दलित मुक्ति की अवधारणा का विकास
"दलित मुक्ति की अवधारणा का विकास आधुनिक मुत्यों सवैधानिक मान्यताओं सामाजिक न्याय एवं जनतांत्रिक
संरचनाओं के संघर्षों से हुआ है। इसमें धार्मिक सांस्कृतिक जीवन की विकृतियों के विरुद्ध मानव की प्रतिष्ठा का चिंतन
है। दलित मुक्ति जहाँ अपने पुरोधाओं की रचनाशीलता, बौद्धिकता व आंदोलनों से बहुत कुछ ग्रहण करती है वहीं
समानान्तर रूप से देश के सबसे बड़े कानून यानि भारतीय संविधान में दलितों, आदिवासियों महिलाओं के उत्पीड़न की
समाप्ति हेतु प्रदत्त प्रावधानों एवं उनके अनुपालन में उठने वाले स्वरों, जनांदोलनों से शक्ति लेती है। यह मुक्ति
आध्यात्मिक परम्पराओं मुल्यों के नाम पर समाज में फैले प्रपंच ढोंग धार्मिक भ्रष्टाचार अस्यृश्यता की खबर लेने के
साथ-साथ दलित बहुजन के अपमान, उत्पीड़न करने वाले हिंदू धर्मशास्त्रों स्मृतियों और उनके तथाकथित जनकों के
विशेषाधिकारों की व्यवस्था पर अनेक सवाल उठाती है। दलित लेखक व चिंतक जय प्रकाश कर्दम इस पर प्रकाश
डालते हुए कहते हैं कि "आग लगा दो उन जातिवादी जल्लादों को, क्यों कि जब तक स्मृतियाँ रहेंगी। वेद रामायण,
गीता पुराण, धार्मिक ग्रथ रहेंगे तब तक वर्ण-व्यवस्था रहेगी, समाज में विघटन और विद्वेष रहेगा।
"दलित मुक्ति की अवधारणा का विकास आधुनिक मूल्यों, संवैधानिक मान्यताओं, सामाजिक न्याय एवं जनतांत्रिक
संरचनाओं के संघर्षों से हुआ है। इसमें धार्मिक, सांस्कृतिक जीवन की विकृतियों के विरुद्ध मानव की प्रतिष्ठा का चिंतन
है। दलित मुक्ति जहाँ अपने पुरोधाओं की रचनाशीलता, बौद्धिकता व आंदोलनों से बहुत कुछ ग्रहण करती है, वहीं
समानान्तर रूप से देश के सबसे बड़े कानून यानि भारतीय संविधान में दलितों, आदिवासियों, महिलाओं के उत्पीड़न की
समाप्ति हेतु प्रदत्त प्रावधानों एवं उनके अनुपालन में उठने वाले स्वरों, जनांदोलनों से शक्ति लेती है। यह मुक्ति
आध्यात्मिक परम्पराओं मूल्यों के नाम पर समाज में फैले प्रपंच, ढोंग, धार्मिक भ्रष्टाचार, अस्पृश्यता की खबर लेने के
साथ-साथ दलित बहुजन के अपमान, उत्पीड़न करने वाले हिंदू धर्मशास्त्रों, स्मृतियों और उनके तथाकथित जनकों के
विशेषाधिकारों की व्यवस्था पर अनेक सवाल उठाती है।" दलित लेखक व चिंतक जय प्रकाश कर्दम इस पर प्रकाश
डालते हुए कहते हैं कि "आग लगा दो उन जातिवादी जल्लादों को, क्यों कि जब तक स्मृतियाँ रहेंगी। वेद, रामायण,
गीता, पुराण, धार्मिक ग्रंथ रहेंगे तब तक वर्ण-व्यवस्था रहेगी, समाज में विघटन और विद्वेष रहेगा। "समाज को
प्रगतिशील बनाना है, जाति के जहर को मिटाना है, तो इन तथाकथित धर्म ग्रंथों को आग लगानी होगी, और नकारना
होगा वर्णित उस ईश्वर को जो कर्मानुसार फल देता है और मोक्ष भी वर्णों के अनुसार, जगानी होगी शुद्ध प्रज्ञा, ध्वस्त
करने होंगे विषमताओं के संरक्षण तभी तुमको मुक्ति की प्राप्ति होगी। दलित लेखक बुद्ध शरण हंस ने अस्मिता
लहू-लूहान कहानी में मुक्ति की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि "जिस कौम और समाज का अपना
साहित्य है, उस समाज और कौम का अपना सम्मान है। भारत के ब्राह्मण वर्ग का वेद, रामायण, महाभारत, स्मृतियों का
अपना साहित्य है। इस कारण उनका अपना सम्मान है। जब तक दलित के पास अपना साहित्य नहीं था, उनका अपना
सम्मान कुछ ही नहीं था। वेद, गीता, रामायण का आश्रय लेकर इस देश के प्रभुवर्ग ब्राह्मण कल तक जितना सम्मानित
थे और आज तक है, वह सम्मान भारत देश के बहजनों को इसलिए प्राप्त नहीं हुआ, क्यों उनका अपना साहित्य नहीं
था। बहुजनों के हाथ में क्रान्ति सूर्य ज्योतिबाफूले, रामास्वामी नायकर, डॉo अम्बेडकर अछूतानंद का साहित्य प्राप्त हुआ।
बहुजनों का समाज वैसे चार्ज हो गया जैसे डैड सेल में बिजली का करेन्ट जाने से बैटरी चार्ज हो जाती है।. अब
जरूरत इस बात की है कि ज्योतिबाफूले और डॉ० अम्बेडकर के वैचारिक साहित्य को घर-घर पहुँचाने का मिशन
साहित्यकार व विद्वान लोग पूरा करें ताकि भारत के दलित भारतीय बन सकें, इन्सान कहलवा सकें, न कि शू्र, असुर,
अछूत, हरिजन, दलित आदि न कहलवा सके।" डा० अम्बेडकर दतलित मुक्ति के प्रश्न पर "हर सम्मेलन व भाषणों में
दलितों को अपनी मुक्त के लिए स्वयं सुधारने का आहवान किया और उन्हें समझाया कि घृणित व गंदे काम छोड़ें,
साफ सफाई से रहें तथा अपनी दीनता त्याग कर पुरुषार्थी बनें। मृत पशुओं का मांस खाना बन्द करें। मदिरा व अन्य
नशे की लतों से अपने आप को बचाएं। अन्याय होने पर उसका खुल कर प्रतिकार करें और संघर्ष करें। सबसे अधिक
ध्यान स्वयं को जागृत करने एवं बच्चों को शिक्षित बनाने पर दें।.साथ ही तुमे अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ बनाने
की ओर अधिक ध्यान देना चाहिए। तुम्हें अपने संघर्ष और शक्ति को सुदृढ़ बनाना चाहिए, ताकि जीवन में भौतिक
उन्नति भी हो। जिससे तुम्हें सवर्णों के अत्याचारों व शोषण से मुव्ति प्राप्त हो सके।" समकालीन हिंदी - मराठी दलित
लेखक 'दलित मुक्ति की अवधारणा पर विचार करते हुए कहते हैं कि "दलितों को अस्पृश्य मानकर उन्हें समाज और
धर्म से बहिष्कृत किया गया, यहाँ तक कि धा्मिक संस्कार जैसे उपनयन संस्कार दलितों के लिए नहीं थे। मंदिरों में
पूजा करना निषेध था। विधापार्जन पर रोक थी। धनोपार्जन प्रतिबंधित थे। बस्तियों से बाहर रहने के लिए बाध्य किया
जाता था। तमाम अनुष्ठानों से वंचित रखना व्यवस्था का हिस्सा था। तब दलित लेखकों व वैचारिक विद्वानों ने ऐसी
सभी अवधारणा को नकारा है, जो मानव के अस्तित्व को नकारती हैं और मानव को अतार्किक कल्पनाओं की सता का
गुलाम बनाती है, जो सहज विकास में बाधा बनती है। अपित् राष्ट्र की एकता एवं अखंडता के लिए भी खतरा है। अतः
मानव मूल्य, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक-धार्मिक एकता के ताकिक आशय से समकालीन हिंदी- मराठी दलित लेखकों
ने हिंदू धर्म एवं मनुवादी संस्कृति का विरोध करते हुए उन सभी मान्यताओं के खिलाफ है, जो दलितों की प्रगति में
किसी न किसी रूप में बाधक है जो सामाजिक, धार्मिक व आर्थिक जीवन को विषाक्तपूर्ण बनाती है, तथा शोषण व
असमानता की पोषक है। वहीं डॉ० सुभाष चन्द्र 'दलित मुक्ति आंदोलन सीमाएं और संभावनाएं में लिखते हैं कि दलित
मुव्ति को "समग्र दृष्टि की आवश्यकता है, जो सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक सवालों को संबोधित करे। आर्थिक
सवालों को दरकिनार करके मात्र सामाजिक सम्मान प्राप्त करने का संघर्ष समाज में ठोस बदलाव नहीं ला सकता और
सामाजिक सवालों को छोड़कर केवल आर्थिक हितों के लिए संघर्ष की भी यही परिणति है। असल में दलितों को
सामाजिक तौर पर उनको निम्न घोषित करके उनका आर्थिक शोषण आसान हो जाता है। इस परिस्थति को बदलने
वाली दृष्टि अपनाकर व इस दिशा में संघर्ष से ही दलित मुक्ति की दिशा सही हो सकती है। डॉ० अम्बेडकर के विचारों
व सिद्धांतों के सूत्र समानता, स्वतंत्रता और भाईचारे को अपने चिंतन व संघर्ष का केन्द्रीय सूत्र बनाने की आवश्यकता
है। समानता, स्वतंत्रता और भाईचारे को तोड़ने या पोषित करने वाले रिवाजों, प्रथाओं, मूल्यों, विश्वासों, प्रणालियों,
विचारों को समाप्त करने के लिए संघर्ष करना तथा इनको मजबूत व स्थापित करने वाले चिंतन को आधार प्रदान करना
दलित मुक्त के चिंतन को दिशा दे सकते हैं। समकालीन मराठी दलित लेखक शरण कुमार लिम्बाले जवाब नहीं है
मेरे पास कहानी में दलित मुक्ति के प्रश्न पर कहते हैं कि इसका जन्म मूलतः वर्ण-व्यवस्था के विरोध के फलस्वरूप
हुआ है। यह मुक्ति प्रतिरोध और प्रतिकार की चेतना का दूसरा रूप है। प्रतिरोध से अभिप्राय है उस यथास्थिति को
आदर्श मानने से इन्कार करना, जो सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्तर पर मनुष्य-
मनुष्य में भेद पैदा करके उनमें
अलगाव की स्थिति पैदा करे। प्रतिकार का अभिप्राय है -रूढ़ियों से सामाजिक अपमान और उत्पीड़न को अपनी नियति
मानने से इन्कार करते हुए अपने सामूहिक स्वयं के पक्ष में लड़ने की क्षमता अर्जित करना। "यह विषमता कैरसे नष्ट हो
सकेगी?
अन्याय- अत्याचार कब खत्म हो जाएँगे? जाति भेद को मिटा ही देना चाहिए। इसके बिना हम राष्ट्र कहलाने
लायक नहीं रहेंगे ।..उठते- बैठते, खाते-पीते मैं सोचता रहता- क्या सचमुच सर्वहारा को समता स्वाधीनता, बंधुता और
न्याय प्राप्त होगा? वह दिन कब आएगा? जब भारत के 85 प्रतिशत आबादी को मानवतावादी दृष्टिकोण से देखा
जाएगा। समकालीन हिंदी-मराठी दलित लेखकों की कहानी के केन्द्र में वह मनुष्य है, जो सदियों से पशुवत् जीवन
जीता रहा, गाँव के दक्षिण में हाशिए पर बस रहा, जिसकी परछाई, हवा, गंध, स्पर्श बाकी गाँववासियों के लिए अछूत,
अशुभ मानी जाती रही। वर्तमान दलित मुक्ति उसे मनुष्यता का, उसकी गुलामी का अहसास करवाती है। तथा साथ ही
अपने को कुलीन व उच्च समझने वाले वर्गों की क्रुर मानसिकता का उद्घाटन करती है। वस्तुतः दलितों को सबसे
अधिक 'जाति के दारुण दंश को झेलना पड़ा है। इस जाति के कारण ही उन्हें अस्पृश्य, अछूत, पंचम, शुद्र कहकर
बार-बार उनके मनुष्य होने को भी नकारा जाता रहा है। यहाँ तक कि कु्तों को सवर्णों के घर, मन्दिर में पानी पीने की
इजाजत है, पर जाति के कारण दलितों को नहीं उनकी सभ्यता व संस्कृति में सलाम, जूठन, अस्पृश्यता जैसी मृत
परम्पराओं को जबरदस्ती थोपा गया, ताकि वे हमेशा दीन-हीन, दरिद्र और मानसिक रूप से गुलाम बने रहें। लेकिन
अब डॉ० अम्बेडकर के वैचारिक आंदो
लन व शिक्षा के प्रभाव के कारण वह इन सम्पूर्ण व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह कर ,
Part 2,
उठा है। देखो! देखो! हम कोई भिखमंगे नहीं है। हमने भी चन्दा दिया है। हमें पंगत में बिठाया जाएगा। यह आपका
वचन था। अब क्यों उलटे दिमागों वाले जैसा बर्ताव कर रहे हो? हमारे हाथ पैर देखो। क्या हमारे हाथ पैर कृष्ट रोग
से सड़ गए हैं। कुत्ते-बिल्लियों को तो पास बुलाकर पुचकारते हो, हमें दुत्कारते हो। अरे! हम भी तो उसी हाड-मांस के
जीव है जीते-जागते।"" इसी प्रकार का वर्णन हमें दलित लेखक सत्यप्रकाश की चंद्रमौलिका रक्तबीज कहानी में
दिखाई देता है जो "हे महानुभाव! ऐसे धूर्त और दंभियों का बहिष्कार करो जो वर्ग संघर्ष के नियामक हैं, और इंसान से
इंसान को जुदा करते हैं, जब तक आप स्वयं आवाज नहीं उठाओगे, संघर्ष नहीं करोगे, शोषक आपका शोषण करते
रहेंगे। कितने राजा, भगवान, देवी, देवता आए और चले गए। किसी ने आपकी दशा पर विचार किया? कब तक उस
ईश्वर के नामपर घुट-घुटकर जीते रहोगे जो सदैव सामर्थ्थवानों का साथ देता है।" विमल थोराट 'दलित मुक्ति
आंदोलन की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति । मराठी दलित कविता में 'दलित मुक्ति की अवधारणा' के प्रश्न पर कहती है कि
दलित मुक्ति उस हिंदू धर्म पर आधारित परम्पराओं, रुढ्ियों और विचारों से है और उस समाज के विरुद्ध जिसने उन्हें
पददलित, शूद्र और अस्पृश्यता नाम देकर अन्याय, अत्याचारों के द्वारा अपने मन में छिपी बर्बरता का पूरा-पूरा परिचय
दिया।.दलित मुक्ति का केन्द्र स्थान 'मनुष्य है। धर्म की साजिश के द्वारा छीनी हुई प्रतिष्ठा और सम्मान को प्राप्त
करने के लिए प्रतिबद्ध है। दलित लेखक सूरजपाल चौहान 'हिंदी के दलित कथाकारों की पहली कहानी की भूमिका
पुस्तक में लिखते हैं कि हिंदू धर्म और उसका वाड़मय ही दलित दुर्दशा के लिए उत्तरदायी है और जब तक दलित
उनमें आस्था रखते हैं, जीवित रहते उनकी मुक्ति नहीं।. हैरानी की बात तो यह है कि हिंदी गैर- दलित लेखकों ने
अपने-अपने लेखन में वर्ण-व्यवस्था के विरुद्ध ऊँगली तक उठाने का साहस नहीं किया, उल्टा लेखन द्वारा
वर्ण-व्यवस्था को मजबूत ही किया है। कुछ अपवादों को छोड़कर हिंदी के गैर दलित लेखकों ने हमेशा से अपनी
लेखनी द्वारा दलित समाज की छवि और दलित पात्रों का चरित्र बिगाडने के लिए ही चलाई। परन्तु बीसवीं शताब्दी में
बाबा साहेब डॉ० भीमराव अम्बेडकर जो दलित यातनाओं के भुक्त भोगी थे। ने गौतम बुद्ध व ज्योतिबा फूले के सिद्धान्तों
को आधार मानकर पूरी गम्भीरता से दलित दुःखों के कारणों का पता लगाकर राष्ट्रीय ही नहीं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर
दलित समस्या को उजागर कर दिखाया।"" जिसके कारण आज दलित अपनी मुकिति के लिए हमेशा तैयार रहता है।
इसका वर्णन हमें 'बन्धु माधव की 'जहरीली रोटी कहानी में दिखाई देता है। "क्या आप हमें अपने पैर की च्पल
समझते हो? क्या हम चप्पलों की तरह हैं? क्या हम आप लोगों की तरह हाडमांस के नहीं बने हैं और हमारे खुन का
रंग आप सबसे अलग हैं? हम भी आपकी तरह ही मॉँ की कोख में नौ महीने पलकर पैदा हुए हैं। क्या यह सब नहीं
है?" मैंने फिर चीखकर कहा, "हममें और तुममें कोई फ़र्क नहीं है।" लेखक कहता है यही 'दलित मुक्ति की सच्ची
अवधारणा है जो आदमी-आदमी में धर्म, परम्परा, रीति-रिवाज के आधार पर किसी प्रकार के अन्तर को स्वीकार नहीं
करती है।"' वहीं गुरु प्रसाद मदन 'झूठी आजादी लेख में मुक्ति की अवधारणा के विषय में लिखते हैं कि "आजादी के
पूर्व भारतीय दलितों ने सपना देखा था कि उन्हें भी आजादी मिलेगी। वे लोग भी दासता की जंजीों से छुटकारा पा
जाएंगे। किन्तु लगभग चार दशकों की स्वतंत्रता के बाद भी भारत के ऐतिहासिक पृष्ठों को पलट कर देखने पर यही
मिलता है कि दलितों के साथ किये गये वायदे केवल उन्हें भुलावे में ही रखने के लिए किये गए थे। उनकी अस्मिता के
साथ खिलवाड़ होता रहा। सवर्णों शोषकों द्वारा उनके संवैधानिक अधिकारों के साथ बलात्कार होता रहा।...किन्तु आज
का दलित शोषित समाज उनकी करतूतों को समझ रहा है। बहुत ही तेजी के साथ अपने कंधे पर रखे गुलामी के जुए
को फॅक देने के लिए प्रयासरत ही नहीं हैं अपित् तड़प रहा है। दलितों को भी यह समझना चाहिए कि उनकी अशिक्षा ,
अविधा, गरीबी के बंधन को दूसरा कोई तोड़ने वाला नहीं है। दलित समाज को स्वतः अपने पुरुषार्थ का भरोसा करके
उठना होगा। संगठित होकर गुलाम बनाये रखने वाली समस्त शक्तियों को चकनाचूर करना पड़ेगा। तभी तो वह सच्ची
आजादी प्राप्त कर सकता है।...
पराये पुरुषार्थ की आशा को छोड़कर अपनी कमर कस कर, आने वाली मार्ग की बाधाओं की परवाह किये बिना
आगे दलितों का कारवां बढ़ चला है। चतुर्दिक शोर हो रहा है कि दलितों के उत्थान में सम्पूर्ण सरकारी तंत्र से लेकर
नेता तंत्र तक इनकी ही भलाई व उत्थान के लिए उद्धत और प्रयत्नशील हैं। सरकार, सरकारी तंत्र, विभिन्न राजनैतिक
पार्टियां व उनमें शीर्षस्थ, मूर्धन्य नेतृत्च वर्ग की एक ही चिन्ता है। कि दलितों का उत्थान कैसे हो? तात्पर्य है कि सभी
दलित उत्थान के लिए बेचारे पतले होते जा रहे हैं। यह चिंता इस सीमा तक सता रही है कि उन्हें उस समय दलित
ही दलित दिखाई पड़ते हैं? चाहे आर्थिक मसला हो चाहे सामाजिक मसला जहाँ कहीं भी दलितों ने थोड़ी करवट
बदली, सम्पूर्ण राष्ट्र को इनकी चिन्ता सताने लगती है। ऐसा भ्रम अखबार वाले भी फैलाने से नहीं चुकते हैं। आखिर ये
हैं कौन? लिखने वाले कौन? चिल्लपों मचाने वाले कौन हैं? तथा व्यापक प्रचार करने वाले कौन हैं? अखबारों के मालिक
कौन हैं? ये वे ही सभी लोग हैं जो शोषकों की जमात से सम्बद्ध ही नहीं उसी शोषक खून से पले हैं। उनकी अभिरुचि
क्यों कर दलित आजादी की ओर हो सकती है? उत्तर है स्वार्थ सिद्धि। जब कभी कोई दलित या दलित समाज का एक
बड़ा हिस्सा आडम्बरी वर्ण व्यवस्था से मुक्ति पाने हेतु तथाकथित ईश्वर व वर्णव्यवस्था की गुलामी का ज़ुवां तोड़ कर
स्वतंत्र खड़ा हो जाना चाहता है तो जबरन धर्मातरण व साम्प्रदायिकता का ढोंग कहकर दबाने का प्रयत्न ही नहीं किया
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