। रोयें-रोयें से आशीर्वाद दो, बड़ी गाढ़ी कमाई के पैसे हैं!


माधव ने फिर आसमान की तरफ देखकर कहा-वह बैकुण्ठ में जाएगी दादा, बैकुण्ठ की रानी बनेगी।

घीसू खड़ा हो गया और जैसे उल्लास की लहरों में तैरता हुआ बोला-हाँ, बेटा बैकुण्ठ में जाएगी। किसी को सताया नहीं, किसी को दबाया नहीं। 

कफ़न 2

माधव चमार की गरीबी और कफन 

पियक्कड़ों की आँखें खोल देने वाली कथा


मरते-मरते हमारी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर गयी। वह न बैकुण्ठ जाएगी तो क्या ये मोटे-मोटे लोग जाएँगे, जो गरीबों को दोनों हाथों से लूटते हैं, और अपने पाप को धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मन्दिरों में जल चढ़ा

श्रद्धालुता का यह रंग तुरन्त ही बदल गया। अस्थिरता नशे की ख़ासियत है। दु:ख और निराशा का दौरा हुआ।


माधव बोला-मगर दादा, बेचारी ने ज़िन्दगी में बड़ा दु:ख भोगा। कितना दु:ख झेलकर मरी!


वह आँखों पर हाथ रखकर रोने लगा। चीखें मार-मारकर रोने लगा ।


घीसू ने समझाया-क्यों रोता है बेटा, खुश हो कि वह माया-जाल से मुक्त हो गयी, जंजाल से छूट गयी। बड़ी भाग्यवान थी, जो इतनी जल्द माया-मोह के बन्धन तोड़ दिये।


और दोनों खड़े होकर गाने लगे- ‘ठगिनी क्यों नैना झमकावे! ठगिनी।


पियक्कड़ों की आँखें ।इनकी ओर लगी हुई थीं और यह दोनों अपने दिल में मस्त गाये जाते थे। फिर दोनों नाचने लगे। उछले भी, कूदे भी। गिरे भी, मटके भी। भाव भी बताये, अभिनय भी किये। और आखिर नशे में मदमस्त होकर वहीं गिर पड़े सभी साथियों इस पेज को ज्यादा से ज्यादा लोगो के पास शेयर करे 

साथियों हमारी ओर से जय भीम 




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