चमारीनऔर ठाकुराइन part 1,
। बालों में पल्लो हाथ में पल्लो और पल्लो के ही बैल बनाकर खेलती सोनवा को देखकर अनायास ही दीनानाथ के मुँह से निकल गया – ‘अमरपाली’ ।
उस समय सोनवा को अमरपाली का मतलब समझ में नहीं आया था । आता भी कैसे ? लगभग सात बरस के बच्चे में इतनी समझ ही कहाँ होती है । हालांकि उसका नाम सोनवा भी न था लेकिन सोने जैसी चमकती देह देखकर उसे सब सोनवा-सोनवा बुलाने लगे और वह अपना असली नाम भूल गयी । सोनवा ठकुरघराने के ओसारे के सामने दुआरे पर बैठ कर अपनी मजूरी का इन्तज़ार कर रही थी लेकिन ठकुराइन की कटारी जैसी चुभती नज़र उसे अन्दर ही अन्दर काटे जा रही थी । लहू-लुहान हो रही थी सोनवा लेकिन नज़र उठाकर उनकी ओर देखना गँवारा नहीं था । उसे डर था कि अगर कहीं वह ऊपर नज़र उठायी तो ठकुराइन के लीलार से उठी हुई भर माँग सेनूर और सूरज की तरह चमकती टिकूली से उसे जलाकर भष्म न कर दे । आखिर सुहागन में इतनी ताकत तो होती ही है !
ताकत तो इसमें भी कम न थी, दो-दो ठाकुरों को… वह भी बाप-बेटे दोनों को अपने बस में कर रखा था, उस समय तिलमिला कर रह गयी थीं बड़ी ठकुराइन । पति और बेटे के बीच दिनों-दिन आपस में बढ़ती नफरत से बिस्तर पकड़ लीं । बेटा रघुराज घर का पहला वारिस… आगे चलकर वही तो मालीक बनेगा लेकिन अभी से मलिकाना हक़ दिखाने लगा । हक़ तो उसका भी छीन लिया था पिता ने, शायद इसी बात का वह बदला ले रहा हो । वह भूल नहीं पा रहा था कि उसकी प्रेमिका… जिसके साथ वह जिन्दगी के सुनहरे सपने देख रहा था, उसे कैसे पिता ने बरगला लिया और अपनी रखैल बना लिया ! आखिर कोई पिता ऐसा कैसे कर सकता है !
ठाकुर साहब असल में ठाकुर न थे न ही जमींदार और न ही वह रौब जो ठाकूरों में होता है । ओझा होते हुए भी पचास-साठ एकड़ जमीन होना किसी ठकुरई से कम तो नहीं । जमींदार, भूमिहार या ठाकुर यही नाम अधिक जमीन वालों के लिए प्रचलित था । उनके पुरखों का रौब थोड़ा-थोड़ा ठाकूरों से मिलता था, नौकर-चाकर आगे-पीछे घुमते रहते, उनके घर में काम करके कइयों के घर का चूल्हा जल जाता इसलिए गाँव- में उनकी ईज्ज़त ठाकुर साहब जैसे हो गयी ।
सोनवा की माई रमयनिया रोपनी सोहनी कटिया यानि मजदूरी करने आस-पास के गाँव में जाती ही, विशेष रूप से ठाकुर साहब के खेत की रोपनी, सोहनी, कटिया, दँवरी करती । साथ में अपने तीनों बच्चों को भी ले जाती । सोनवा सबसे बड़ी थी इसलिए उसकी जिम्मेदारी भी बड़ी थी । जब उसकी माई खेतों में काम करती तब वह चकरोट पर अपने दोनों भाइयों की देखभाल करती । सोनवा के रहते रमयनिया को कभी अपने बच्चों की चिंता न हुई । सोनवा की सुन्दरता पर हर ठाकुर, मजहूरों और राहगीरों की नज़र रहती । धीरे-धीरे सोनवा की अल्हड़ता संजीदगी में बदल गयी और वह तेरह-चौदह साल में ही जवान हो गयी । अपने माई के साथ-साथ वह भी कटिया-सोहनी करने लगी, उसे भी मजूरी मिलने लगी । खाना बनाने, रोपनी-सोहनी करने में निपुण सोनवा के लिए रिश्ते भी आने लगें लेकिन उसकी माई को अपने दोनों बच्चे पालने थे, उन्हें पढ़ाना लिखाना था इसलिए वह हर रिश्ते को लात मारती गयी यह कहकर कि हमारी सोनवा सोना है बडे होने पर और अच्छे रिश्ते आयेंगे ।
खेतों में कटिया करती, बोझा बाँधती
ऊँच-नीच में तनिको भेद-भाव नाहीं करते बड़े ठाकुर, खुद ही बोझा बन्हवा देते हैं, लगता ही नहीं कि इतने बड़े आदमी हैं’ – रमयनिया बड़े ठाकुर से कहते हुए एहसान तले दबे होने के भाव से मुस्कराकर हाथ जोड़ लेती थी ।
ठाकुर का सीना गर्व से चौड़ा हो गया और माथा आकाश में तन गया – ‘आदमी वही है रमयनिया, जो सबको बराबर समझे । इ तो हमारे धर्म–करम ने हमको बाँध रखा है कि हम तुम्हारा छूआ खा पी नहीं सकते । लेकिन देखा जाय तो छुआ तो तुम्हारे ही लोगों का खा रहे हैं आखिर पहला छूअन तो तुम्हीं लोगों का है (अपनी हाथ को देखकर सहलाते हुए) । तुम लोग इतनी मेहनत न करते तो हमारे पेट में अन्न का दाना भी न जाता । पर नियम तो नियम है भोजन बनने पर शुद्ध हो जाता है और हम उसे ही खाकर जीवित हो उठते हैं’ ।
‘यह तो आप मान रहे हैं बड़े ठाकुर, वरना बहुत लोग तो हम चमारन के आदमी ही नाहीं समझतें’ ।
‘हमरे मामले में ऐसा मत समझना… हमार सोच तनिक हट के है’ ।
सोनवा चुपचाप सुनती और बड़े ठाकुर की उनके ही मुँह से भले-मानूसी की बड़ाई सुनकर अघाती नहीं । जैसे बड़े ठाकुर थे वैसे ही उनके पुत्र छोटे ठाकुर… भले मानूस । वे बेचारे ज्यादा बोलते भी न थे । खेत की मेड़ पर से ही सबको दिशा-निर्देश जारी कर देतें कि काम टाइम से होना चाहिए । तनिको कोताही न बरती जाय, नहीं तो मजूरी काट ली जायेगी । बेचारे पढ़े-लिखे छोटे ठाकुर को का मालूम खेत का काम, लेकिन फिर भी बाबूजी का हाथ बँटाने आ ही जातें । चार-पाँच सालों में कभी भी उन्होंने मेड़ से नीचे खेत में लात नाहीं रखा । पर एक समय ऐसा आया जब उन्हें बड़े ठाकुर की गैरहाजिरी में रोपनी के समय लेव लगे भाँस में उतरना पड़ गया । सोनवा मजूरहों के साथ रोपनी कर रही थी । उसने अपनी सलवार घुटने तक मोड़कर ऊपर कर लिया और दुपट्टा सीने पर फैलाकर पीछे से गोल घुमाते हुए कमर में रस्सी की तरह कस कर बाँध लिया था । आसमान से झरते झींसा से उसके देह से चिपकी समीज मेड़ पर खड़े छोटे ठाकुर के आँखों में चिपक गया । लाख ध्यान हटाने के बाद भी आँखें बार-बार उसकी देह से चिपक जातीं और उसमें से फूटती मिट्टी की सोंधी गंध से मदहोश हो जातें । वैसे तो सोनवा भी छुप-छुपकर छोटे ठाकुर को निहारा करती, लेकिन छोटे ठाकुर की नज़र पड़ने से पहले ही वह कजरी गा-गाकर इस तरह से धान की पूजी रोपने लगती जैसे उसने कभी छोटे ठाकुर की ओर देखा भी न हो ।
“…’ धान की मूंजी माटी में गाड़ते हुए पैरों के बीच से तिरछी नज़र सोनवा की ओर देखा । सोनवा का जी जल उठा लेकिन बिना बोले मूंजी रोपने लगी
इतने में रमदेऊवा पूजी रोपते हुए सोनवा की कमर में हाथ डाल दिया वह गिरइया मछरी की तरह छटपटा गयी और जब तक कुछ समझ पाये उसके कमर में बँधे दुपट्टे को उसने खोल दिया । सोनवा मुड़ कर जैसे ही भागी दुपट्टा उसके गले में फंस गया और उसकी साँस अटक गयी ।
मजदूरो में इस तरह की हँसी-ठिठोली आम बात थी इसलिए रोपाई छोड़कर कोई उनके नजदीक नहीं गया । रमदेऊवा दुपट्टा खींचते हुए नजदीक पहुँच गया और उसका हाथ छाती से होते हुए कमर तक सांप की तरह रेंग गया । सोनवा की घुटती आवाज ऊँ..ऊँ… को भाँपते हुए छोटे ठाकुर पीछे से रमदेऊवा के गर्दन पर एक छड़ी बजा दिए । रमदेऊवा छटपटाकर रह गया उसका हाथ ढ़ीला पड़ गया । जैसे ही दूसरी छड़ी छोटे ठाकुर उठाए रमदेऊवा ने घुटने पर गिरकर हाथ जोड़ने लगा – ‘माफ करिं छोटे ठाकुर, माफी…’ ।
सभी मजदूर हक्का बक्का रह गयें । साथ की मजूरहिनों ने सोनवा को थाम लिया और उसे चकरोट पर ले आयीं । वह साँस भी नहीं ले पा रही थी छोटे ठाकुर ने उसे पानी पिलाया । साँस आने पर भी वह रोपनी करने के लिए हिम्मत नहीं जुटा पायी । अंधेरा होने पर ही मजदूर घर लौटते हैं, पर उससे अब इंतजार नहीं किया जा रहा था फिर भी कीचड़ सने चकरोट पर वह बैठी रही ।
जितना सोनवा परेशान उतना ही छोटे ठाकुर । उन्होंने मजदूरो को कह दिया कि तुम लोग काम करो हम सोनवा को उसके घर मोटरसाइकिल से छोड़ आते हैं । मजूरहा अचम्भा से गलहत्थी दे लिए कि “कहाँ छोटे ठाकुर आप और कहाँ सोनवा… कैसे आपके मोटरसाइकिल पर… यह हमारे साथ चली जायेगी…”
छोटे ठाकुर ने अपना रौब दिखाते हुए कहा – “देख नहीं रहे कि इसके पास हिम्मत नहीं है, ये कैसे जायेगी पैदल घर ? काम खतम करके ही तुम सब यहाँ से हटोगे” ।
बात तो सही थी कि एक ही मोटरसाइकल पर छोटे ठाकुर और सोनवा !! ठाकुर साहब का तो धरम भरस्ट हो जायेगा ! लेकिन ठाकुर साहब को अपने धरम की चिंता नाहीं तो मजदूर क्या करें ! सोनवा बैठ चली छोटे ठाकुर के साथ मोटरसाइकिल पर ! बैठ तो गयी पर इतनी डरी-सहमी कि हचका से कहीं गिर न जाये या गलती से भी छोटे ठाकुर की पीठ से छुआ न जाय । ऊबड़-खाबड़ माटी के चकरोट, खडन्जा चकरोट से गुजरते हुए मोटरसाइकिल हचक जाता और सोनवा किचकिचा कर हैन्डिल (ग्रेब हैंडल) पकड़ लेती । एक हचका पर तो छोटे ठाकुर को लगा कि वह मोटरसाइकिल से गिर गयी वे सोनवा सोनवा बुलाते ही रह गये, डर के मारे वह बोली ही नहीं । फिर ठाकुर ने कहा – ‘मुझे पकड़ लो, कट नहीं जाओगी सोनवा’ ।
‘नाहीं छोटे ठाकुर, हम आपको कैसे छू सकते हैं’ ?
‘हा..हा…हा… (हँसते हुए) दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गयी और तुम छुआ-छूत लेकर बैठी हो । पकड़ लो मुझे… पकड़ो…’
सोनवा के न पकड़ने पर उन्होंने खुद ही उसका हाथ खींच कर अपने कमर में बाँध दिया ।
चौराहे से गुजरते हुए बड़े ठाकुर की नज़र अचानक छोटे ठाकुर पर पड़ी और पीछे सोनवा को सटकर बैठा देख कट कर रह गयें । शाम को आग ऊगलते बड़े ठाकुर छोटे ठाकुर के पास जा पहुँचे, स्थिति का जायजा लेने के बाद उन्होंने सोनवा को चरित्रहीन साबित करने में कोई कसर न छोड़ी, ‘तुम्हें क्या लगता है कि रमदेऊवा ऐसे ही उसका दुपट्टा खींचा होगा ? पहले से दोनों में सान-मटक्की चल रही थी । तुमसे ही समझने में भूल हो गयी है’ ।
‘ऐसी बात नहीं है बाबूजी । मैंने खुद अपनी आँखों से देखा है रमदेऊवा की बेहुदगी । सोनवा एक अच्छी लड़की है’ ।
‘आज के जन्मे तुम का जानोगे । हमें मजूरहों के रग-रग की पहचान है । आज के बाद तुम खेत में कदम नहीं रखोगे’।
‘बाबूजी… सोनवा वैसी नहीं है…’
बात काटते हुए “तो कैसी है… अपनी हद में रहो । वो बदचलन यहाँ तक पहुँच गयी ? जैसे सारे मजूरहों को फँसा के रखी है वैसे ही तुमको भी फँसा रही है । अच्छा हुआ कि हमें पहले ही ये सब पता चल गया” ।
छोटे ठाकुर के साथ-साथ बडी ठकुराइन को भी हिदायत और चेतावनी मिल गयी, “सम्भाल लो अपने बेटे को । बहुत उड़ने लगा है । आज के बाद खेत में दिखा तो हाथ-पाँव तोड़कर रख दूँगा” ।
उस दिन के बाद हर दिन सोनवा को छोटे ठाकुर का इंतजार रहने लगा लेकिन छोटे ठाकुर कभी दिखायी नहीं दिए । वह पहली बार मोटरसाइकिल पर बैठी थी, हालांकि उसका बहुत मन करता बैठने को पर नहीं जानती थी कि जिसे मन ही मन अपने मंदिर का देवता मान चुकी है, वह देवता खुद ही पूजा लेने आ जायेगा । छोटे ठाकुर की पीठ जैसे सीने से अब तक सटा रह गया हो बार-बार वे उसका हाथ खींच अपने पेट पर रखकर पकड़ने के लिए कह रहे हों । वह बार अपने हाथ को खींचती लेकिन हाथ फिर फिर जाकर उन्हें पकड़ ही ले रहे हों । कभी-कभी सोचती छीः हम का सोचते रहते हैं दिनभर-रातभर । कहाँ वो और कहाँ हम । कवनो बराबरी नाहीं ।
रोपनी के बाद सोहनी का दिन आ गया लेकिन छोटे ठाकुर दिखायी नहीं दिए । दिन-ब-दिन बड़े ठाकुर सोनवा को पहले से ज्यादा जानने-मानने लगें । बड़े ठाकुर की दरियादिली उसके माई-दादा से होकर सोनवा पर आयी इसलिए उनकी छत्रछाया भली लगती । सोनवा के माई-दादा के नाम दो गट्ठा खेत दान में दे दिया बड़े ठाकुर ने । उस पर छान छाकर दो गोरू भी बाँध दिए गये । घर ही से दूध मिलने लगा । सोनवा के दोनों भाइयों की फीस बड़े ठाकुर भरने लगें । आस-पास के लोगों के लिए भी कुछ न कुछ कर ही दिया । खडन्जा बिछवाना, घरों में अनाज पहुँचाना, बच्चों की फीस भर देने से सारे चमार बस्ती में बड़े ठाकुर के देवता अवतार की बखान शुरू हो गयी । उनमें से सोनवा भी एक थी । जाने कब उसके दिल में बसे छोटे ठाकुर की याद पर धूल माटी पड़ गया और अब वह बड़े ठाकुर की भक्त बन गयी । बड़े ठाकुर से मिले एक के बाद एक कपड़े, साड़ी उसे सहज लगने लगा । जिस दिन उसे कान में पहनने के लिए सोने का कुण्डल मिला वह तो नाच उठी, ऐसा लगा कि उछलकर बड़े ठाकुर को पकड़ ही लेगी, लेकिन उछलते उछलते रूक गयी और आँखों में आँसू भर कर बोली, ‘बड़े ठाकुर… सपना तो बहुत कुछ है, पर हमारे भाग में सपना पूरा होना नाहीं लिखा है… रउरे इ कुण्डल रख लिजिए । राऊर आशिर्वाद ही काफी है’
चमारीन और ठाकुराइन पार्ट 2
कैसी बात करती हो अमरपाली, दान देकर वापस नाहीं लेतें । रूक काहें गयी, उछलो, कूदो, खुशियाँ मनाओ । तुम्हारे सारे सपने तो नहीं लेकिन कुछ सपने तो हम पूरा कर ही देंगे’ ।
‘नाहीं, इ हम नाहीं ले सकते… एतना मँहगा सामान क कौनों जरूरत नाहीं है । रऊरे छत्रछाया में पलना ही बहुत है’ ।
‘काहें, तुम हमें अपना नाहीं समझती ? हम तो तुम लोगों को अपनों से भी बढ़कर समझते हैं । इस बात के लिए बहुत बार लड़ाई हो जाती है मेरी बीवी से, भाई से, नात रिश्तेदारों से कि काहें हम तुम लोगों पर पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं । लेकिन मैं सोचता हूँ कि एक बार तुम लोगों की जिन्दगी ढ़र्रे पर आ जाय, गरीबी दूर हो जाये तो मैं भी शुकून से मर सकूँगा’ ।
‘बड़े ठाकुर ! ऐसा मत कहिए, मरे आपके दुश्मन’ । ठाकुर के मुँह पर हाथ रखते हुए सोनवा बोल पड़ी, लेकिन इस बात का एहसास होते ही कि उसने गलती किया है वह सकुचा गयी और हाथ पीछे खींच ली ।
‘रखो न आम्रपाली… मेरे मुँह पर हाथ रखो… अपनेपन का एहसास होता है । हम तुम्हें अपना समझते हैं तो तुम भी तो हमें अपना समझो…’ । ठाकुर की आँखें छलछला आयीं । उन्होंने उसका हाथ अपने हाथों में लेकर खुद ही मुँह पर रख दिया । बड़े ठाकुर की इस अपनाइत से सोनवा की भी आँखें भर आयीं । वर्षों से अछूत होने का ज़हर पीती सोनवा की पीढ़ी आज धन्य हुई । खुद ठाकुर साहब उसके घर में हैं । उसके हथेलियों को अपने दोनों हथेलियों के बीच दबाकर देर तक बैठे रहें । दोनों में कोई बराबरी नहीं लेकिन सोनवा बड़े ठाकुर के साथ एक ही खटिया पर बैठ कर समानता का एहसास करने लगी और बड़े ठाकुर के उच्च विचार पर मन ही मन गौरवान्वित होने लगी । सचमुच देवता यही हैं ।
सोनवा बीस साल की हो चुकी है । वैसे भी उसकी उम्र गाँव के हिसाब से बहुत ज्यादा हो गयी है । पैसे रूपये न होने की वजह से बियाह नाहीं हुआ और अब उसके लिए कूँवार लड़का मिलना मुश्किल हो गया । शरीर गदरा गयी और इसकी गदरायी शरीर ठकुराइनों को भी मात देती है । बड़ी मुश्किल से उसका बियाह एक कूँवार लड़के रामनाथ से ठीक हो पाया । ठाकुर साहब ने दिलासा दिया कि जो कुछ भी उनसे बन पड़ेगा वे शादी में खर्च करेंगे, लेकिन दायरे में रहकर । धन्य धन्य हो गया पूरा परिवार । दिसम्बर में बियाह और गवना दोनों साथ होने वाला था । शादी के एक महिने पहले से तैयारियाँ जोर शोर से चलने लगीं । रमयनिया का पैर धरती पर न पड़ते उसके हाथ में गड्डी के गड्डी पैसे जो थे । उस दिन वह सोनवा के लिए कपड़े लत्ते खरीदने की खातीर बाज़ार गयी थी । दोनों भाई स्कूल में थे और दादा पीकर कहीं ढ़हे पड़े होंगे ऊँखीयाड़ी में या फिर पुलिया के नीचे । बड़े ठाकुर बहुत उदास-उदास थे और आकर सोनवा के घर में खटिया पर बैठ गयें । सोनवा घबरा गयी और जल्दी से एक लोटा पानी हाथ में थमाते हुए पूछ पड़ी, ‘का बात है बड़े ठाकुर, तबीयत तो ठीक है ना ? बड़े उदास लग रहे हैं ? घर में सब ठीक है कि नहीं’ ?
‘हाँ… सब ठीक है । मुझे तुम्हारी चिंता हो रही थी’ ।
‘हमारी’
‘हाँ अमरपाली… अब तुम ससुराल चली जाओगी । बहुत याद आयेगी तुम्हारी । इतने दिनों में तुम बिल्कुल अपनी-सी लगने लगी । तुम बहुत भोली हो । पता नहीं कैसे होंगे वहाँ के लोग ? तुम्हारी देखभाल ठीक से कर पायेंगे या नहीं’ ।
‘हमें भी सबकी बहुत याद आयेगी । चिंता मत कीजिए । सुना है ठीक ठाक लोग हैं । नया नया बना दुतल्ला मकान है । खाने-पीने की कवनों कमी नाहीं है’ ।
‘चलो तुम्हारी बात सुनकर मैं निश्चिन्त हो गया । (बात बदलते हुए) अच्छा देखो मैं तुम्हारे लिए क्या लाया हूँ’ । (सोने की हार दिखाते हुए)
‘हाँSSS… (सोनवा का मुँह खुला का खुला रह गया) इतना सुन्दर… हम तो कभी मंदिर नहीं गये लेकिन पूरा भरोसा है कि भगवान आप ही की तरह होते होंगे’ । हार के सामने हार गयी सोनवा या फिर महीनों से फूटती दरियादिली अब बाढ़ बन गयी । उसे कुछ असहज नहीं लगा और बड़े ठाकुर के गले लग गयी । ठाकुर साहब की वर्षों की तपस्या आज पूरी हुई । सोनवा की पीठ, कमर, वक्ष आज सब कुछ उनके लिए सहज ही समर्पित होता चला गया । उसे लगा कि इस समर्पण के लिए वह कब से तरस रही थी । सोनवा ने अपने भगवान को सर्वस्व समर्पित कर तृप्ति की साँस ली । साथ ही उसे इस बात की सांत्वना भी मिल गयी कि यदि वह आगे ठाकुर साहब का भोग लगाती रही तो ठाकुर साहब अपने जान से प्यारी अमरपाली को अपने हिस्से की कुछ जमीन और घर भी दान में दे देंगे, जिसमें वह देवी बनकर पूजी जायेगी । सोनवा को अपने समर्पण पर कोई ग्लानि न हुई बल्कि वह उनके एहसानों का प्रतिदान समझकर सम्पूर्ण हो गयी । वह सिर्फ एहसानों का प्रतिदान नहीं था बल्कि प्रेम का वह बहाव था जिसमें उसे एक महिने में बहकर सिमटना भी था ।
जैसे जैसे बियाह का दिन नजदीक आता जा रहा था सोनवा सिमटने के बजाय पूरे आवेग के साथ बहती जा रही थी । उसके लिए रामनाथ से बियाह करना भारी लगने लगा और बड़े ठाकुर से बिछड़ जाने के कचोट में हर रोज भोग लगाने लगी । उसे पवित्रता में विश्वास था और उस पवित्रता का जूठन भी रामनाथ को सौंपना नहीं चाहती थी । रोते-धोते ससुराल तो पहुँच गयी । सारे रश्मों-रिवाज को पूरा वह दुतल्ला मकान के ऊपरी तल्ले पर, जहाँ सिर्फ दो ही कमरा बना था, उसमें से एक कमरे में उसे बैठा दिया गया । उसने ध्यान से कमरे और छत का मुआयना किया । उसके मायके में ऐसा कमरा नहीं था लेकिन बड़े ठाकुर के दिए हुए सपनों की दुनिया में से किसी भी हिस्से का हिस्सा नहीं था । दिन ढ़ल गया, सब लोग खा-पीकर मस्त हो गये कमरे में सोनवा को दूलहे का इन्तजार करना था । सोनवा के मन-मंदिर में एक ही देवता की मूर्ति की जगह थी, उसमें किसी और की मूर्ति स्थापित करना उसके लिए मुस्कील हो गया । वह अपना गहना-गुरिया एक गठरी में बाँध कर छत से कूद गयी और नीचे बड़े ठाकुर ने उसे गोदी में लोक लिया और दूर कहीं छिपायी गाड़ी झट से नजदीक आ गयी जिसमें बैठकर वे दोनों नौ-दो ग्यारह हो गयें ।
भगा तो लाये बड़े ठाकुर…! लेकिन रखे कहाँ ? वापस लाकर पटक दिया मायके में । थू-थू हाय-हाय मार-मार की पीड़ा का अन्दाजा भागने से पहले सोनवा को न था । उसके माँ-बाप तो बड़े ठाकुर को कुछ कह न सके लेकिन सोनवा को झपिला झपिला कर उसके आधे प्राण हर लिये । उसके दोनों भाई मारे शरम के घर से बाहर निकलना बंद कर दिए । उसका पति कई बार आया उसके आँखों के सामने गिड़गिड़ा कर गया, “ईज्ज़त बचा लो… । हम तुमको कुछ न कहेंगे… । कवनो कमी-बेसी हुई हो तो हमसे कहो… । हम तुमको मान-सम्मान के साथ फिर से ले जायेंगे…” । लेकिन पत्थर बनी सोनवा के आँखों के सामने सिर्फ बड़े ठाकुर होते जिनके साथ वह सपनों का नहीं हकीकत का घर बना रही थी । देखते देखते ठाकुर साहब ने बस्ती के बाहर दो कमरे और एक ओसारे का मकान बना दिया । ईंट के साथ गारा प्यार की वह निशानी थी जो ऊँच-नीच जात-पात धरम-करम सबको ताक पर रखकर समाज से विद्रोह कर जोड़ा गया । लिंटर लगते समय फूट फूट कर खूब रोई थी सोनवा कि मायके में अब कभी कदम नहीं रखना है । जिस मायके में ईज्ज़त नहीं वहाँ सोनवा नहीं ।
सचमुच सोनवा ने कभी मायके में अपना कदम नहीं रखा जब उसके दादा स्वर्ग सिधार गये तब भी नहीं । वह बस्ती के बाहर से लाश जाते हुए देखकर अंतिम बार दर्शन की और तब भी नहीं गयी जब उससे उसका दान में दिया गया घर और खेत छीन लिया गया ।
बड़े ठाकुर की ईज्ज़त निलाम हो गयी । बड़े ठाकुर अशुद्ध हो गए । पचपन के बड़े ठाकुर और बीस की सोनवा जैसे बेमेल जोड़े का दो कमरे में मेल हो गया । उस मेल का बेमेल हो जाना तब खलता जब ठाकुर अपने असली घर असली बच्चों के साथ रूक जातें और सोनवा छटपटा छटपटा कर ईंटों के साथ बतियाया करती । बिस्तर पर करवट बदल बदल कर उसका शरीर दुखने लगता। अब वह खेतों में काम नहीं कर सकती थी क्योंकि वह बड़े ठाकुर के दिल की रानी थी और लोगों के लिए उनकी रखैल । गाँव घर की सहेलियाँ भौजाइयाँ उसे देखकर मुँह बिचका कर चली जातीं हालांकि सोनवा का मन बहुत करता उनसे बतियाने का । सोनवा गर्भवती हो गयी । बड़े ठाकुर अब अपने घर में ज्यादा सोनवा के पास कम रहने लगें । वह तड़पने लगी, बीमार रहने लगी, बेसुध रहने लगी । पर जब बड़े ठाकुर आतें उनके साथ कई समस्याएँ और मजबूरियों की दुहाई भी आती जिससे पिघल कर सोनवा फिर उन्हीं की हो जाती । वह सोचती रहती कि इस बार उनसे ये कहकर लडूँगी, वो कह कर लडूँगी लेकिन बड़े ठाकुर का मुँह देखते ही वह सब भूल जाती और बाँहों में समाकर फफक-फफक कर रो पड़ती । रूलाई के मारे कई बार तो उसकी आवाज़ ही न निकल पाती और ठाकुर साहब के जाने का समय हो जाता ।
सातवाँ महीना चल रहा था, कई दिन बीत गए ठाकुर साहब नहीं आयें । हमेशा वे राशन समय से भिजवा दिया करते थे लेकिन इस बार न जाने क्या हुआ कि राशन भी नहीं पहुँचा । भूख से तड़पती सोनवा चिलचिलाती दोपहरी में ठकुरघराने की ओर चल पड़ी । एकाध किलोमीटर चलने पर ही प्यास से उसकी जान निकलने लगी और ठाकुर साहब के घर के पीछे बेहोश होकर गिर पड़ी । उसी समय रास्ते से गुजरते हुए छोटे ठाकुर ने उसे देख लिया । उससे नफरत तो बहुत करते थे छोटे ठाकुर लेकिन गर्भावस्था में देखकर दया आ गयी और पहले पानी के छींटे मार होश में लायें और बाद में पानी का घुँट पिलाया । सोनवा सरम से गड़ी जा रही थी आँख नहीं मिला पा रही थी उसे याद आ गया जब रमदेऊवा के बदमाशी के बाद चकरोट पर उसकी टोढ़ी पकड़कर उन्होंने पानी भरा लोटा बिल्कुल ऐसे ही उसके होठों से लगाया था तब ऐसा लगा कि लोटा सिर्फ एक लोटा नहीं बल्कि छोटे ठाकुर के होंठ होठों पर आ गये हों । होठों पर होठ रख भी दिया था एक बार छोटे ठाकुर ने सबसे नजरें बचाकर, सोहनी के समय । ऊँखियाड़ी में खींच लिया था और कहा था, “तुम इतनी सुन्दर हो कि तुम्हारे देह से नज़र बिछला जाती है । मैं इसे सोने की तरह ही सम्भाल कर रखना चाहता हूँ । तुम चिंता मत करना मैं तुम्हें छोटी ठकुराइन बनाऊँगा” । उनकी आँखों में एक चमक थी और विश्वास भी कि वे अपनी बात को पक्का पूरा करेंगे । सोनवा वहीं पर सरम से धँस गयी थी और उसकी टोढ़ी उठाते हुए उसके होठों पर कसकर अपनी छाप छोड़ते उन्होंने कहा – “इसके बाद जो भी होगा बियाह के बाद ही होगा । इसे सगाई समझना” । लेकिन न जाने क्या हुआ कि छोटे ठाकुर फिर कभी दिखायी नहीं दिए और बड़े ठाकुर कब किस तरह से उनकी जगह ले लिए कि उसे छोटे ठाकुर की छाप भूल ही गयी थी ।
पानी पीकर सलहन्त होने पर सोनवा से छोटे ठाकुर ने पूछा, ‘कहाँ जाना है, कहीं छोड़ दूँ ?’ असमंजस में पड़ी वह कहे तो कैसे कहे ? होंठ काँपते रहें पर आवाज़ नहीं निकल पायी । छोटे ठाकुर समझ गयें और कहा कि बाबूजी एक-दो महिने के लिए कहीं बाहर गये हैं । कुछ जरूरत हो तो बता दो हम पहुँचवा देंगे ।
सोनवा की आँखें रोकते रोकते भी झरझरा आयीं । राशन-पानी खुद पहुँचाकर सोनवा के घर से निकलते समय छोटे ठाकुर ने बस इतना कहा, ‘अगर बाबूजी ही पसन्द थे तो पहले ही बता दी होती, हमसे माँ को छूने का पाप तो न होता’ ।
“माँ” यह तो कभी सोच ही न पायी थी सोनवा । बड़े ठाकुर से रिश्ता बनने के बाद वह छोटे ठाकुर की सौतेली माँ ही तो हुई !
जुड़वा बेटों को जनम देकर माँ बनते फूली न समाई सोनवा । ठाकुर साहब ने भी खूब जश्न मनाया । लेकिन उनके जश्न पर पानी तब फिर गया जब ठकुराइन ने उन्हें लाल गोले आँखों से दागा, ‘आपकी जगह तब तक इस घर में है जब तक पाप की गठरी बाहर है । घर लाने की कभी कोशिश भी न करियेगा । हमने आपकी रखैल को सह लिया लेकिन बेटे की हिस्सेदारी नहीं सहूँगी’ । उस दिन पहली बार बड़े ठाकुर को एहसास हुआ कि अब उनकी नहीं चलेगी । उन्होंने बड़े ताम झाम से तीन बीघा खेत सोनवा को दे दिया ।
पैसठ की उम्र में बड़े ठाकुर को क्षय रोग लग गया । लोग कहते हैं कि सोनवा को छूने के कारण हुआ । घर से अब राशन पानी सोनवा को नहीं पहुँचता । ठाकुर साहब अब मिलने नहीं आते । सुना है कि छोटे ठाकुर ने मलिकाना हक़ के लिए एक दिन उनकी खूब पिटाई की उसी दिन उनको खून की उलटी हुई और वे तब से बिस्तर पर हैं । सोनवा उन तीन बीघा खेत और दो कमरे में अपने दोनों बेटों के साथ रहने लगी और बड़े ठाकुर का इंतज़ार करने लगी । बच्चों को ‘ठाकुर का पाप’ कहकर चिढ़ाने वालों पर सोनवा चढ़ बैठती, गालियों का बौछार कर देती लेकिन बच्चों के पूछने पर उन्हें नहीं बता पाती कि उन्हें पाप क्यों कहा जा रहा है ।
एक दिन छोटे ठाकुर ने आदमी भेजकर सोनवा से उसकी तीन बीघा खेत छिनवा लिया । उस दिन गिड़गिड़ाती हुई फिर से सोनवा ठकुरघराने पहुँची । बड़े ठाकुर का सटिक जबाब सुनकर उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी, ‘आम्रपाली, तुझे छूने का हर्जाना ही तो भुगत रहा हूँ । अब तो हमें बख़्स दे । कम से कम हम नरक में जाने से बच जायेंगे’ ।
हमार बात अलग है बड़े ठाकुर, लेकिन राऊर इ लइके…’
‘पाप की गठरी हैं इ अमरपलिया, इन्हें हमरे मत्थे मत मढ़ो’ बड़े ठाकुर की आवाज़ इतनी तेज हुई कि सारा घर गूँज उठा और उतनी ही दूर तक फफक कर खून की छींटे पहुँच गए। उस कै के छींटों से लाल हो गयी सोनवा । सुना है उसी के साथ बड़े ठाकुर को लकवा भी मार गया ।
उस दिन सोनवा के कदम उठते न थे वह घंटों पुलिया पर बैठी रही । “पाप की गठरी हैं अमरपलिया” उसके कानों में बजते रहे, वह दोनों कानों को हाथ से दबाकर नीचे बैठ गयी । वहीं पुलिया पर कुछ पढ़ाकू लड़के उसे देखकर आपस में खुसूर-फुसूर करने लगें – ‘अरे ये ठाकुर की रखैल है ना सोनवा’ ?
‘सोनवा ? सोनवा मत कहो… ठाकुर इसे आम्रपाली कहते थे’
हा..हा..हा..हा.. सब हँसने लगें ।
‘उन्होंने ने तो इसका नाम चरितार्थ कर दिया’
‘हाँ… अजातशत्रु और बिंबसार दोनों दिवाने निकले’
हा…हा…हा… (हँसते हुए)
‘यार ऐसा मत कहो, इसे तो पता भी नहीं होगा कि आम्रपाली कौन थी ? आम्रपाली की तरह इसकी भी खूबसूरती इसकी दुश्मन बन गयी । वह भी अपने प्रेमियों के हाथों वेश्या बनी और यह भी बेचारी’ ।
‘हाँ… बड़े ठाकुर का जब तक मन किया, मजा लूटा… अब छोड़ दिया सबके मजे के लिए… सचमुच का आम्रपाली बनाकर…’
धीरे-धीरे आती तीखी आवाज़ों से उसका कान सुन्न हो गया, उस दिन उसने पहली बार जाना कि आम्रपाली यानी अमरपाली कौन थी । जैसे उसने ज़हर पी लिया हो, खून की उल्टियाँ हो रही हों और उसके प्राण निकलने के लिए छटपटा रहे हों पर निकल नहीं पा रहे हों । वह जमीन में धँसती गयी और कहती गयी हे धरती माता ! फट जा हमें सरन दे दो ! लेकिन न तो धरती माता फटीं न ही सरन मिला । बचा खुचा दो कमरे का मकान भी उससे छीन लिया गया । वह सड़क पर आ गिरी ।
खेतों में मजूरी करने के लिए उसने दूसरे गाँव के चमार बस्ती से गुहार लगायी । रमयनिया ने तरस खाकर उसे बस्ती से थोड़ी दूरी पर मड़ई डालने के लिए जगह दे दी । खेतों में मजूरी करके वह जीने-खाने लगी । वह जहाँ से चली थी वहीं पहुँच गयी । फिर से एक बार वह ठाकुर साहब के दुआरे मजूरी लेने के लिए बच्चों के साथ सपट कर बैठी है । ठकुराइन की आग के गोले आँखों से ज्यादा उनकी लाल टिकूली आग उगल रही है और ऐसा लग रहा है कि भर माँग का सेनूर आग की लपटें हैं जो सोनवा को जला डालने में कोई कोर-कसर नहीं छोडेंगे । अपने ससुर की रखैल की सुन्दरता देखने की खातीर खिड़की से झाँकते हुए छोटी ठकुराइन को सोनवा ने देख लिया । उस घर में कोई भी औरत सोनवा के टक्कर की नहीं थीं लेकिन किस्मत ने उसे टक्कर दे दिया था ।
ठकुराइन आँख नचाती हुई अनाज नापने वालों को फटकारने लगीं, ‘जल्दी-जल्दी हाथ चलाओ… कितना सेइया मजूरी देना है कि अभी तक नहीं हो पाया । जाने कहाँ कहाँ से लोग पाप की गठरी लेकर चले आते हैं और दूआरे पर बैठ जाते हैं । तुम लोग हो कि
पाप की गठरी जनि कहो ठकुराइन… इ हमार लइके हैं… खाली हमार… । हम अपने लइकन के पाल रहे हैं तो दूसरे को धसक काहें है । मेहनत करके मजूरी लेने आये हैं कवनो मुफत में नाहीं…’ । कहते हुए सोनवा कपारे पर मजूरी का बोरा उठा बच्चों के साथ चले जा रही थी और ठकुराइन माँग भरी सेनूर की आग में खुद ही जल रही थीं ।
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