Tuesday, November 21, 2023

चमारीनऔर ठाकुराइन

 चमारीनऔर ठाकुराइन part 1,

 । बालों में पल्लो हाथ में पल्लो और पल्लो के ही बैल बनाकर खेलती सोनवा को देखकर अनायास ही दीनानाथ के मुँह से निकल गया – ‘अमरपाली’ ।

उस समय सोनवा को अमरपाली का मतलब समझ में नहीं आया था  । आता भी कैसे ? लगभग सात बरस के बच्चे में इतनी समझ ही कहाँ होती है । हालांकि उसका नाम सोनवा भी न था लेकिन सोने जैसी चमकती देह देखकर उसे सब सोनवा-सोनवा बुलाने लगे और वह अपना असली नाम भूल गयी । सोनवा ठकुरघराने के ओसारे के सामने दुआरे पर  बैठ कर अपनी मजूरी का इन्तज़ार कर रही थी लेकिन ठकुराइन की कटारी जैसी चुभती नज़र उसे अन्दर ही अन्दर काटे जा रही थी । लहू-लुहान हो रही थी सोनवा लेकिन नज़र उठाकर उनकी ओर देखना गँवारा नहीं था । उसे डर था कि अगर कहीं वह ऊपर नज़र उठायी तो ठकुराइन के लीलार से उठी हुई भर माँग सेनूर और सूरज की तरह चमकती टिकूली से उसे जलाकर भष्म न कर दे । आखिर सुहागन में इतनी ताकत तो होती ही है !




ताकत तो इसमें भी कम न थी, दो-दो ठाकुरों को… वह भी बाप-बेटे दोनों को अपने बस में कर रखा था, उस समय तिलमिला कर रह गयी थीं बड़ी ठकुराइन । पति और बेटे के बीच दिनों-दिन आपस में बढ़ती नफरत से बिस्तर पकड़ लीं । बेटा रघुराज घर का पहला वारिस… आगे चलकर वही तो मालीक बनेगा लेकिन अभी से मलिकाना हक़ दिखाने लगा । हक़ तो उसका भी छीन लिया था पिता ने, शायद इसी बात का वह बदला ले रहा हो । वह भूल नहीं पा रहा था कि उसकी प्रेमिका… जिसके साथ वह जिन्दगी के सुनहरे सपने देख रहा था, उसे कैसे पिता ने बरगला लिया और अपनी रखैल बना लिया ! आखिर कोई पिता ऐसा कैसे कर सकता है !

ठाकुर साहब असल में ठाकुर न थे न ही जमींदार और न ही वह रौब जो ठाकूरों में होता है । ओझा होते हुए भी पचास-साठ एकड़ जमीन होना किसी ठकुरई से कम तो नहीं । जमींदार, भूमिहार या ठाकुर यही नाम अधिक जमीन वालों के लिए प्रचलित था । उनके पुरखों का रौब थोड़ा-थोड़ा ठाकूरों से मिलता था, नौकर-चाकर आगे-पीछे घुमते रहते, उनके घर में काम करके कइयों के घर का चूल्हा जल जाता इसलिए गाँव- में उनकी ईज्ज़त ठाकुर साहब जैसे हो गयी ।

सोनवा की माई रमयनिया रोपनी सोहनी कटिया यानि मजदूरी करने आस-पास के गाँव में जाती ही, विशेष रूप से ठाकुर साहब के खेत की रोपनी, सोहनी, कटिया, दँवरी करती । साथ में अपने तीनों बच्चों को भी ले जाती । सोनवा सबसे बड़ी थी इसलिए उसकी जिम्मेदारी भी बड़ी थी । जब उसकी माई खेतों में काम करती तब वह चकरोट पर अपने दोनों भाइयों की देखभाल करती । सोनवा के रहते रमयनिया को कभी अपने बच्चों की चिंता न हुई । सोनवा की सुन्दरता पर हर ठाकुर, मजहूरों और राहगीरों की नज़र रहती । धीरे-धीरे सोनवा की अल्हड़ता संजीदगी में बदल गयी और वह तेरह-चौदह साल में ही जवान हो गयी । अपने माई के साथ-साथ वह भी कटिया-सोहनी करने लगी, उसे भी मजूरी मिलने लगी । खाना बनाने, रोपनी-सोहनी करने में निपुण सोनवा के लिए रिश्ते भी आने लगें लेकिन उसकी माई को अपने दोनों बच्चे पालने थे, उन्हें पढ़ाना लिखाना था इसलिए वह हर रिश्ते को लात मारती गयी यह कहकर कि हमारी सोनवा सोना है बडे होने पर और अच्छे रिश्ते आयेंगे ।

खेतों में कटिया करती, बोझा बाँधती 

ऊँच-नीच में तनिको भेद-भाव नाहीं करते बड़े ठाकुर, खुद ही बोझा बन्हवा देते हैं, लगता ही नहीं कि इतने बड़े आदमी हैं’ – रमयनिया बड़े ठाकुर से कहते हुए एहसान तले दबे होने के भाव से मुस्कराकर हाथ जोड़ लेती थी ।

ठाकुर का सीना गर्व से चौड़ा हो गया और माथा आकाश में तन गया – ‘आदमी वही है रमयनिया, जो सबको बराबर समझे । इ तो हमारे धर्म–करम ने हमको बाँध रखा है कि हम तुम्हारा छूआ खा पी नहीं सकते । लेकिन देखा जाय तो छुआ तो तुम्हारे ही लोगों का खा रहे हैं आखिर पहला छूअन तो तुम्हीं लोगों का है (अपनी हाथ को देखकर सहलाते हुए) । तुम लोग इतनी मेहनत न करते तो हमारे पेट में अन्न का दाना भी न जाता । पर नियम तो नियम है भोजन बनने पर शुद्ध हो जाता है और हम उसे ही खाकर जीवित हो उठते हैं’ ।

‘यह तो आप मान रहे हैं बड़े ठाकुर, वरना बहुत लोग तो हम चमारन के आदमी ही नाहीं समझतें’ ।

‘हमरे मामले में ऐसा मत समझना… हमार सोच तनिक हट के है’ ।

सोनवा चुपचाप सुनती और बड़े ठाकुर की उनके ही मुँह से भले-मानूसी की बड़ाई सुनकर अघाती नहीं । जैसे बड़े ठाकुर थे वैसे ही उनके पुत्र छोटे ठाकुर… भले मानूस । वे बेचारे ज्यादा बोलते भी न थे । खेत की मेड़ पर से ही सबको दिशा-निर्देश जारी कर देतें कि काम टाइम से होना चाहिए । तनिको कोताही न बरती जाय, नहीं तो मजूरी काट ली जायेगी । बेचारे पढ़े-लिखे छोटे ठाकुर को का मालूम खेत का काम, लेकिन फिर भी बाबूजी का हाथ बँटाने आ ही जातें । चार-पाँच सालों में कभी भी उन्होंने मेड़ से नीचे खेत में लात नाहीं रखा । पर एक समय ऐसा आया जब उन्हें बड़े ठाकुर की गैरहाजिरी में रोपनी के समय लेव लगे भाँस में उतरना पड़ गया । सोनवा मजूरहों के साथ रोपनी कर रही थी । उसने अपनी सलवार घुटने तक मोड़कर ऊपर कर लिया और दुपट्टा सीने पर फैलाकर पीछे से गोल घुमाते हुए कमर में रस्सी की तरह कस कर बाँध लिया था । आसमान से झरते झींसा से उसके देह से चिपकी समीज मेड़ पर खड़े छोटे ठाकुर के आँखों में चिपक गया । लाख ध्यान हटाने के बाद भी आँखें बार-बार उसकी देह से चिपक जातीं और उसमें से फूटती मिट्टी की सोंधी गंध से मदहोश हो जातें । वैसे तो सोनवा भी छुप-छुपकर छोटे ठाकुर को निहारा करती, लेकिन छोटे ठाकुर की नज़र पड़ने से पहले ही वह कजरी गा-गाकर इस तरह से धान की पूजी रोपने लगती जैसे उसने कभी छोटे ठाकुर की ओर देखा भी न हो ।

“…’ धान की मूंजी  माटी में गाड़ते हुए पैरों के बीच से तिरछी नज़र सोनवा की ओर देखा । सोनवा का जी जल उठा लेकिन बिना बोले मूंजी रोपने लगी 

इतने में रमदेऊवा पूजी रोपते हुए सोनवा की कमर में हाथ डाल दिया वह गिरइया मछरी की तरह छटपटा गयी और जब तक कुछ समझ पाये उसके कमर में बँधे दुपट्टे को उसने खोल दिया । सोनवा मुड़ कर जैसे ही भागी दुपट्टा उसके गले में फंस गया और उसकी साँस अटक गयी ।

मजदूरो में इस तरह की हँसी-ठिठोली आम बात थी इसलिए रोपाई छोड़कर कोई उनके नजदीक नहीं गया । रमदेऊवा दुपट्टा खींचते हुए नजदीक पहुँच गया और उसका हाथ छाती से होते हुए कमर तक सांप की तरह रेंग गया । सोनवा की घुटती आवाज ऊँ..ऊँ… को भाँपते हुए छोटे ठाकुर पीछे से रमदेऊवा के गर्दन पर एक छड़ी बजा दिए । रमदेऊवा छटपटाकर रह गया उसका हाथ ढ़ीला पड़ गया । जैसे ही दूसरी छड़ी छोटे ठाकुर उठाए रमदेऊवा ने घुटने पर गिरकर हाथ जोड़ने लगा  – ‘माफ करिं छोटे ठाकुर, माफी…’ ।

सभी मजदूर हक्का बक्का रह गयें । साथ की मजूरहिनों ने सोनवा को थाम लिया और उसे चकरोट पर ले आयीं । वह साँस भी नहीं ले पा रही थी छोटे ठाकुर ने उसे पानी पिलाया । साँस आने पर भी वह रोपनी करने के लिए हिम्मत नहीं जुटा पायी । अंधेरा होने पर ही मजदूर घर लौटते हैं, पर उससे अब इंतजार नहीं किया जा रहा था फिर भी कीचड़ सने चकरोट पर वह बैठी रही ।

जितना सोनवा परेशान उतना ही छोटे ठाकुर । उन्होंने मजदूरो को कह दिया कि तुम लोग काम करो हम सोनवा को उसके घर मोटरसाइकिल से छोड़ आते हैं । मजूरहा अचम्भा से गलहत्थी दे लिए कि “कहाँ छोटे ठाकुर आप और कहाँ सोनवा… कैसे आपके मोटरसाइकिल पर… यह हमारे साथ चली जायेगी…”

छोटे ठाकुर ने अपना रौब दिखाते हुए कहा – “देख नहीं रहे कि इसके पास हिम्मत नहीं है, ये कैसे जायेगी पैदल घर ? काम खतम करके ही तुम सब यहाँ से हटोगे” ।

बात तो सही थी कि एक ही मोटरसाइकल पर छोटे ठाकुर और सोनवा !! ठाकुर साहब का तो धरम भरस्ट हो जायेगा ! लेकिन ठाकुर साहब को अपने धरम की चिंता नाहीं तो मजदूर  क्या  करें ! सोनवा बैठ चली छोटे ठाकुर के साथ मोटरसाइकिल पर ! बैठ तो गयी पर इतनी डरी-सहमी कि हचका से कहीं गिर न जाये या गलती से भी छोटे ठाकुर की पीठ से छुआ न जाय । ऊबड़-खाबड़ माटी के चकरोट, खडन्जा चकरोट से गुजरते हुए मोटरसाइकिल हचक जाता और सोनवा किचकिचा कर हैन्डिल (ग्रेब हैंडल) पकड़ लेती । एक हचका पर तो छोटे ठाकुर को लगा कि वह मोटरसाइकिल से गिर गयी वे सोनवा सोनवा बुलाते ही रह गये, डर के मारे वह बोली ही नहीं । फिर ठाकुर ने कहा – ‘मुझे पकड़ लो, कट नहीं जाओगी सोनवा’ ।

‘नाहीं छोटे ठाकुर, हम आपको कैसे छू सकते हैं’ ?

‘हा..हा…हा… (हँसते हुए) दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गयी और तुम छुआ-छूत लेकर बैठी हो । पकड़ लो मुझे… पकड़ो…’

सोनवा के न पकड़ने पर उन्होंने खुद ही उसका हाथ खींच कर अपने कमर में बाँध दिया ।

चौराहे से गुजरते हुए बड़े ठाकुर की नज़र अचानक छोटे ठाकुर पर पड़ी और पीछे सोनवा को सटकर बैठा देख कट कर रह गयें । शाम को आग ऊगलते बड़े ठाकुर छोटे ठाकुर के पास जा पहुँचे, स्थिति का जायजा लेने के बाद उन्होंने सोनवा को चरित्रहीन साबित करने में कोई कसर न छोड़ी, ‘तुम्हें क्या लगता है कि रमदेऊवा ऐसे ही उसका दुपट्टा खींचा होगा ? पहले से दोनों में सान-मटक्की चल रही थी । तुमसे ही समझने में भूल हो गयी है’ ।

‘ऐसी बात नहीं है बाबूजी । मैंने खुद अपनी आँखों से देखा है रमदेऊवा की बेहुदगी । सोनवा एक अच्छी लड़की है’ ।

‘आज के जन्मे तुम का जानोगे । हमें मजूरहों के रग-रग की पहचान है । आज के बाद तुम खेत में कदम नहीं रखोगे’।

‘बाबूजी… सोनवा वैसी नहीं है…’

बात काटते हुए “तो कैसी है… अपनी हद में रहो । वो बदचलन यहाँ तक पहुँच गयी ? जैसे सारे मजूरहों को फँसा के रखी है वैसे ही तुमको भी फँसा रही है । अच्छा हुआ कि हमें पहले ही ये सब पता चल गया” ।

छोटे ठाकुर के साथ-साथ बडी ठकुराइन को भी हिदायत और चेतावनी मिल गयी, “सम्भाल लो अपने बेटे को । बहुत उड़ने लगा है । आज के बाद खेत में दिखा तो हाथ-पाँव तोड़कर रख दूँगा” ।

उस दिन के बाद हर दिन सोनवा को छोटे ठाकुर का इंतजार रहने लगा लेकिन छोटे ठाकुर कभी दिखायी नहीं दिए । वह पहली बार मोटरसाइकिल पर बैठी थी, हालांकि उसका बहुत मन करता बैठने को पर नहीं जानती थी कि जिसे मन ही मन अपने मंदिर का देवता मान चुकी है, वह देवता खुद ही पूजा लेने आ जायेगा । छोटे ठाकुर की पीठ जैसे सीने से अब तक सटा रह गया हो बार-बार वे उसका हाथ खींच अपने पेट पर रखकर पकड़ने के लिए कह रहे हों । वह बार अपने हाथ को खींचती लेकिन हाथ फिर फिर जाकर उन्हें पकड़ ही ले रहे हों । कभी-कभी सोचती छीः हम का सोचते रहते हैं दिनभर-रातभर । कहाँ वो और कहाँ हम । कवनो बराबरी नाहीं ।

रोपनी के बाद सोहनी का दिन आ गया लेकिन छोटे ठाकुर दिखायी नहीं दिए । दिन-ब-दिन बड़े ठाकुर सोनवा को पहले से ज्यादा जानने-मानने लगें । बड़े ठाकुर की दरियादिली उसके माई-दादा से होकर सोनवा पर आयी इसलिए उनकी छत्रछाया भली लगती । सोनवा के माई-दादा के नाम दो गट्ठा खेत दान में दे दिया बड़े ठाकुर ने । उस पर छान छाकर दो गोरू भी बाँध दिए गये । घर ही से दूध मिलने लगा । सोनवा के दोनों भाइयों की फीस बड़े ठाकुर भरने लगें । आस-पास के लोगों के लिए भी कुछ न कुछ कर ही दिया । खडन्जा बिछवाना, घरों में अनाज पहुँचाना, बच्चों की फीस भर देने से सारे चमार बस्ती में बड़े ठाकुर के देवता अवतार की बखान शुरू हो गयी । उनमें से सोनवा भी एक थी । जाने कब उसके दिल में बसे छोटे ठाकुर की याद पर धूल माटी पड़ गया और अब वह बड़े ठाकुर की भक्त बन गयी । बड़े ठाकुर से मिले एक के बाद एक कपड़े, साड़ी उसे सहज लगने लगा । जिस दिन उसे कान में पहनने के लिए सोने का कुण्डल मिला वह तो नाच उठी, ऐसा लगा कि उछलकर बड़े ठाकुर को पकड़ ही लेगी, लेकिन उछलते उछलते रूक गयी और आँखों में आँसू भर कर बोली, ‘बड़े ठाकुर… सपना तो बहुत कुछ है, पर हमारे भाग में सपना पूरा होना नाहीं लिखा है… रउरे इ कुण्डल रख लिजिए । राऊर आशिर्वाद ही काफी है’

चमारीन और ठाकुराइन पार्ट 2

कैसी बात करती हो अमरपाली, दान देकर वापस नाहीं लेतें । रूक काहें गयी, उछलो, कूदो, खुशियाँ मनाओ । तुम्हारे सारे सपने तो नहीं लेकिन कुछ सपने तो हम पूरा कर ही देंगे’ ।

‘नाहीं, इ हम नाहीं ले सकते… एतना मँहगा सामान क कौनों जरूरत नाहीं है । रऊरे छत्रछाया में पलना ही बहुत है’ ।

‘काहें, तुम हमें अपना नाहीं समझती ? हम तो तुम लोगों को अपनों से भी बढ़कर समझते हैं । इस बात के लिए बहुत बार लड़ाई हो जाती है मेरी बीवी से, भाई से, नात रिश्तेदारों से कि काहें हम तुम लोगों पर पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं । लेकिन मैं सोचता हूँ कि एक बार तुम लोगों की जिन्दगी ढ़र्रे पर आ जाय, गरीबी दूर हो जाये तो मैं भी शुकून से मर सकूँगा’ ।

‘बड़े ठाकुर ! ऐसा मत कहिए, मरे आपके दुश्मन’ । ठाकुर के मुँह पर हाथ रखते हुए सोनवा बोल पड़ी, लेकिन इस बात का एहसास होते ही कि उसने गलती किया है वह सकुचा गयी और हाथ पीछे खींच ली ।

‘रखो न आम्रपाली… मेरे मुँह पर हाथ रखो… अपनेपन का एहसास होता है । हम तुम्हें अपना समझते हैं तो तुम भी तो हमें अपना समझो…’ । ठाकुर की आँखें छलछला आयीं । उन्होंने उसका हाथ अपने हाथों में लेकर खुद ही मुँह पर रख दिया । बड़े ठाकुर की इस अपनाइत से सोनवा की भी आँखें भर आयीं । वर्षों से अछूत होने का ज़हर पीती सोनवा की पीढ़ी आज धन्य हुई । खुद ठाकुर साहब उसके घर में हैं । उसके हथेलियों को अपने दोनों हथेलियों के बीच दबाकर देर तक बैठे रहें । दोनों में कोई बराबरी नहीं लेकिन सोनवा बड़े ठाकुर के साथ एक ही खटिया पर बैठ कर समानता का एहसास करने लगी और बड़े ठाकुर के उच्च विचार पर मन ही मन गौरवान्वित होने लगी । सचमुच देवता यही हैं ।





सोनवा बीस साल की हो चुकी है । वैसे भी उसकी उम्र गाँव के हिसाब से बहुत ज्यादा हो गयी है । पैसे रूपये न होने की वजह से बियाह नाहीं हुआ और अब उसके लिए कूँवार लड़का मिलना मुश्किल हो गया । शरीर गदरा गयी और इसकी गदरायी शरीर ठकुराइनों को भी मात देती है । बड़ी मुश्किल से उसका बियाह एक कूँवार लड़के रामनाथ से ठीक हो पाया । ठाकुर साहब ने दिलासा दिया कि जो कुछ भी उनसे बन पड़ेगा वे शादी में खर्च करेंगे, लेकिन दायरे में रहकर । धन्य धन्य हो गया पूरा परिवार । दिसम्बर में बियाह और गवना दोनों साथ होने वाला था । शादी के एक महिने पहले से तैयारियाँ जोर शोर से चलने लगीं । रमयनिया का पैर धरती पर न पड़ते उसके हाथ में गड्डी के गड्डी पैसे जो थे । उस दिन वह सोनवा के लिए कपड़े लत्ते खरीदने की खातीर बाज़ार गयी थी । दोनों भाई स्कूल में थे और दादा पीकर कहीं ढ़हे पड़े होंगे ऊँखीयाड़ी में या फिर पुलिया के नीचे । बड़े ठाकुर बहुत उदास-उदास थे और आकर सोनवा के घर में खटिया पर बैठ गयें । सोनवा घबरा गयी और जल्दी से एक लोटा पानी हाथ में थमाते हुए पूछ पड़ी, ‘का बात है बड़े ठाकुर, तबीयत तो ठीक है ना ? बड़े उदास लग रहे हैं ? घर में सब ठीक है कि नहीं’ ?

‘हाँ… सब ठीक है । मुझे तुम्हारी चिंता हो रही थी’ ।

‘हमारी’

‘हाँ अमरपाली… अब तुम ससुराल चली जाओगी । बहुत याद आयेगी तुम्हारी । इतने दिनों में तुम बिल्कुल अपनी-सी लगने लगी । तुम बहुत भोली हो । पता नहीं कैसे होंगे वहाँ के लोग ? तुम्हारी देखभाल ठीक से कर पायेंगे या नहीं’ ।

‘हमें भी सबकी बहुत याद आयेगी । चिंता मत कीजिए । सुना है ठीक ठाक लोग हैं । नया नया बना दुतल्ला मकान है । खाने-पीने की कवनों कमी नाहीं है’ ।

‘चलो तुम्हारी बात सुनकर मैं निश्चिन्त हो गया । (बात बदलते हुए) अच्छा देखो मैं तुम्हारे लिए क्या लाया हूँ’ । (सोने की हार दिखाते हुए)

‘हाँSSS… (सोनवा का मुँह खुला का खुला रह गया) इतना सुन्दर… हम तो कभी मंदिर नहीं गये लेकिन पूरा भरोसा है कि भगवान आप ही की तरह होते होंगे’ । हार के सामने हार गयी सोनवा या फिर महीनों से फूटती दरियादिली अब बाढ़ बन गयी । उसे कुछ असहज नहीं लगा और बड़े ठाकुर के गले लग गयी । ठाकुर साहब की वर्षों की तपस्या आज पूरी हुई । सोनवा की पीठ, कमर, वक्ष आज सब कुछ उनके लिए सहज ही समर्पित होता चला गया । उसे लगा कि इस समर्पण के लिए वह कब से तरस रही थी । सोनवा ने अपने भगवान को सर्वस्व समर्पित कर तृप्ति की साँस ली । साथ ही उसे इस बात की सांत्वना भी मिल गयी कि यदि वह आगे ठाकुर साहब का भोग लगाती रही तो ठाकुर साहब अपने जान से प्यारी अमरपाली को अपने हिस्से की कुछ जमीन और घर भी दान में दे देंगे, जिसमें वह देवी बनकर पूजी जायेगी । सोनवा को अपने समर्पण पर कोई ग्लानि न हुई बल्कि वह उनके एहसानों का प्रतिदान समझकर सम्पूर्ण हो गयी । वह सिर्फ एहसानों का प्रतिदान नहीं था बल्कि प्रेम का वह बहाव था जिसमें उसे एक महिने में बहकर सिमटना भी था ।

जैसे जैसे बियाह का दिन नजदीक आता जा रहा था सोनवा सिमटने के बजाय पूरे आवेग के साथ बहती जा रही थी । उसके लिए रामनाथ से बियाह करना भारी लगने लगा और बड़े ठाकुर से बिछड़ जाने के कचोट में हर रोज भोग लगाने लगी । उसे पवित्रता में विश्वास था और उस पवित्रता का जूठन भी रामनाथ को सौंपना नहीं चाहती थी । रोते-धोते ससुराल तो पहुँच गयी । सारे रश्मों-रिवाज को पूरा वह दुतल्ला मकान के ऊपरी तल्ले पर, जहाँ सिर्फ दो ही कमरा बना था, उसमें से एक कमरे में उसे बैठा दिया गया । उसने ध्यान से कमरे और छत का मुआयना किया । उसके मायके में ऐसा कमरा नहीं था लेकिन बड़े ठाकुर के दिए हुए सपनों की दुनिया में से किसी भी हिस्से का हिस्सा नहीं था । दिन ढ़ल गया, सब लोग खा-पीकर मस्त हो गये कमरे में सोनवा को दूलहे का इन्तजार करना था । सोनवा के मन-मंदिर में एक ही देवता की मूर्ति की जगह थी, उसमें किसी और की मूर्ति स्थापित करना उसके लिए मुस्कील हो गया । वह अपना गहना-गुरिया एक गठरी में बाँध कर छत से कूद गयी और नीचे बड़े ठाकुर ने उसे गोदी में लोक लिया और दूर कहीं छिपायी गाड़ी झट से नजदीक आ गयी जिसमें बैठकर वे दोनों नौ-दो ग्यारह हो गयें ।

भगा तो लाये बड़े ठाकुर…! लेकिन रखे कहाँ ? वापस लाकर पटक दिया मायके में । थू-थू हाय-हाय मार-मार की पीड़ा का अन्दाजा भागने से पहले सोनवा को न था । उसके माँ-बाप तो बड़े ठाकुर को कुछ कह न सके लेकिन सोनवा को झपिला झपिला कर उसके आधे प्राण हर लिये । उसके दोनों भाई मारे शरम के घर से बाहर निकलना बंद कर दिए । उसका पति कई बार आया उसके आँखों के सामने गिड़गिड़ा कर गया, “ईज्ज़त बचा लो… । हम तुमको कुछ न कहेंगे… । कवनो कमी-बेसी हुई हो तो हमसे कहो… । हम तुमको मान-सम्मान के साथ फिर से ले जायेंगे…” । लेकिन पत्थर बनी सोनवा के आँखों के सामने सिर्फ बड़े ठाकुर होते जिनके साथ वह सपनों का नहीं हकीकत का घर बना रही थी । देखते देखते ठाकुर साहब ने बस्ती के बाहर दो कमरे और एक ओसारे का मकान बना दिया । ईंट के साथ गारा प्यार की वह निशानी थी जो ऊँच-नीच जात-पात धरम-करम सबको ताक पर रखकर समाज से विद्रोह कर जोड़ा गया । लिंटर लगते समय फूट फूट कर खूब रोई थी सोनवा कि मायके में अब कभी कदम नहीं रखना है । जिस मायके में ईज्ज़त नहीं वहाँ सोनवा नहीं ।

सचमुच सोनवा ने कभी मायके में अपना कदम नहीं रखा जब उसके दादा स्वर्ग सिधार गये तब भी नहीं । वह बस्ती के बाहर से लाश जाते हुए देखकर अंतिम बार दर्शन की और तब भी नहीं गयी जब उससे उसका दान में दिया गया घर और खेत छीन लिया गया ।

बड़े ठाकुर की ईज्ज़त निलाम हो गयी । बड़े ठाकुर अशुद्ध हो गए । पचपन के बड़े ठाकुर और बीस की सोनवा जैसे बेमेल जोड़े का दो कमरे में मेल हो गया । उस मेल का बेमेल हो जाना तब खलता जब ठाकुर अपने असली घर असली बच्चों के साथ रूक जातें और सोनवा छटपटा छटपटा कर ईंटों के साथ बतियाया करती । बिस्तर पर करवट बदल बदल कर उसका शरीर दुखने लगता। अब वह खेतों में काम नहीं कर सकती थी क्योंकि वह बड़े ठाकुर के दिल की रानी थी और लोगों के लिए उनकी रखैल । गाँव घर की सहेलियाँ भौजाइयाँ उसे देखकर मुँह बिचका कर चली जातीं हालांकि सोनवा का मन बहुत करता उनसे बतियाने का । सोनवा गर्भवती हो गयी । बड़े ठाकुर अब अपने घर में ज्यादा सोनवा के पास कम रहने लगें । वह तड़पने लगी, बीमार रहने लगी, बेसुध रहने लगी । पर जब बड़े ठाकुर आतें उनके साथ कई समस्याएँ और मजबूरियों की दुहाई भी आती जिससे पिघल कर सोनवा फिर उन्हीं की हो जाती । वह सोचती रहती कि इस बार उनसे ये कहकर लडूँगी, वो कह कर लडूँगी लेकिन बड़े ठाकुर का मुँह देखते ही वह सब भूल जाती और बाँहों में समाकर फफक-फफक कर रो पड़ती । रूलाई के मारे कई बार तो उसकी आवाज़ ही न निकल पाती और ठाकुर साहब के जाने का समय हो जाता ।

सातवाँ महीना चल रहा था, कई दिन बीत गए ठाकुर साहब नहीं आयें । हमेशा वे राशन समय से भिजवा दिया करते थे लेकिन इस बार न जाने क्या हुआ कि राशन भी नहीं पहुँचा । भूख से तड़पती सोनवा चिलचिलाती दोपहरी में ठकुरघराने की ओर चल पड़ी । एकाध किलोमीटर चलने पर ही प्यास से उसकी जान निकलने लगी और ठाकुर साहब के घर के पीछे बेहोश होकर गिर पड़ी । उसी समय रास्ते से गुजरते हुए छोटे ठाकुर ने उसे देख लिया । उससे नफरत तो बहुत करते थे छोटे ठाकुर लेकिन गर्भावस्था में देखकर दया आ गयी और पहले पानी के छींटे मार होश में लायें और बाद में पानी का घुँट पिलाया । सोनवा सरम से गड़ी जा रही थी आँख नहीं मिला पा रही थी उसे याद आ गया जब रमदेऊवा के बदमाशी के बाद चकरोट पर उसकी टोढ़ी पकड़कर उन्होंने पानी भरा लोटा बिल्कुल ऐसे ही उसके होठों से लगाया था तब ऐसा लगा कि लोटा सिर्फ एक लोटा नहीं बल्कि छोटे ठाकुर के होंठ होठों पर आ गये हों । होठों पर होठ रख भी दिया था एक बार छोटे ठाकुर ने सबसे नजरें बचाकर, सोहनी के समय । ऊँखियाड़ी में खींच लिया था और कहा था, “तुम इतनी सुन्दर हो कि तुम्हारे देह से नज़र बिछला जाती है । मैं इसे सोने की तरह ही सम्भाल कर रखना चाहता हूँ । तुम चिंता मत करना मैं तुम्हें छोटी ठकुराइन बनाऊँगा” । उनकी आँखों में एक चमक थी और विश्वास भी कि वे अपनी बात को पक्का पूरा करेंगे । सोनवा वहीं पर सरम से धँस गयी थी और उसकी टोढ़ी उठाते हुए उसके होठों पर कसकर अपनी छाप छोड़ते उन्होंने कहा – “इसके बाद जो भी होगा बियाह के बाद ही होगा । इसे सगाई समझना” । लेकिन न जाने क्या हुआ कि छोटे ठाकुर फिर कभी दिखायी नहीं दिए और बड़े ठाकुर कब किस तरह से उनकी जगह ले लिए कि उसे छोटे ठाकुर की छाप भूल ही गयी थी ।

पानी पीकर सलहन्त होने पर सोनवा से छोटे ठाकुर ने पूछा, ‘कहाँ जाना है, कहीं छोड़ दूँ ?’ असमंजस में पड़ी वह कहे तो कैसे कहे ? होंठ काँपते रहें पर आवाज़ नहीं निकल पायी । छोटे ठाकुर समझ गयें और कहा कि बाबूजी एक-दो महिने के लिए कहीं बाहर गये हैं । कुछ जरूरत हो तो बता दो हम पहुँचवा देंगे ।

सोनवा की आँखें रोकते रोकते भी झरझरा आयीं । राशन-पानी खुद पहुँचाकर सोनवा के घर से निकलते समय छोटे ठाकुर ने बस इतना कहा, ‘अगर बाबूजी ही पसन्द थे तो पहले ही बता दी होती, हमसे माँ को छूने का पाप तो न होता’ ।

“माँ” यह तो कभी सोच ही न पायी थी सोनवा । बड़े ठाकुर से रिश्ता बनने के बाद वह छोटे ठाकुर की सौतेली माँ ही तो हुई !

जुड़वा बेटों को जनम देकर माँ बनते फूली न समाई सोनवा । ठाकुर साहब ने भी खूब जश्न मनाया । लेकिन उनके जश्न पर पानी तब फिर गया जब ठकुराइन ने उन्हें लाल गोले आँखों से दागा, ‘आपकी जगह तब तक इस घर में है जब तक पाप की गठरी बाहर है । घर लाने की कभी कोशिश भी न करियेगा । हमने आपकी रखैल को सह लिया लेकिन बेटे की हिस्सेदारी नहीं सहूँगी’ । उस दिन पहली बार बड़े ठाकुर को एहसास हुआ कि अब उनकी नहीं चलेगी । उन्होंने बड़े ताम झाम से तीन बीघा खेत सोनवा को दे दिया ।

पैसठ की उम्र में बड़े ठाकुर को क्षय रोग लग गया । लोग कहते हैं कि सोनवा को छूने के कारण हुआ । घर से अब राशन पानी सोनवा को नहीं पहुँचता । ठाकुर साहब अब मिलने नहीं आते । सुना है कि छोटे ठाकुर ने मलिकाना हक़ के लिए एक दिन उनकी खूब पिटाई की उसी दिन उनको खून की उलटी हुई और वे तब से बिस्तर पर हैं । सोनवा उन तीन बीघा खेत और दो कमरे में अपने दोनों बेटों के साथ रहने लगी और बड़े ठाकुर का इंतज़ार करने लगी । बच्चों को ‘ठाकुर का पाप’ कहकर चिढ़ाने वालों पर सोनवा चढ़ बैठती, गालियों का बौछार कर देती लेकिन बच्चों के पूछने पर उन्हें नहीं बता पाती कि उन्हें पाप क्यों कहा जा रहा है ।

एक दिन छोटे ठाकुर ने आदमी भेजकर सोनवा से उसकी तीन बीघा खेत छिनवा लिया । उस दिन गिड़गिड़ाती हुई फिर से सोनवा ठकुरघराने पहुँची । बड़े ठाकुर का सटिक जबाब सुनकर उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी, ‘आम्रपाली, तुझे छूने का हर्जाना ही तो भुगत रहा हूँ । अब तो हमें बख़्स दे । कम से कम हम नरक में जाने से बच जायेंगे’ ।

हमार बात अलग है बड़े ठाकुर, लेकिन राऊर इ लइके…’

‘पाप की गठरी हैं इ अमरपलिया, इन्हें हमरे मत्थे मत मढ़ो’ बड़े ठाकुर की आवाज़ इतनी तेज हुई कि सारा घर गूँज उठा और उतनी ही दूर तक फफक कर खून की छींटे पहुँच गए। उस कै के छींटों से लाल हो गयी सोनवा । सुना है उसी के साथ बड़े ठाकुर को लकवा भी मार गया ।

उस दिन सोनवा के कदम उठते न थे वह घंटों पुलिया पर बैठी रही । “पाप की गठरी हैं अमरपलिया” उसके कानों में बजते रहे, वह दोनों कानों को हाथ से दबाकर नीचे बैठ गयी । वहीं पुलिया पर कुछ पढ़ाकू लड़के उसे देखकर आपस में खुसूर-फुसूर करने लगें – ‘अरे ये ठाकुर की रखैल है ना सोनवा’ ?

‘सोनवा ? सोनवा मत कहो… ठाकुर इसे आम्रपाली कहते थे’

हा..हा..हा..हा.. सब हँसने लगें ।

‘उन्होंने ने तो इसका नाम चरितार्थ कर दिया’

‘हाँ… अजातशत्रु और बिंबसार दोनों दिवाने निकले’

हा…हा…हा… (हँसते हुए)

‘यार ऐसा मत कहो, इसे तो पता भी नहीं होगा कि आम्रपाली कौन थी ? आम्रपाली की तरह इसकी भी खूबसूरती इसकी दुश्मन बन गयी । वह भी अपने प्रेमियों के हाथों वेश्या बनी और यह भी बेचारी’ ।

‘हाँ… बड़े ठाकुर का जब तक मन किया, मजा लूटा… अब छोड़ दिया सबके मजे के लिए… सचमुच का आम्रपाली बनाकर…’

धीरे-धीरे आती तीखी आवाज़ों से उसका कान सुन्न हो गया, उस दिन उसने पहली बार जाना कि आम्रपाली यानी अमरपाली कौन थी । जैसे उसने ज़हर पी लिया हो, खून की उल्टियाँ हो रही हों और उसके प्राण निकलने के लिए छटपटा रहे हों पर निकल नहीं पा रहे हों । वह जमीन में धँसती गयी और कहती गयी हे धरती माता ! फट जा हमें सरन दे दो ! लेकिन न तो धरती माता फटीं न ही सरन मिला । बचा खुचा दो कमरे का मकान भी उससे छीन लिया गया । वह सड़क पर आ गिरी ।

खेतों में मजूरी करने के लिए उसने दूसरे गाँव के चमार बस्ती से गुहार लगायी । रमयनिया ने तरस खाकर उसे बस्ती से थोड़ी दूरी पर मड़ई डालने के लिए जगह दे दी । खेतों में मजूरी करके वह जीने-खाने लगी । वह जहाँ से चली थी वहीं पहुँच गयी । फिर से एक बार वह ठाकुर साहब के दुआरे मजूरी लेने के लिए बच्चों के साथ सपट कर बैठी है । ठकुराइन की आग के गोले आँखों से ज्यादा उनकी लाल टिकूली आग उगल रही है और ऐसा लग रहा है कि भर माँग का सेनूर आग की लपटें हैं जो सोनवा को जला डालने में कोई कोर-कसर नहीं छोडेंगे । अपने ससुर की रखैल की सुन्दरता देखने की खातीर खिड़की से झाँकते हुए छोटी ठकुराइन को सोनवा ने देख लिया । उस घर में कोई भी औरत सोनवा के टक्कर की नहीं थीं लेकिन किस्मत ने उसे टक्कर दे दिया था ।

ठकुराइन आँख नचाती हुई अनाज नापने वालों को फटकारने लगीं, ‘जल्दी-जल्दी हाथ चलाओ… कितना सेइया मजूरी देना है कि अभी तक नहीं हो पाया । जाने कहाँ कहाँ से लोग पाप की गठरी लेकर चले आते हैं और दूआरे पर बैठ जाते हैं । तुम लोग हो कि 

पाप की गठरी जनि कहो ठकुराइन… इ हमार लइके हैं… खाली हमार… । हम अपने लइकन के पाल रहे हैं तो दूसरे को धसक काहें है । मेहनत करके मजूरी लेने आये हैं कवनो मुफत में नाहीं…’ । कहते हुए सोनवा कपारे पर मजूरी का बोरा उठा बच्चों के साथ चले जा रही थी और ठकुराइन माँग भरी सेनूर की आग में खुद ही जल रही थीं ।


Sunday, November 19, 2023

मुर्दों के गांव की एक सत्य मार्मिक घटना

मुर्दों के गांव की एक सत्य मार्मिक घटना 

उस गांव के बारे में अजीब अफवाहें फैली थीं. लोग कहते थे कि वहां दिन में भी मौत का एक काला साया रोशनी पर पड़ा रहता है. शाम होते ही क़ब्रें जम्हाइयां लेने लगती हैं और भूखे कंकाल अंधेरे का लबादा ओढ़कर सड़कों, पगडंडियों और खेतों की मेंड़ों पर खाने की तलाश में घूमा करते हैं. उनके ढीले पंजरों की खड़खड़ाहट सुनकर लाशों के चारों ओर चिल्लानेवाले घिनौने सियार सहमकर चुप हो जाते हैं और गोश्तखोर गिद्धों के बच्चे डैनों में सिर ढांपकर सूखे ठूंठों की कोटरों में छिप जाते हैं.


इसी वजह से जब अखिल ने कहा कि चलो, उस गांव के आंकड़े भी तैयार कर लें, तो मैं एक बार कांप गया. बहुत मुश्क़िल से पास के गांव का एक लड़का साथ जाने को तैयार हुआ. सामने दो मील की दूरी पर पेड़ों के झुरमुटों में उस गांव की झलक दिखाई दी. मील भर पहले ही से खेतों में लाशें मिलने लगीं. गांव के नजदीक पहुंचते-पहुंचते तो यह हाल हो गया कि मालूम पड़ता था, भूख ने इन गांव के चारों ओर मौत के बीज बोए थे और आज सड़ी लाशों की फसल लहलहा रही है. कुत्ते, गिद्ध, सियार और कौए उस फसल का पूरा फायदा उठा रहे थे.


इतने में हवा का एक तेज झोंका आया और बदबू से हम लोगों का सिर घूम गया. मगर फिर जैसे उस दुर्गंध से लदकर हवा के भारी और अधमरे झोंके सूखे बांसों के झुरमुटों में अटककर रुक गए. सामने मुरदों के गांव का पहला झोंपड़ा दीख पड़ा. तीन ओर की दीवारें गिर गई थीं और एक ओर की दीवार के सहारे आधा छप्पर लटक रहा था. दीवार की आड़ में एक कंकाल पड़ा था. साथ वाला लड़का रुका,“यह! यह निताई धीवर है.”


“कहां?” अखिल ने पूछा.




“वह, वह निताई धीवर सो रहा है!” लड़के ने कंकाल की ओर संकेत किया,“वह धीवर था और गांव का सबसे पट्ठा जवान. अकाल पड़ा. भूख से उसकी मां मर गई. उसके पास खाने को न था, फिर लकड़ी लाकर चिता सजाना तो असंभव था. उसने अपनी नाव बाहर खींची, मां के शरीर को नाव में रखा, ऊपर से सूखी घास रखी और आग लगा दी. रहा-सहा सहारा भी चला गया और एक दिन वह भी यहीं भूखा सो गया. यहीं, इसी जगह उसकी मां ने भी दम तोड़ा था.” वह लड़का बोला.


हवा का झोंका फिर चला और खोखले बांसों से गुज़रती हुई हवा सन्नाटे में फिसल पड़ी. लड़का चीख पड़ा,“वह सांस ले रही है, सुना नहीं आपने?”


“कौन?”


“वह, वह जुलाहिन सांस ले रही है.”


“क्या वाहियात बकता है!” अखिल ने झुंझलाकर डांटा,“कौन जुलाहिन?”


“आपको नहीं मालूम? वह सामने झोंपड़ी है न, उसी में जुलाहे रहते थे. उसमें से तीन भूख से मर गए. रह गए सिर्फ़ जुलाहा, जुलाहिन और उनका करघा; मगर भूख से उनकी नसें इतनी सुस्त थीं कि करघा भी बेकार था. उन्होंने पास के जंगल से जड़ें खोदकर खानी शुरू कीं. उनके दांत नुकीले हो गए, जैसे सियारों की खीसें. जुलाहा बीमार पड़ गया. जुलाहिन जड़ें खोदने जाती थी. एक दिन जड़ें खोदते वक़्त खुरपी उसके कमज़ोर हाथों से फिसल गई और बाएं हाथ की तर्जनी और अंगूठा कटकर गिर गया. जब वह घर पहुंची तो भूखा व बीमार जुलाहा झल्ला उठा और चिल्लाकर बोला,‘निकल जा मेरे घर से. अब तू बेकार है. न करघा चला सकती है, न जड़ें खोद सकती है.’ तब से जुलाहिन का पता नहीं है. मगर कुछ लोगों का कहना है कि वह भूत बनकर गांव की क़ब्रों के पास घूमा करती है. वह अभी भी सांस ले रही थी, सुना नहीं आपने?”


अखिल ने मेरी ओर देखा और मैंने अखिल की ओर. हम दोनों आगे बढ़े और जुलाहों के झोंपड़े में घुसे. लड़का ठिठका, मगर हिम्मत दिलाने पर वह भी आगे बढ़ा. हम लोग अंदर गए. लड़के ने अंदर से किवाड़ बंद कर लिए और हम लोगों से सटकर खड़ा हो गया. वह डर से कांप रहा था. सामने आंगन में तीन क़ब्रें आसपास खुदी हुई थीं. बीच की क़ब्र में एक बड़ा सा छेद था. उसमें से एक बिज्यू निकला और हम लोगों को डरावनी निगाहों से पल भर देखकर सिर झटका और फिर क़ब्र में घुस गया. आंगन में किसी मुरदे के सड़ने की तेज़ बदबू फैल रही थी. अखिल ने अपना कैमरा संभाला और फ़ोटो लेने की तैयारी की. इतने में पीछे के किवाड़ खड़क उठे. मेरे रोंगटे खड़े हो गए. अखिल बोला,“कोई सियार होगा.”


किवाड़ को किसी ने जैसे बार-बार धक्का देना शुरू किया. मैंने सोचा, शायद ज़िंदा आदमी की गंध पाकर गांव भर के मुरदे हम पर हमला करने आए हैं. मेरे ख़ून का कतरा-कतरा डर से जम गया. लड़का बुरी तरह से चीख पड़ा. अखिल धीमे-धीमे गया, धीरे से किवाड़ खोल दिया. उसके बाद बुरी तरह से चीखकर भागा और मेरे पास आकर खड़ा हो गया. मैं बदहवास हो रहा था और आपको यक़ीन न होगा, मैंने दरवाज़े पर क्या देखा.

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Femina



मैंने जिसे देखा वह आदमी नहीं कहा जा सकता था. वह जानवर भी नहीं था, भूत भी नहीं. एक औरतनुमा शक्ल, जिसकी खाल जगह-जगह पर लटक आई थी, सिर के बाल झड़ गए थे, निचला होंठ झूल गया था और दांत कुत्तों की तरह नुकीले थे. मालूम होता था, जैसे आदमी के ढांचे पर छिपकली का चमड़ा मढ़ दिया गया हो. उसके दाएं हाथ में एक खुरपी थी और बाएं हाथ की दो अधकटी और तीन साबुत उंगलियों में कुछ जड़ें. वह पल भर दरवाज़े के पास खड़ी रही, फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ी.


मैं चीखना चाहता था, मगर गला जवाब दे चुका था. वह हमारे बिल्कुल पास आकर खड़ी हो गई, जड़ें जमीन पर रख दीं और अपने तीन उंगलियोंवाले हाथ को मुंह के पास ले जाकर कुछ खाने का इशारा किया. हम लोगों की जान में जान आई. वह भूखी है, वह आदमी ही होगी; क्योंकि भूख आदमियत की पहचान है. अखिल ने अपने झोले में से केला निकाला और उसकी ओर फेंक दिया. उसने केला उठाया और मुंह के पास ले गई. मगर फिर रुक गई, उठी और झोंपड़ी के दूसरी ओर चल दी.


हम लोगों को कुतूहल हुआ. हम लोग भी पीछे-पीछे चले. वह औरत सहन के एक कोने में गई. वहीं एक मुरदा था, जिसकी सड़ांध आंगन में फैल गई थी. देहाती लड़के ने उसे देखा और पहली बार उसके मुंह से आवाज़ निकली,“जुलाहा! यह तो जुलाहे की लाश है. यह जुलाहिन उसे भी भूत बनाने आई है.”


जुलाहिन लाश के पास गई. लाश सड़ रही थी और उसमें चींटियां लग रही थीं. उसने केला और जड़ें लाश के मुंह पर रख दीं और हंसी. हंसी की आवाज़ मुंह से नहीं निकली, मगर खीसों को देखकर अनुमान किया जा सकता है कि वह हंसी होगी. दूसरे ही क्षण वह बैठ गई और मुरदे की छाती पर सिर रख सुबकने लगी.


“यह जुलाहिन है? मगर यह तो कम-से-कम सत्तर बरस की होगी.”


“सत्तर बरस. No, it is dropsy, देखते नहीं, ज़हरीली जड़ें खाने से इसकी नसों में पानी भर गया है, मांस झूल गया है.” अखिल बोला,“इस मुरदे को हटाओ, वरना यह भी मर जाएगी.”


उसके बाद हम लोग झोंपड़े के भीतर आए. पास में एक गड्ढा था. सोचा, इसी में लाश डाल दी जाए. भीतर आए, लाश के पास से जुलाहिन को हटाया और उसकी लाश भी एक ओर लुढ़क गई. मैं घबरा गया, बेहोश-सा होने लगा. अखिल ने मुझे संभाला. हम लोग थोड़ी देर चुप रहे. फिर मैं बोला-भारी गले से,“अखिल, उंगलियां कट जाने पर यह निकाल दी गई. फिर किस बंधन के सहारे, आखिर किस आधार के सहारे यह मरने से पहले जुलाहे के पास आई थी जड़ें लेकर? क्यों?”


अखिल चुप रहा-मुरदों के गांव की दोनों आख़िरी लाशें सामने पड़ी थीं.


“अच्छा उठो!” अखिल बोला.


हम लोगों ने लाशें उठाईं और गड्ढे में डाल दीं. एक ओर जुलाहा, दूसरी ओर जुलाहिन. बांस के सूखे पत्तों से उन्हें ढांक दिया. मैंने अपनी उंगली से धूल में गड्ढे के पास लिखा,“ताजमहल, 1943” और हम चल पड़े.





Saturday, November 18, 2023

मैं चमार हूं मुझे कोई शर्म नहीं है

 मैं चमार हूं मुझे कोई शर्म नहीं है हिंदी कहानी 

साथियों आज की इस वीडियो में हमने चमार जाटव की एक सच्ची घटना को सामिल किया है यह कहानी जीवन की कड़वी सच्चाई से आपको रूबरू कराने वाली है हमें उम्मीद ही नहीं बल्कि पूरा भरोसा है कि यह कहानी आपको जरूर पसंद आएगी प्यारे साथियों आप लोग वीडियो को पूरा नहीं सुनते है कहानी को पूरा जरूर सुना करे ताकि आपको पूरी और सही जानकारी मिल सके साथियों कहानी पसंद आए तो  एक लाइक जरुर करना और वीडियो को आगे शेयर करना न भूलना आपका बहुत बहुत धन्यवाद होगा। 

प्यारे साथियों आइए कहानी को शुरू करते है 

मैं चमार हूं मगर इस बात को लेकर अब मुझमे कोई शर्म नहीं है 

मैं राजू जाटव, मेरे पिता का नाम महेश जाटव था। हम चार भाई और दो बहने हैं। मेरे दो भाई और मेरी बहन मुझसे बड़ी हैं और एक छोटा भाई और छोटी बहन हैं, जो घर पर रहकर पढ़ाई करते हैं। मेरे पिता प्रतापगढ़ की कचहरी में कार्यरत थे। जिनको सिर्फ और सिर्फ बाबू लोगों के जूते साफ करने के लिए रखा गया था। 


कभी-कभी कीचड़ भी उठाने के लिए भी तब मजबूर होना पड़ता था, जब कभी जमादार कार्यालय नहीं आता था। ऐसी स्थिति में मेरे पिताजी को शौचालय भी साफ करना पड़ता था। यह सब पापी पेट के लिए पिताजी को करना पड़ता था। पेट की खातिर इंसान वह सब कर लेता है, जिसको उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा। 




‘चमरौटी’ शब्द मुझे चुभा ज़रूर मगर मैं टूटा नहीं

जब तक मैंने अपने पिताजी को ऑफिस में नहीं देखा था तब तक तो मुझे सब कुछ ठीक लगता था। एक दिन मैं तेज़ बारिश में पिताजी को खाना देने गया। मैंने वहां पर जो देखा उसे देखकर दंग रह गया। मेरा पूरा शरीर थरथराने लगा। मेरे पिताजी कुल्हड़ में गंदी ज़मीन पर बैठ कर चाय पी रहे थे और जो बाबू अंदर जा रहा था उसके जूते साफ कर रहे थे।

मैं दरवाजे की आड़ में छुप गया और इस बात को नज़रअंदाज़ करते हुए चिल्लाया, “बाबा कहां हैं?” अंदर से आवाज़ आई, “देखा भई चमरौटी से कौनो आया है। महेशवा का बेटवा आवा बाटिन का” यह ठेठ अवधि भाषा है। मैं यह चमरौटी शब्द सुन कर थोड़ा संकुचित हुआ और बाबा को खाना देकर घर लौट आया। ‘चमरौटी’ शब्द मुझे चुभा ज़रूर मगर मैं टूटा नहीं।


मेरे विद्रोह की शुरुआत

मैंने माँ से पूछा हमारा विद्यालय में दाखिला क्यों नहीं होता? भैया भी नहीं पढ़े, दीदी भी ब्याह दी गईं। अम्मा बोली, “दलित को कौन पूछे बेटवा, ऊपर से तुहार जाति भी चमार।”


मैंने सोचा कि क्या यह बात सच में मायने रखती है कि शिक्षा ग्रहण करने में जाति और गोत्र पूछा जाता है? मैंने माँ से कहा, “अम्मा बाबा अक्सर भीमराव अंबेडकर जी के बारे में बताते हैं। वह भी तो दलित थे, फिर उन्होंने अपनी शिक्षा कहां से ली? माँ ने जवाब दिया, “तू खुद ही बाबा से पूछ लिहे बेटवा, हमका नाहीं पता।”

यह मेरे विद्रोह की पहली शुरुआत थी, क्योंकि गाँव के बाहर मुझको ‘चमार-चमार’ कह कर पुकारा जाता था। अब यह शब्द मुझे काटने को दौड़ने लगा था। मैंने बाबा से शिक्षा के लिए पूछा, तो उन्होंने बताया मैं शिक्षा ग्रहण कर सकता हूं, मगर शहर जाकर।


मैंने बाजू के गाँव में रहने वाले लाला ठाकुर के बेटे मनीष से बात की। उन्होंने मुझे बताया कि तुम्हारी उम्र अभी है तुम कक्षा छठी में दाखिल हो सकते हो‌ लेकिन तुमको बेसिक ज्ञान होना ज़रूरी है। 


जैसे तैसे मैंने अपनी 5 वीं तक की पढ़ाई पूरी की

मनीष जी की मदद रही कि उन्होंने मुझे शहर तक तो पहुंचा दिया। मैं प्रतापगढ़ के एक विद्यालय में दाखिला लेने पहुंचा। वहां के अध्यापक ने बाबा को बुलवाया, मैं भागता-भागता बाबा को बुलाने गया। बाबा खुशी से झूम उठे।


उन्होंने बाबू से पूछा कि बेटे के दाखिला के लिए चौक तक जाना है। बस आधे घण्टे में वापस आ जाऊंगा साहब। वैसे मेरे लिए तो वह आदमी ना साहब था और ना ही कोई बाबू। बस जैसे-तैसे मेरा दाखिला हो गया। बाबा ने मुझे घर भेजते हुए कहा अगले दिन तुमको स्कूल जाना है। मैं वापसी में कपड़े लेता आऊंगा। 

मैं बहुत खुश था, मुझे आशा की किरण नज़र आने लगी थी। मैं भी बाबू बनना चाहता था, ताकि दलित समुदाय के लोगों को जागरूक कर सकूं। घर में भी खुशी का माहौल था। मैं बाबा की बाट जोहने लगा, उनका रास्ता देखने लगा।


दूर से मुझे आज तांगा आता दिखाई दिया। आज बाबा तांगे से घर आ रहे थे, उनके पास साईकल नहीं थी आज। बाबा के हाथ में थैला था, जिसमें मेरे स्कूल के कपड़े थे।

इसी बीच बाबा का हो गया देहांत

मैंने देखा कि बाबा ने एक हाथ से अपना पेट पकड़ा हुआ था। बाद में पता लगा बाबा को उनके बाबू ने ऑफिस देर से पहुंचने पर पेट में लात मार दी थी। जिससे उनके आंव (मल में खून) आने लगा। मेरे बाबा को माँ ने बिस्तर पर लिटाना चाहा, मगर बाबा का वहीं देहांत हो गया था। वह हम सब को अलविदा कह गए थे। 


उस दिन मेरे अंदर का राजू टूट कर बिखर गया था। मेरे बाबा की अर्थी में सब दलित समुदाय के लोग ही शामिल हुए थे। जैसे ही घर से बाबा की अर्थी उठी और चलने लगी, तो पीछे से जितने घर थे। सभी लोग अपने घर के आगे पानी से सफाई करने लगे और मंत्र का जाप करने लगे। उस समय मानो ऐसा लग रहा था जैसे हम इंसानों के बीच नहीं जानवरों के बीच में रह रहे हों। 


अब तो मुझे ‘चमार’ शब्द से ही डर लगने लगा था

बहरहाल, मुझे फिर से एक मानसिक आघात झेलना पड़ा। मुझे चमार शब्द से ही डर लगने लगा था। मैंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और अपने पिता को श्रद्धांजलि के तौर पर अपनी शिक्षा जारी रखने और एक कामयाब इंसान बनने की शपथ ली। मैंने 12वीं कक्षा विज्ञान से पास की और दिल्ली के लिए निकल पड़ा।

मैं अपने गाँव से दूर था और उस शहर में था जो देश की राजधानी है। खुद को संभालने में मुझे करीब 2 साल लगे। मैंने कॉलेज में दाखिला लिया। बता दूं कि मैं यहां कॉलेज का नाम नहीं ले सकता। वहां पर जैसे-तैसे करके मैंने दो साल गुज़ारे हैं। लोगों से कम ही बोल-चाल थी। बड़ा शहर है लेकिन लोग नाम से ज़्यादा ‘सरनेम’ पर ध्यान देते हैं। 

लोग मुझे ‘चमार’ कहकर बुलाने लगे

एक दिन मैं क्लास में बैठा था। सभी लोग अपना अपना पूरा नाम लिखवा रहे थे। कोई वर्कशॉप थी उसी के लिए क्लास में होड़ मची हुई थी। जैसे ही मैंने अपना नाम बोला, वहां खड़े सर ने कहा, “जाटव, चमार हो क्या?”


उनका इतना ही बोलना था और मेरे ऊपर तो जैसे किसी ने हथौड़े से वार कर दिया हो। मैंने सिर हिला कर हां में जवाब दे दिया। फिर उस दिन से जब तक मेरा कॉलेज पूरा नहीं हुआ, मैं चमार नाम से ही पुकारा जाता रहा। 


हर दिन मेरे मष्तिष्क पर यह शब्द चोट करता रहा। दरअसल मुझे चमार शब्द से तकलीफ नहीं होती थी। मुझे लोगों की विचारधारा और सोच पर शर्म आती थी। मुझे दुःख होता था कि समानता का पाठ पढ़ाने वाले भारत के नागरिकों को क्या हो गया है? जाति के नाम पर हर दिन लोगों की आत्मा को मारा जा रहा है।

मैंने फैसला किया मैं ‘चमार’ शब्द के साथ ही जीऊंगा

मैंने फैसला किया कि मैं दिल्ली नहीं छोडूंगा और इस शब्द के साथ ही जीऊंगा। मैं इसके कारण मानसिक अवसाद से करीब पांच सालों से जूझ रहा हूं। अब मैं खुद के नाम के आगे जाटव नहीं चमार लगाकर ही बताता हूं कि मैं “राजू चमार” हूं। जिसको मेरा साथ पसंद आता है, वह मेरे साथ हैं। जिन्होंने ज़्यादा धार्मिक मापदण्डों को अपने सिर पर चढ़ा लिया है, वह मुझे छोड़कर चले जाते हैं। 


बचपन से अब तक इस शब्द से मैं भागता आया हूं लेकिन अब ठान लिया है। मैं इस ‘चमार’ शब्द को अपना दोस्त बनाऊंगा। जिसे इस अमानवीय समाज ने एक गाली के रूप में प्रयुक्त किया है।


मैं भारतीय हूं और एक मज़बूत नागरिक भी हूं। ऐसे तो हज़ारों भारतीय नागरिक होंगे जो सिर्फ नाम के ही भारतीय हैं। भारत में सबसे महत्वपूर्ण एक शब्द है, वह है ‘समानता’ जो इस शब्द को समझ गया और अपने जीवन में ढाल लिया, तो समझिए उसने इंसान होने का सुबूत दे दिया।


वहीं, जिसने भी इस समानता शब्द को सुना तो सही मगर मतलब समझा नहीं, तो समझ जाइए वह शायद मनुष्य कहलाने के लायक ही नहीं है।

प्यारे साथियों कहानी कैसी लगी हमे कमेंट करके जरूर बताना लाइक और शेयर करना ना भूले और चैनल को भी जाते जाते सबस्क्राइब जरूर करते जाना आपका बहुत बहुत धन्यवाद होगा साथियों इस वीडियो में इतना ही है कहानी सुनने के लिए आपका शुक्रिया जय भीम नमस्कार साथियों धन्यवाद 



एक दलित बस्ती की कथा कैथ का पेड़ अपना गांव

 एक दलित बस्ती की कथा कैथ का पेड़ अपना गांव 

आज की इस इस कहानी में कटु सत्य का सामना करना पड़ेगा इस कहानी में जूठन के कड़वे सच और दलित जाटव की दर्दनाक घटना का सामना भी इस वीडियो में सुनने को मिलेगा

एक दलित बस्ती की कथा कैथ का पेड़ 

डॉ. आंबेडकर का मत था कि किसी भी जाति के लोग अपनी इच्छा से जूठन और मरे हुए जानवर का सड़ा मांस नहीं खाते थे। दलित जाति के लोग अगर जूठन और मरे हुए जानवर का सड़ा मांस खाते थे, तो इसलिए कि उसे स्वच्छ खाना और ताजा मांस उपलब्ध नहीं होता था। उन्हें स्वतंत्र जीविका के अवसरों से वंचित और जीवित रहने के लिए पराश्रित बनाकर रखा गया था। 

बुद्ध ने जन्म को भी दुख कहा है और मरण को भी। मैं नहीं जानता कि बुद्ध ने सही कहा है या गलत? पर, आज जब मैं पीछे मुड़कर अपनी बस्ती के लोगों को देखता हूं, तो बुद्ध मुझे गलत दिखाई नहीं देते। हमारे लोगों का संपूर्ण जीवन दुख से शुरू होता था और दुख में ही खत्म हो जाता था। वे कीड़े-मकोड़ों की तरह पैदा होते थे और कीड़े-मकोड़ों की तरह ही मर जाते थे। उनका जन्म भी दुख था और मरण भी। शायद बुद्ध को यह संबोधि ऐसे ही श्रमिक लोगों को देखकर प्राप्त हुई होगी। पर इन दुखी श्रमिकों में भी, जो रोज थोड़ा-थोड़ा मरता था गजब की उत्सवधर्मिता थी। वे दुखी थे, पर दूसरों का दुख बांटते थे। वे असहाय थे, पर सबकी सहायता करते थे। वे, हर्ष-शोक, सब मिलकर मनाते थे।




आती थीं। यह समझ में आता है कि औरत की गणना पितृसत्ता में अंत में ही होती है, पर पत्तलों और कुल्हडों के होते हुए उनका अपने बर्तनों को लेकर आने का कारण यह था कि उनकी पंगत नहीं लगती थी, वे सब एक कमरे में समा जाती थीं और थाली को घुटनों पर रखकर या हाथ में लेकर अपने छोटे बच्चों के साथ खाती-खिलाती थीं। वे बचे हुए खाने को साथ में भी ले जाती थीं, जबकि मर्द ऐसा नहीं कर सकते थे। खैर, बहुत बार ऐसा भी होता था कि औरतों का नंबर आने तक अक्सर कोई सब्जी या कोई अन्य आईटम कम पड़ जाता था या खत्म हो जाता था। तब बेचारी उन औरतों को ही या तो फिर से बनाना पड़ता था या जो उपलब्ध होता था, उसी से काम चलाना पड़ता था। इसी समय परोसने वाले सेवक भी खाना खाते थे। वे परोसते भी थे और इस अवसर का लाभ उठाते हुए अपनी दिलकश भाभियों के साथ हंसी-मजाक भी कर लेते थे। वे भाभियां भी उसका लाभ उठाते हुए उनसे लड्डुओं का अतिरिक्त भोग लगवा लेती थीं। माहौल कुछ ऐसा हो जाता था कि कुंवारे देवरों को भाभियों से नसीहत भी मिल जाती थी। कोई-कोई तो यहां तक कह देती थी कि ‘देवर जी, जल्दी शादी कर लो, तुम्हाए बच्चे पिछाए होते जा रए हैं।’ उन देवरों के पास जवाब भी तैयार रहता था। तुरंत कहते, ‘भौजी, कोई तुम जैसी मिलै तो कर लूं।’ कोई कहता, ‘भाभी अपनी भैन से करा दो न, मेरी शादी!’ इसी हंसी-मजाक में औरतों का भी खाना निबट जाता।


लेकिन ऐसे सभी अवसरों का एक घृणित, मार्मिक और हृदयविदारक दृश्य भी मेरी स्मृतिपटल पर साथ-साथ चलता है, जो भुलाए नहीं भूलता। यह दृश्य जूठन बटोरने का है। जिन जूठी पत्तलों को उठाकर बाहर घूरे पर फेंका जाता था, वहां उनमें से जूठन निकालने के लिए एक मेहतर परिवार कुछ बर्तन लिए बैठा होता था। उनके साथ ही मुहल्ले के कुत्ते भी खड़े होते थे। जब पत्तलें फेंकी जातीं, तो कुत्ते उन पर टूट पड़ते थे, जिन्हें वे मेहतर अपने डंडे से भगाकर उन पत्तलों पर से बची हुई पूड़ी और सब्जी को अपने बर्तनों में अलग-अलग रखना शुरु कर देते थे। उनका यह सिलसिला अंतिम पंगत के खाना खाने तक चलता था। जूठन बटोरने की यह प्रथा पूरे शहर के मेहतरों में प्रचलित थी। मेरी शादी 1975 में हुई थी, और 1975 तक मैंने इस प्रथा को देखा था। ये मेहतर उसी मुहल्ले में इस प्रथा को अंजाम देते थे, जो उनके ठिकाने में आते थे। दलित लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपनी आत्मकथा ‘जूठन’ में इस प्रथा का जो चित्रण किया है, वह अक्षरशः सत्य है। दलित लेखक सूरजपाल चौहान ने तो अपनी आत्मकथा ‘तिरस्कृत’ में जूठन से भरी बाल्टी को अपने सिर पर ढोने की बेबसी का भी चित्रण किया है। 

 अगर किसी नौते पर विवाद होता, तो उसका निबटारा पुरानी कॉपियों में देखकर किया जाता था। अक्सर विवाद उतारू नौते पर होता था। अगर कोई उतारू में दो या एक रुपया कम नौता लिखवाता, तो वहां मौजूद कन्या या वर का पिता अपनी कॉपी देखकर कहता कि उसने तुम्हारी फला लड़की की शादी में, जो फला तारीख को हुई थी, पांच रुपए नौते में चढ़ाऊ दिए थे। कॉपी देखकर उसे भी बात माननी पड़ती थी। कॉपी का लिखा ही सही माना जाता था। इसमें भूल-चूक तो हो जाती थी, पर बेईमानी एक पैसे की भी नहीं होती थी। नौते की यह परंपरा विवाह में आर्थिक सहायता का एक अतिरिक्त स्रोत थी। आर्थिक सहायता का एक अन्य स्रोत ‘भात’ की परंपरा भी थी, जो आज भी है। इस परंपरा में वर या कन्या की माता के मायके से नकदी और कपड़ों के रूप में मदद आती थी। आम तौर से यह भाईयों की ओर से अपनी बहिन की सहायता होती है। नौता उतारू के रूप में लौटाना होता था, पर भात नहीं लौटाया जाता। उन दिनों नौते की रकम रुपए-दो रुपए की ही होती थी। उस दौर में यह रकम भी बहुत थी। यह एक आदमी की दिनभर की मजदूरी होती थी। इस रस्म से पांच-छह सौ रुपए इकट्ठे हो जाते थे, जो सस्ती की उस दौर में काफी मायने रखते थे।

विवाह और नौते में सामुदायिकता का यह भाव अब दिखाई नहीं देता। एक तरह से सहकारिता पर आधारित यह व्यवस्था अब पूरी तरह खत्म हो गई है।


यही सामुदायिकता और सहकारिता की भावना मृत्यु के अवसर पर भी देखी जाती थी। विवाह के सद्दे की खबर की तरह ही मृत्यु की खबर भी सातों मुहल्लों में भिजवाई जाती थी। जिस बस्ती में मौत होती, उसकी खबर सभी बस्तियों में भेजने के लिए एक आदमी को भेजा जाता। वह न सिर्फ यह खबर देता कि फलां मुहल्ले में गमी हो गई है, बल्कि मरने वाले का नाम और मैयत या मिट्टी उठने का समय भी बताता था। खबर सुनकर लोग अपने काम से जल्दी उठ जाते और समय से पहले ही गमी वाले घर पहुंच जाते थे। जो समय पर नहीं आ पाते थे, वे सीधे श्मशान पर पहुंचते थे। मृतक के घर के पास एक खाली जगह पर दरियां बिछा दी जाती थीं, जिन पर लोग आकर बैठते जाते थे। उनके बीच में एक-दो हुक्के और कुछ बीड़ी के बंडल व माचिसें रख दी जाती थीं। हर बस्ती में कुछ लोग थे, जो अर्थी को बांधने में निपुण होते थे। उन्हीं लोगों को अर्थी बांधने का काम सौंपा जाता था। कफन अन्य सामग्री को छोड़कर अर्थी का सामान कुम्हारों के यहां से लाया जाता था, जिनमें बांस, फूंस, खपच्चियां होती थीं। कफन बाज़ार जाकर कपड़े की दुकान से लाया जाता था। यह भी नियम था कि जिस घर में मौत होती थी, उस घर का सदस्य कफन आदि सामग्री लेने नहीं जाता था। पर खर्चा सारा अंतिम क्रिया का मौत वाला वही परिवार करता था। अगर वह परिवार बहुत गरीब होता, तो अंतिम क्रिया का सारा इंतजाम परस्पर सहयोग से इतनी आसानी से हो जाता था कि पता ही नहीं चलता था। यह सामुदायिकता थी बस्ती में। अमूमन शाम को चार बजे तक अर्थी उठ जाती थी। इसके बाद रात में अंतिम संस्कार नहीं किया जाता था।


रामपुर की कोसी नदी के तट पर बने श्मशान घाट तक शवयात्रा पैदल ही जाती थी। आज यह श्मशान घाट बहुत ही खूबसूरत और मनमोहक ‘स्वर्गधाम’ बना दिया गया है, जहां आराम से बैठाकर बतियाया जा सकता है। पर तब वह एक डरावना स्थल होता था। जब तक चिता जलती, तब तक सभी लोगों को खड़े रहना ही पड़ता था। जब चिता में आग लग जाती, तो उपस्थित लोगों की गणना की जाती थी, और यह पता लगाया जाता था कि किस मुहल्ले और किस घर से गमी में कौन नहीं आया है। उस अनुपस्थित व्यक्ति पर उसी वक्त अर्थदंड लगाया जाता था। अगर कोई व्यक्ति गमी के अवसरों पर लगातार अनुपस्थित रहता था, तो उसका हुक्कापानी बंद कर दिया जाता था, अर्थात् सामाजिक बहिष्कार। इसलिए कुछ लोग, जो किसी कारण से खुद नहीं आ सकते थे, दंड से बचने के लिए अपने लड़के को भेज दिया करते थे। ऐसी थी सामुदायिकता! जब घर से श्मशान तक शवयात्रा गुजरती थी, तो कम-से-कम उसमें डेढ़-दो सौ लोग शामिल होते थे।

एक दिन मैंने देखा कि कारखाने के अंदर एक कारीगर मुर्गा बना हुआ है और उसके ऊपर दो ईंटें रखी हुई हैं। मैं उस समय 14-15 साल का रहा होऊंगा, स्कूल में ऐसे दृश्य देख चुका था, इसलिए किसी के मुर्गा बनने का मतलब अच्छी तरह जानता था। मैं डर गया। मेरे पिता ही नहीं, वहां के सभी कारीगरों के चेहरों पर डर साफ दिखाई दे रहा था। कंवल भारती द्वारा लिखित आत्मकथात्मक शृंखला का अंतिम भाग

. आंबेडकर ने अपने लेख ‘हेल्ड एट बे’ में लिखा है कि “जब सवर्ण और दलित मिलते हैं, तो वे मनुष्य से मनुष्य के रूप में नहीं मिलते, बल्कि परस्पर दो भिन्न समुदायों के रूप में या दो भिन्न राज्यों के नागरिकों की तरह मिलते हैं।” दुखद रूप से यह आज भी सच है। यह यथार्थ सिर्फ गांवों का ही नहीं है, शहरों का भी है। शहर में भी एक और शहर पीड़ितों, उपेक्षितों और दलितों का होता है। इस पृथक शहर के साथ किसी की कोई सहानुभूति नहीं होती है। हम कह सकते हैं कि वे सदैव अजनबियों की तरह जीते हैं। एक ही शहर में रहने वाले एक समुदाय के लोग सड़क पार करते ही दूसरे समुदायों के लिए अजनबी हो जाते हैं। डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि गांवों में दलित जातियों के लोग इसलिए सामाजिक बहिष्कार के शिकार होते हैं, क्योंकि वे परंपरा के विरुद्ध खड़े होते हैं। सामाजिक बहिष्कार और अत्याचारों के कारण ही वे गांव छोड़कर शहरों में जाकर बसते हैं। लेकिन यह पलायन गांवों में ही नहीं होता, बल्कि शहरों में भी होता है। वह परिस्थिति बहुत पीड़ादायी होती है, न केवल विस्थापितों के लिए, बल्कि उनके प्रियों के लिए भी। एक बार बहुजन नायक कांशीराम ने दलित विस्थापितों पर बहुत ही सही सवाल उठाया था। उन्होंने कहा था कि भारत सरकार सिर्फ कश्मीरी पंडितों की चिंता करती है, जिन्होंने आतंकवाद से बचने के लिए विस्थापन किया था। वह उनके लिए दिल्ली में पुनर्वास मंत्रालय कायम करती है, पर उसे उन लाखों विस्थापित दलितों की कभी चिंता नहीं हुई, जो दबंगों, सूदखोरों और जमींदारों के आतंक से बचने के लिए अपनी जड़ों से उखड़ते हैं। क्या उनके लिए कोई मंत्रालय सरकार ने कायम किया?

इस अंतिम भाग में मैं इसी विस्थापन पर बात करूंगा, जिसकी यादें आज भी शूल-सी चुभती हैं। अभी पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बहुल क्षेत्र कैराना में कुछ हिंदुओं के पलायन पर नेताओं ने बहुत हो-हल्ला मचाया था। उसके पीछे वोट की राजनीति थी। वोट की राजनीति तो सत्तर के दशक में भी थी, पर उसे दलितों की चिंता नहीं थी। उस समय भी मीडिया के अपने सामाजिक-राजनीतिक सरोकार थे। इसलिए, हमारी बस्ती के जाटवों का विस्थापन किसी के लिए भी चिंता का विषय नहीं बन सका था। मैं भी आज आधी सदी के बाद उसे इतिहास में इसलिए दर्ज कर रहा हूं, क्योंकि कबीर साहेब के शब्दों में वह मुर्दों का गांव था– संवेदनहीन, पाषाणतुल्य, प्रतिरोध-विहीन, घोर अशिक्षित और घोर दयनीय। हालांकि, औरतें प्रतिरोध-विहीन नहीं थीं, वे खूब विरोध करती थीं और लड़ती भी थीं, लेकिन, मर्द उन्हें, पता नहीं क्यों, चुप करा देते थे। इसलिए वे लोग पलायन या विस्थापन को समाज-व्यवस्था से जोड़कर नहीं देखते थे, बल्कि उसे अपने नसीब का खेल समझते थे।


चूंकि हिंदू समाज व्यवस्था में दलित-पिछड़ी जातियों के सारे काम-धंधे पैतृक समझे जाते हैं, इसलिए हमारी बस्ती के जाटव दूध या सब्जी बेचने-जैसा कोई काम नहीं कर सकते थे, क्योंकि अगर वे ऐसा करते, तो कोई भी उनसे यह सामान नहीं खरीदता। इसी का फायदा कारखाना-मालिक और साहूकार उठाते थे। मैं पीछे लिख चुका हूं कि कारखाना-मालिक कारीगरों को उधार में कच्चा माल देकर अपने कारखाने में ही उनसे जूते तैयार करवाते थे, और वही जूते वे उनसे सस्ते में खरीद कर अपना उधार काटकर, जो धन बचता था, वह उन्हें दे देते थे। कच्चा माल और जूते की कीमत कारखाना-मालिक ही तय करते थे। इस जाल में सारा लाभ मालिकों को ही मिलता था, कारीगरों के हाथ में उतना पैसा भी नहीं आता था, जिससे वे हफ्ते भर की दाल-रोटी चला लेते, या घर की कोई और जरूरत पूरी कर लेते। शोषण के इस जाल को वे इस खूबसूरती से बुनते थे कि उन भोले-भाले कारीगरों का उसे समझना मुश्किल था। फिर भी किसी प्रकार दाल-रोटी तो उनकी चल जाती थी, एकाध वक्त चूल्हा नहीं भी जलता था, तो उसे वे भगवान की मर्जी मानकर सब्र कर लेते थे, लेकिन इसके सिवा भी जीवन-निर्वाह की जरूरतें थीं, हारी-बीमारी थी, तीज-त्योहार थे, बरसात से पहले घर की मरम्मत और बच्चों के शादी-ब्याह की चिंता थी। हालांकि बच्चों की पढ़ाई-लिखाई उन गरीबों की भी चिंता में नहीं थी, पर जिनकी चिंता में थी, उनके लिए घर चलाना और भी मुश्किल होता था। इन सारी जरूरतों को वे कर्ज लेकर पूरा करते थे, जो वे बनियों से लेते थे या अपने कारखाना-मालिकों से। कुछ लोग दोनों से कर्ज लेते थे। और उनकी पूरी जिंदगी उस कर्ज को चुकाते हुए ही गुजर जाती थी। वे बनिए का ब्याज देते रहते थे, और कारखाना-मालिक का तो जाल ही इतना मजबूत था कि वे उसमें बंधे रहते थे। ऐसे लोग इज्जत की नहीं, जिल्लत की जिंदगी जीते थे। कारखाने का मालिक और बनिए का मुनीम उनके साथ गारी-गुफ्तारी (गालियां) से लेकर मारपीट तक करता था।

 कुछ दिन काम करके उसने वहां के माहौल से डरकर काम छोड़ दिया था। इस अपराध की उसे भारी सजा दी गई। उसे पकड़कर कारखाने में लाया गया, और मुर्गा बनाकर उसके नीचे मोमबत्ती जला दी गई। जब मोमबत्ती की लौ उसके चूतड़ को जलाने लगी, तो उसकी चीखें शटरबंद हॉल के अंदर से बाहर तक जा रहीं थीं। पर, राह चलते किसकी हिम्मत थी कि वह शटर खुलवा कर देखता कि अंदर क्या हैवानियत चल रही थी? 


इस हैवानियत ने जाटवों के दिलों पर जख्म तो कर दिए थे, लेकिन उनमें विरोध करने का साहस नहीं हो रहा था। सबकी अपनी-अपनी कमजोरियां थीं, और सब ही उसके कर्जदार थे। वे कर्जा चुका नहीं सकते थे और कर्जे की राजनीति को जानते नहीं थे। वे पहली पीढ़ी के लोग थे, जिनकी दूसरी पीढ़ी भी उन जैसी ही थी, पर उसके अचेतन में गुस्सा जरूर जमा हो रहा था। फिर भी बिरादरी के कुछ जिम्मेदार लोग इस घटना पर विचार करने के लिए हमारी बस्ती में नेतराम के घर में इकठ्ठा हुए। इनमें बन्नीराम, रामसरन, प्यारेलाल, मुरारी लाल, नत्थूलाल और मेरे बाप थे। मेरे बाप ने धूमी खां से बात करने का सुझाव रखा था। वह हमारे मुहल्ले के करीब ही घेर नज्जू खां में रहते थे और कांग्रेस के नेता थे। पर रामसरन बोले, “हमें बात को बढ़ाना नहीं है। हमें इशरत मियां से जाकर शिकायत करनी चाहिए।” पर किसी ने भी यह कहने का साहस नहीं किया कि इस हैवानियत की रिपोर्ट प्रशासन में जाकर करनी चाहिए। अगर वे उस दिन पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की हिम्मत कर लेते, तो, भले ही ताकत के सामने वे हार जाते, पर जाटवों के प्रतिरोध का इतिहास बन जाता। लेकिन, जब मैंने अपने बाप से पूछा, “इशरत मियां ने क्या इंसाफ किया था?” तो उनका जवाब था कि “इशरत मियां के पास कोई गया ही नहीं था।” इतना खौफ था, उस समय के जाटवों में, कि अपने ऊपर हो रहे जुल्म का बदला लेना तो दूर, उसकी शिकायत भी वे नहीं कर सकते थे। लेकिन बाप ने बताया कि उस घटना के बाद, फिर कोई कारीगर वहां काम करने नहीं गया था, और वह कारखाना बंद हो गया था। यह भी एक प्रतिरोध ही था।

साथियों इस कहानी में इतना ही है आप सभी का वीडियो देखने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया जय भीम नमस्कार साथियों 


Friday, November 17, 2023

ठाकुर और मेहतरों की कहानी || ठाकुरों के अत्याचार सत्य घटना पर आधारित घटना

ठाकुर और मेहतरों की कहानी 

ठाकुरों के अत्याचार सत्य घटना पर आधारित घटना 

गाँव के पूर्वी छोर पर मेहतरों का एक टोला था। जिसमें

बीस-तीस परिवार शहर भर की जूठन खा-खाकर अपने पैट

भरते थे। वहाँ मकान के नाम पर कुछ फूस की झोंपड़ियाँ

तथा ऑँगन के रूप में गोबर से लिपे-पुते ज़मीन के छोटे-

बड़े टुकड़े थे। गॉँव का नाम था मक़दूमपुर। कहते हैं कभी

औरंगजेब के जमाने में हिन्दुओं को उजाड़कर यह गाँव

बसाया गया था। इस बात में कितना सच है और कितना

झूठ, यह तो कुछ नहीं कहा जा सकता, किन्तु अब यहाँ

मुसलमानों के चार-पाँच मकान ही दिखाई देते हैं। उन्हीं

पुराने मकानों के बीच अवशेष मात्र एक टूटी-सी मस्जिद,

जिसे लोग अब लंगड़ी मस्जिद के नाम से पुकारने लगे हैं।

दूर



मुसलमानों के चन्द मकान बिलकुल मेहतरों की झोंपड़ियों

में सिमटे हुए थे। आने-जाने का भी एक ही रास्ता थা, जो

मेहतरों की बस्ती से होकर जाता था। गाँव में अन्य जातियों

के भी मकान थे लेकिन थोड़ा हटकर। सुना जाता है कि

अब से बहुत समय पहले जब इस गॉव में शूद्र प्रवेश करते

थे तो उनकी पीठ पीछे बहुत झाड़ बँधा होता था। किन्तु

अब वे मान्यताएँ थोड़ी ढीली- ढाली-सी हो गई थीं। पुराने

लोग जाते-जाते हुए भी ऐंठन नहीं छोड़ रहे थे और नई पीढ़ी

के बीच किसे फुर्सत थी कि जो इन बातों को देखे? अपने

काम से काम, गली-मुहल्ले में अब वैसी पंचायत भी नहीं

होती। चौपाल पर हुक्कों की गुड़गुड़ाहठ कहा..?

वातावरण में अब खमीरी तम्बाकू की हल्की-हल्की गंध भी

नहीं तैरती। हुक्के पीने वाले ही नही होंगे तो भरने वाले

कहाँ से आएँे..? पहले हुक्का भरने का काम नाई करते

थे। दो मिनट हुए नहीं कि नई चिलम तैयार। एक-एक

ठाकुर के यहाँ चार-चार, पाँच-पाँच नाई हुआ करते थे।

सभी अपनी-अपनी जिम्मेदारी से बँंथे होते थे। कौन अपने

काम में कितना दुरूस्त हैं, यह ठाकुर को पहले कश में ही

मालूम चल जाता था। राह चलते लोग सुबह से शाम तक

सलाम बजाते न थकते थे। गाँव के मूृखिया की बात सभी

को माननी पड़ती थी। अब कहाँ कौन किसको मुखिया

मानता है? घर-घर में सब चौधरी बन गए हैं।

एक दिन इसी गाँव के मैहतरों वाले टोले से काली आँधी

की तरह यह बात उठी - हम जूठन न लेंगे और न ही

गन्दगी साफ करेंगे। बस्ती में छह-सात ही बड़े-बूढ़े थे। वे

हुक्का गुड़गुड़ाते हुए एक-दूसरे से बतियाते। मिट्टरी के

हुक्कों के पास शू-शें करते सुअर और उनके पीछे-पीछे

दौड़ते बच्चे। आसपास छिटकी गन्दगी, कूड़े के बड़े-बड़े ढेर

पास ही मिट्टी और फूस की टूटीफूटी झोंपड़ियों, जिसमें

झाँकते उनकी जातीयता के चिह्न। इस ओर से कोई

गुजरता तो पहले ही अपनी नाक पर धोती का कोना या

रूमाल रख लेता। औरतें होती तो साड़ी के पल्लू से नाक

और ओंठ दोनों ढक लेती और इससे पहले कि बदबू का

भभका टकराए वे जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाती हुई निकल जाती है

"ससुरे दूसरों की गन्दगी उठाते हैं और अपनी नहीं..

कितनी बदबू, सत्यानाश हो इनका.."

इस टोले से गुजरने वाला कोई मुसाफिर ऐसा न होता जो

नाक में घुसी बदबू को चुपचाप सहकर आगे बढ़ जाता हो।

मुह से कुछ-न-कुछ उगले बिना नहीं रहा जाता। कभी-

कभी ऐसा भी होता कि शहर से मेहतरों के टोले मैं ही कोई

अच्छे कपड़े पहने हुए अप-टू-डेट आता तो दो-चार बातें

सुनाए बिना भी नहीं रहता। उसकी बातों से एक आम

शहरी की बू आती। बात-बात में शहर और गाँव में रहने-

सहने के अन्तर को बतलाया जाता। हालांकि बस्ती में रहने

वालों पर इन सब बातों का जरा भी प्रभाव न पड़ता।

गन्दगी के साम्राज्य के बीच अधिकांश मेहतर बड़ी बेफिक्री

से रहते।

गाँव के ठाकुरों की बस्ती अलग से ही पहचानी जाती। खूब

साफ लिपे-पुते मकान। लोहे के चौड़े-चौड़े दरवाजे। उनके

आसपास खुब खाली जगह होती। कोई घर ऐसा न था

जिसमें रखी लाठी पर दो-चार तोले चाँदी न मढी गई हो।

हर महीने उन लाठियों को सरसों का तेल ज़रूर पिलाया

जाता था। गाँव में वैसे दो-चार घरों में लाइसेंसी बन्दूकें भी

थी। कुछ घरों में लाठियों के साथ बल्लम भी रखे होते। यूँ

तो घोड़े पर चलने की परम्परा खत्म-सी हो गई थी। किन्तु

बात-बात पर मूंछों पर हाथ जाने की आदत उनमें अभी भी 

बरकरार थी। कहा जाता है कि रस्सी जल जाए पर बल

नहीं जाते। यही बात इस गाँव के ठाकुरों की थी।

ठाकुर औतार सिंह के यहाँ नई जोड़ी चढ़ाने का काम चल

रहा था। बढ़ई जाति से हिन्दू था। वह लकड़ी के एक बड़े

तख्ते पर रन्दा मारता जाता और साथ-साथ बुदबुदाता भी

जाता। कोई आसपास न था। उसके भीतर किसी से बातें

करने की खुजली-सी हो रही थी। तभी औतार सिंह का

छोटा लड़का आया तो वह बोल उठा - "छोटे ठाकुर देखो

तो इन ससुरों ने क्या उधम मचाया हुआ है."

"क्या भला.?" छोटे ठाकुूर पूछते हैं।

"कहते हैं कि हम अब मैला न उठाएँंगे। भला शास्त्रों की

बात कोई टाल सकता है क्या? शास्त्रों में तो यही सब

लिखा है न।"

"लेकिन बुढऊ. आजकल शास्त्रों की बात मानता कौन

है.." कुढ़ते हुए छोटे ठाकुर कहते हैं।

"तभी तो यह हाय-तोबा मची है। कोई छोटे-बड़े का भेद

नहीं। पहले इन ससुरों की परछाई से भी दूर रहा जाता था।

अलग खाना, अलग पीना। अब तो छोटे ठाकुर, सुना है।

शहरों के होटलों में एक ही कप में सभी चाय पीवै हैं।

कितना बड़ा अन्याय, सारा धरम ही चौपट हो गया।"

बात आई-गई हो गई। किन्तु उधर धीरे-धीरे बढ़ती जा रही

थी। फूस में आग की तरह लपलपा्ती परिवर्तन की भावना

दिन-पर-दिन जोर पकड़ती जा रही थी। ठाकुर की बहू को

बच्चा हुआ। पर मेहतरों के टोले से इस बार कोई न आया।

सभी मेहतरों की पंचायत हुई थी, जिसमें अधिकांश ने

कसम उठाई कि मैला उठाने कोई न जाएगा, जो जाता है।

उसका हुक्का-पानी बन्द। यह कसम एक सप्ताह तक पूर्ण

रूप से चली। किन्तु एक ही सप्ताह में गाँव में गन्दगी के

जगह-जगह ढेर बनते चले गए। ठाकुरों की बस्ती में एक-

दो ने मन में विचार किया, एक बार चलकर देखा तो जाए।

लेकिन भला क्यों..? सदियों से चली आ रही बड़े कहलाने

की मानसिकता ढह न जाएगी। क्या आज तक छोटे लोगों

की देहरी पर कोई गया है.? उनका धर्म भ्रष्ट न हो

जाएगा. अगर वे छोटे तबके के लोगों के यहाँ आने-जाने

लगे तो उनकी मूँछें नीची न हो जाएँगी भला। जिनके बाप-

दादाओं की लाठी के कभी धुआं उठता था। हज़ार -हज़ार

लोगों की पंचायत में उनका हुक्म माना जाता था। अब यह

सब कैसे हो सकता है.?

ठाकुर औतार सिंह सोचते थे - एक-आध हुफ़्ते की तो बात

है, ससुरे सब मान जाऍँगे। लेकिन जब एक सप्ताह की

जगह दूसरा भी बीत गया और कोई न आया, तो चिन्ता

बढ़ने लगी। अगले दिन ठाकुर को भनक मिली। रोज-रोज़

इतवारी के घर पर ही पंचायत होती है। उसका लड़का 

शहर से आया है। उसी का काम हो सकता है। दो-तीन

कारिन्दे उधर से गुजरते थे। वहाँ से गुजरते हुए वे उचटती

हुई निगाह मेहतरों के टोले की तरफ डाल लिया करते थे।

अब वहाँ पहले से कहीं अधिक सफाई दिखाई पड़ती थी।

जगह-जगह कूड़े के ढेर न लगे होते थे। नालियों में भी

पहले जैसी बदबू न आती थी। पर ऊँची जात वालों के यहाँ

गन्दगी बढ़ती जा रही थी। जगह-जगह कूड़े के ढेर दिखाई

पड़ने लगे थे। कभी-कभी बस्ती के बेलगाम कुत्ते कुड़े के

ढेर में मुँह मारते और उसे अधिक बिखेर देते। उन्हीं कूडे के

ढेरों पर रोटी के टुकड़े खा-खाकर कुत्ते आपस में लड़ते

रहते। जहाँ कुत्तों की लड़ाई गन्दगी के लिए होती, वहीं गाँव

में आदमियों का वाक्युद्ध गन्दगी डालने पर होता। सुबह-

शाम खूब कहासूनी होती।

एक दिन ठाकुर ने अपना कारिन्दा भेजा। लेकिन उधर से

बड़ा ही मुंहफट जवाब आया। इतवारी अपने कच्चे ऑँगन

में बैठ हुक्का गुड़गड़ा रहा था। आसपास दो-चार सूअर

बेफिक्री से घूम रहे थे। कभी उनमें से कोई भागकर

इतवारी के पीछे छुप जाता तो दूसरा उसे ढूँढने का प्रयास

करता। जब-जब दो-चार सूअर और आकर इतवारी के

पास इकट्े हो जाते तो वह हे.ह करते हुए उन्हें भगाने का

प्रयास करता और पुनः हुक्के की नली मुँह में डाल देरों

धुआं उगलने लगता। तभी कारिन्दा आकर कहता है -

"इतवारी तुझे ठकुर ने बुलाया है।"

हुक्का गुड़गुड़ाते हुए ही इतवारी ने गर्दन घुमाकर देखा।

सामने ठाकुर का कोई कारिन्दा खड़ा था। कारिन्दे के द्वारा

किए गए सम्बोधन को सुनकर उसे बुरा-सा लगा। वैसे पूरे

पचास साल से वह यह तू-तड़ाक की भाषा सुन रहा था।

आज तक बुरा न लगा, लेकिन आज...? वह सदियों से

संस्कारबद्ध गाँव के माहौल से परिचित है। ब्राह्मण का

लड़का चाहे वह अभी ढंग से नाक साफ करना भी न सीख

पाया हो, लेकिन साठ साल के बूढ़े तक उसे 'पंडितजी

पालागन' कहकर आदर प्रकट करते हैं। इतवारी की उम्र

पचास से ऊपर ही होगी और सामने खड़े कारिन्दे की

अद्राइस के करीब। उम्र में आधे का फर्क, किन्तु जातिगत

असमानता भला शिष्टाचार कहाँ निभाने देती है। आज उसे

बहुत बुरा लगता है। तभी कारिन्दा पुनः कह उठता है

"इतवारी तुझे ठाकुर ने बुलाया है..."

कारिन्दे के पहली बार कहने को इतवारी ने अनसुना कर

दिया था। तब दोबारा कारिन्दे ने उसी लहजे में कहा तो वह

उबल-सा पड़ा -"कौन ठकुर..?"

"गाँव में कौन ठाकुर है तुझे पता नहीं ..?" कारिन्दा क्षण-

भर में ही भभक उठता है।

"नइ, हमे कुछ पता नाहीं। अब कोई किसी की ठकुराहट

नई चलती है, सब अपने-अपने घर में आज़ाद हैं।" 



क्या .? कारिन्दा अब पूर्ण रूप से गर्मा गया था। उसे

सपने में भी विश्वास न था कि इतवारी, जिसकी उम्र मैला

ढोते-ढोते तथा दूसरों की जूठन खाते-खाते बीत गई, वह

ऐसा भी कह सकता है। "मुझे ठाकुर औतार सिंह ने भेजा

है.." कारिन्दा ने मूंछों पर अंगुली फिराते हुए कहा।

"हँ, कह देना अब कोई नइ जावैगा। भौत दिन हो गए

गुलामगिरी करते-करते।"

कारिन्दा को अब लाचारी में अपने स्वर का थोड़ा मुलायम

बनाना पड़ता है, "इतवारी काम में कोई गुलामगिरी नहीं।

तुम्हारे बड़े-बूढे भी तो करते थे और तुम्हारी उम्र इतनी गुजर

गयी क्या तुमने यह काम नहीं किया...?"

"हाँ, हमारे बड़े-बूढ़े जब करते थे वो जमाना चला गया।

भई, अव नया जमाना है, नई रोसनी आ गई है।

कारिन्दा समझ न सका। नया जमाना, नई रोशनी वाली

बात। इतवारी के द्वारा कहे गए शब्द उसे अटपटे-से लगे।

मन किया कि एक ही लाठी में उसका काम-तमाम कर दे,

लेकिन वह ऐसा न कर सका। वह उल्टे पॉव लौट आया।

ठाकुर ने सुना तो खोपड़ी जल उठी उसकी। लगा दिमाग में

जितनी भी नसें हैं वे आपस में जुड़ गयी हैं और वे अब पफटी

कि तब। वह गुस्से से बड़बड़ा उठा - "ससुरे चमार-भंगियों

ने देखी कितना सर उठ रक्खा है ...? दस-बीस साल पहले

तो मुँह में ज़बान ही जैसे न थी और अब कहते हैं गाँव

कोई ठाकुर-वाकुर नहीं..."

"पास ही.." वही कारिन्दा, "सूना है, सहरों में तो होटलों में

लोग एक ही कप में चाय-दूध पीवै हैं। सुना है वहाँ के

मन्दिर में भी घुस जाते हैं ससुरे... अब तो इनका ही राज

है। सरकार ने भी तो सर चढ़ा रक्खा है ससुरों को।

शहर की बात दूसरी है पर हमारे गाँव में यह सब ना

चलेगा."ठाकुर औतार सिंह हुंकार उठे।

उनकी विषभरी हंकार जहरीले सर्प से कम न थी। ठाकुर ने

वह जमाना देखा था जब उनके दादा बहुत बड़े जमींदार थे,

कहते हैं सौ गाँव पंचायत में उनका हक्म माना जाता था।

अंग्रेज लाट साहब आते तो पहले उन्हें ही बुलाया जाता था।

दरवाजे पर सैकड़ों कारिन्दों की फौज चौबीसों घण्टे खड़ी

रहती थी।

"अब क्या होगा..?" कारिन्दा चुप्पी तोड़ता है।

"होगा क्या, मैं ही कुछ करूंगा। अपना रामवीर है ना

भला.

"हाँ-हॉ बड़े ठकुर हैं त.." पुलकित होते हुए कारिन्दा हाँ में

हॉँ मिलाता है।

"अरे कल ही देखना, इन ससुरों को छठी का दूध न पिला

दिया तो किसी ठाकुर का जना नहीं, भंगी का जना कह

देना, सारी हैकड़ी भुला दूंगा, ससुरों का दिमाग सब

ठीक हो जाएगा।

दो-चार दिन लगातार धर-पकड़ हुई। मेहतरों की बस्ती से

बीस-तीस को डकैती के केस में पुलिस ने बंद कर दिया।

दो-चार लोगों के पास से हथियार बरामद भी कर दिए।

एक दो जगह मुठभेड़ भी दर्ज हो गई, भला बिना मुठभेड़ के

डकैतों को पकड़ा कैसे जा सकता था? लेकिन पुलिस ने

यहाँ तनिक दरियादिली दिखाई कि मुठभेड़ में मरा कोई

नहीं। रामवीर जो सीनियर इन्सपेक्टर था, उससे विशेष

रूप में कहा गया था, खूब ठुकाई करना ससुरों की, अब

हुकाई कैसे न होती। रामवीर स्वयं ठाकुर था।

मेहतरों के टोले में जो कुछ मर्द बचे उन्हें भी अगले दिन जा

धरा। संपूर्ण टोले को ही ड़कैत करार दे दिया गया। घघरों में

अब औरतें ही रह गई थीं, और बच्चे। एक दिन ठाकुर का

कारिन्दा उधर गया और अपनी ठकुराई दिखाते हुए रौब से

बोला - "ससूरी काम पर आ जाओ, जो तुम्हारा काम है

वही करो। सारी लीडराई ख़त्म हो जाएगी, भूखी

मरोगी..

बस्ती में जिसने सुना वही उबल-सी पड़ी। वे तो पहले से

जली-फुकी बैठी थीं। सारी मेहतरानियाँ एक हो गई।

उन्होंने मुँह से बात न की, झाड़ से की। ऐसे समय पर झाड़

ही उनका हथियार होता है। किसी का बेटा जेल मेैं था तो

किसी का भाई। भला कहाँ बर्दाश्त होती बात। ठाकुर के

मुँह-लगे कारिन्दे को शोर मचाकर सात-आठ ने घेर लिया।

जिसके जी में जितनी आई उतनी ही झाड़ लगाई। कारिन्दे

की लम्बी-लम्बी मूँछें थीं जो हाथों से ही उखाड़ दी गई।

बस्ती में एक रामदीन था। जिसे लोग मीला कहकर

पुकारते थे। वह ना आदमियों में था ना औरतों में। यह सब

देखकर उसे खुब प्रसन्नता हुई। जब तक कारिन्दा पिटता

रहा, तब तक वह उछल-उछलकर खुब तालियां बजाता

रहा।

एक सप्ताह में ही गिरफ्तार हुए सभी मेहतर छूट गए। शहर

के किसी बड़े वकील ने जमानत की थी। बाहर से कुछ

दलित लीडर भी आ गए थे। अगले दिन सभी कुछ दैनिक

अखबारों की सुखियों में था - "ग्राम मकदूमपुर के हरिजनों

पर अत्याचार। ठाकुरों ने पुलिस से मिलीभगत करके

डकैती के केस में फैसवाया।

मिली-भगत तो थी ही। उध्र रामवीर को लाइन हाजिर कर

दिया गया था। वह सोचता आखिर किस मुसीबत में फंस

गया...? सोचा कुछ और था, हुआ इसके विपरीत। उसकी

योजना थी मेहतरों को सबक भी मिल जाएगा और हो

सकता है उसे तरक्की भी मिल जाए! कौन इतनी जाँच-

पड़ताल करता है.? इकैती का केस बनाया था। कोई

छोटी-मोटी चोरी का नहीं। ऊपर हमारी बात तो अफसरों

को माननी ही पड़ती, लेकिन यहाँ अपफ़सरों की कौन

सुने.? बात तो मिनिस्टर तक जा पहुंची थी। अब मिनिस्टर

के सामने तो आई. जी.. डी.आई. जी. की भी कोई बिसात

नहीं। सभी हक्म के गुलाम। अपने जीवन में उसकी यह

पहली हार थी। अब तक न जाने कितने लोगों को इझूठे

केसों में फसाया था।

पुलिस लाइन में उसे अतीत की बातें रह-रहकर याद

आतीं। याद ही नहीं आतीं बल्कि रह-रहकर उसके मन को

कचोटती रहतीं। वहाँ काम-वाम तो कुछ होता न था बस

दिन-रात चारपाइयां तोड़ना और बेकार इथर-उधर घूमना।

वर्दी वह अवश्य डाल लेता लेकिन वर्दी को देखकर रौब

खाने वाला कोई न होता। क्योंकि चारों तरफ वर्दीधारी ही

होते। बरबस ही हाथ की उंगलियां खुजाने लगतीं। डण्डा

आखिर किसके जमाए। मुंह का स्वाद कसैला-सा हो चला

था। किस कम्बख्त को गाली दे। यहां तो सभी गाली देने

वाले लोग थे, गालियां सुनने वाले गरीब-गुरवा कहाँ थे?

शहर से जांच के लिए नगर डी.एस.पी. भैजा गया था।

संसद में मामला उठ गया था। कमिश्नर के सामने

डी.आई.जी., एस.एस.पी. सभी की पेशी हुई थी। गांव में

लगातार दो-चार दिन पुलिस की गाड़ी दनदनाती रही ।

डी.एस.पी. के साथ एक एस.एच.ओ. भी था। उसी को इस

गांव में एक महीने के लिए नियुक्त किया गया था। इसी

गांव में रहकर उसे जांच रिपोर्ट दैनी थी। ठाकुर की दाल न

गली। वह रामवीर न था। एस.एच.ओ. ने खुब पेट भरकर

डांट पिलाई। उसने भरी सभा में ठाकुर का पानी उतार

दिया था। एक दिन उसने डण्डा घुमाते हुए कहा था

"ठाकुर पुराने दिन लद गए। अब तुम्हारी ठकुराहट न

चलेगी। जिनको तुम अब तक छोटा समझते रहे, वे अब

छोटे नहीं। आजाद भारत में सब बराबर हैं।"

बाद मैं पता चला, एस.एच.ओ. कोई दलित जाति से था।

उस दिन गांव में खुब् कोहराम मचा। एक अदना-सा

इन्सपेक्टर उन्हीं के घर आकर बेइज्जत कर जाए।

सूरज ढलने के साथ-साथ का झुटपुटा घिर आया था।

अंधेरे की लकीरों में बस्ती इबने लगी थी। आज मैहतरों के

टोले में कची शराब और सूअर के गोश्त की गंध दूर-दूर

तक फैली हुई थी। लोग पी-पीकर इधर-उधर गिर पड़ रहे

थे। फिर भी हाथ की बोतल छूटती न थी। मांस केि मसाले

लगे दुकड़े लपा-लप मुंह में डाले जा रहे थे। जिन्दा सूअर

मरे हुए सूअर के मांस को सूंघते हुए शू-शें कर भाग-दौड़

कर रहे थे। अंदर मेहतरानियां ढोलक बजा रही थीं। लगता

था, उन्होंने भी पी थी। आज जी भरकर मनपसंद गाने गाए

जा रहे थे। कभी बारात में भी गाने का मौका न मिला होगा।

नशे में ढोलक पर उल्टी-सीधी थाप पड़ रही थी। एक गाना

खत्म होता तो दूसरा तुरंत शुरू हो जाता। हर कली में

नयापन। कभी-कभी कुछ जवान औरतें अपने बीच बैठी

जवान लड़की को छेड़ बैठतीं और वे तब तक छेड़ती रहतीं

जब तक वह बेचारी तंग होकर वहां से उठकर भाग न

जाती। आज उनके बीच अजीब उल्लास था। उनके पांव

थिरक रहे थे।

मर्द एक-दूसरे को खूब गालियां बक रहे थे। जैसे अपनी

खुशी जाहिर करने के लिए उनके पास इसके अलावा कोई

और चारा न रहा हो। अज उनके मन की हुई थी। शहर से

एक-दो लीडर भी आए हुए थे जो खा-पीकर चले गए थे,

किन्तु उनका पीना अभी तक बंद न हुआ था। गांव की ही

कच्ची तोड़ी गयी शराब थी। दूसरा घड़ा भी खाली होने को

था। एक आदमी मिट्टी के कुल्हड़ से उनके बर्तन में शराब

उंडेल रहा था। बर्तन भी क्या - किसी के पास सिल्वर के

गिलास थे तो किसी के पास पीतल के। कोई कटोरी में ही

डालकर पीने में मस्त था।

चौपाल पर गैस रखी थी। एक-दो खाट उल्टी पडी थी। पास

ही मिट्टी के हुक्के। इधर-उध्र अपने बड़ों की नकल करते

हुए कुछ बच्चे। काफी रात गए तक ढोलक बजती रही।

ढोलक बजाती मेहतरानियां गाने के साथ-साथ उछल-

कूदकर एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़ रही थीं। 


फिर सन्नाटे को चीरती हुई कुछ आवाज़े सुनाई दीं। सब

लोग चौंककर उन आवाजों को सुनने लगे। रात के दूसरे

पहर में जहां लोग गीली आंखं लिए आकाश की ओर निहार

रहे थे, वहीं नई पौध की आंखों में परिवरत्तन के लिए अट्ट

विश्वास था। कल तक जो बच्चे जूठन पर लड़ते-इझगड़ते थे

उनके मन में कुछ कर गुजरने की चेतना जन्म ले चुकी थी।

रात ढलने के साथ-साथ नशीली होती जा रही थी। मेहतरों

के टोले में धीरे-थीरे शांति छाने लगी थी, पर उधर शांति न

थी। ठाकुर औतार सिंह और अधिक चोट बर्दाश्त न कर

सकता था। आज तक किसी ने उनकी इतनी बेइजती न

की थी। उनकी रगों में खून के साथ-साथ जैसे कांच के

टुकड़े भी तैर रहे थे। बार-बार जिनके टकराने से टीस पैदा

होती थी। ठाकूर की आंखें अंगारे के समान दहक रही थीं।

लगता था जैसे कहीं से आग के दरिया का सैलाब 

चला आया हो और उन आंखों में आकर सिमट गया हो।

सामने दीवार पर एक खूंटी के सहारे लोडेड़ बन्दूक टंगी

थी। उसका मन चाह रहा था एक-दो को इसी बन्दूक से

चुनचुनकर मारे, लेकिन चाहकर भी वह ऐसा न कर

सकता था। क्योंकि एक बार बाजी पलट चुकी थी। ठाकुर

सोच रहा था। ऐसा कुछ हो जाए जो सांप भी मर जाए और

लाठी भी न टूटे। उसकी सांसों से किसी भयानक षड्यन्त्र

की बू आ रही थी।

आधी रात का समय रहा होगा। मेहतरों के टोले में आग की

लपटें देखी गई, जो लपलपाती हुई ऊंची होने लगी थीं।

शराब में धुत्त किसी को होश न था। जब होश आया तो वे

सब कुछ गंवा चुके थे। किसी के चार सूअर थे, तो चारों ही

झुलस गए थे। बच्चों तक को आग ने माफ न किया था।

कितनी ही औरतों के गोरे शरीर जलकर बदरंग हो गए थे।

बस्ती में कोई घर ऐसा न था जिसमें कोई न मरा हो। बस्ती 

जैसे किसी आग की घाटी में बदल गयी थी। आग की

चिंगारी के साथ-साथ कोलाहल भी इधर- उधर बिखर गया

था। लेकिन उस कोलाहल का कोई अर्थ न था क्योंकि

कोलाहल करने वाला समाज अर्थहीन था। जमीन पर रेंग

रहे किसी बेजान-से कीड़ों की तरह। धीरे-धीरे कोलाहल

शान्त हो गया। और अब रह गया है केवल हड्डियों को चीर

देने वाला सन्नाटा।

फिर सन्नाटे को चीरती हुई कुछ आवाजें सुनाई दीं। सब

लोग चौंककर उन आवाज़ों को सुनने लगे। रात के दूसरे

पहर में जहां लोग गीली आंखें लिए आकाश की ओर निहार

रहे थे, वहीं नई पौध की आंखों में परिवर्तन के लिए अटूट

विश्वास था। कल तक जो बच्चे जूठन पर लड़ते-झगड़ते थे

उनके मन में कुछ कर गुजरने की चेतना जन्म ले चुकी थी।

इस दोहरे खोप से निजात पाने के लिए दिनदहाड़े शराब पीये दीप

सिंह दो टूक शब्दों में कहते हैं, "मरना है तो यहीं मरेंगे। ये अपना

घर है। छोड़कर कहां जाएं। उनके पास तलवार है तो अपने पास

भी दो हाथ हैं। वे चार मारेंगे तो हम दो मारेंगे।" रविदास मंदिर के

ठीक बगल वाले मकान में एक आदमी खटिया पर लेटे हुए मिला।

उसके हाथ में प्लास्टर बंधा था। वह भी 5 मई के हमले में घायल

हुआ था। आज 25 मई है। वह अस्पताल से छूट कर आया है।

उसका एक छोटा सा बेटा जो बमुश्किल पांच साल का होगा,

अपनी सूजी हुई गरदन से जूझ रहा था। उस पर ज़ख्म के गहरे

निशान थे। घर में औरतों का जमघट था। उसकी पत्नी टूटे हुए

पंखे और बाइक दिखाकर पूछती है, "भाई साहब, इन ठाकुरन के

पास तलवार कहां से आवे है?" अनभिज्ञता जताने पर वह कहती

है, "इनके महाराणा प्रताप तो घास खाते थे। ये भी जाकर घास

खावें। क्यों हमारी जिंदगी नरक किए हुए हैं?" औरतों की

शिकायत है कि बीस दिन से मीडियावाले लगातार गांव में आ रहे

हैं लेकिन किसी ने भी उनका पक्ष टीवी पर नहीं रखा। अब मीडिया

को देखकर उन्हें गुस्सा आता है। ये दलित नेट पर ज्यादा भरोसा

करते हैं। घायल व्यक्ति की बूढ़ी मां मुझसे पूछती है, "नेट पर


आओगो?" दूसरी बूढ़ी महिला मेरे जवाब से पहले उससे कहती है,

"आज सरकार ने नेट बंद कर दियो है। कहां से आओगो?"


Thursday, November 16, 2023

दलित मुक्ति की अवधारणा का विकास

 दलित मुक्ति की अवधारणा का विकास 

"दलित मुक्ति की अवधारणा का विकास आधुनिक मुत्यों सवैधानिक मान्यताओं सामाजिक न्याय एवं जनतांत्रिक

संरचनाओं के संघर्षों से हुआ है। इसमें धार्मिक सांस्कृतिक जीवन की विकृतियों के विरुद्ध मानव की प्रतिष्ठा का चिंतन

है। दलित मुक्ति जहाँ अपने पुरोधाओं की रचनाशीलता, बौद्धिकता व आंदोलनों से बहुत कुछ ग्रहण करती है वहीं

समानान्तर रूप से देश के सबसे बड़े कानून यानि भारतीय संविधान में दलितों, आदिवासियों महिलाओं के उत्पीड़न की

समाप्ति हेतु प्रदत्त प्रावधानों एवं उनके अनुपालन में उठने वाले स्वरों, जनांदोलनों से शक्ति लेती है। यह मुक्ति

आध्यात्मिक परम्पराओं मुल्यों के नाम पर समाज में फैले प्रपंच ढोंग धार्मिक भ्रष्टाचार अस्यृश्यता की खबर लेने के

साथ-साथ दलित बहुजन के अपमान, उत्पीड़न करने वाले हिंदू धर्मशास्त्रों स्मृतियों और उनके तथाकथित जनकों के

विशेषाधिकारों की व्यवस्था पर अनेक सवाल उठाती है। दलित लेखक व चिंतक जय प्रकाश कर्दम इस पर प्रकाश

डालते हुए कहते हैं कि "आग लगा दो उन जातिवादी जल्लादों को, क्यों कि जब तक स्मृतियाँ रहेंगी। वेद रामायण,

गीता पुराण, धार्मिक ग्रथ रहेंगे तब तक वर्ण-व्यवस्था रहेगी, समाज में विघटन और विद्वेष रहेगा।



"दलित मुक्ति की अवधारणा का विकास आधुनिक मूल्यों, संवैधानिक मान्यताओं, सामाजिक न्याय एवं जनतांत्रिक

संरचनाओं के संघर्षों से हुआ है। इसमें धार्मिक, सांस्कृतिक जीवन की विकृतियों के विरुद्ध मानव की प्रतिष्ठा का चिंतन

है। दलित मुक्ति जहाँ अपने पुरोधाओं की रचनाशीलता, बौद्धिकता व आंदोलनों से बहुत कुछ ग्रहण करती है, वहीं

समानान्तर रूप से देश के सबसे बड़े कानून यानि भारतीय संविधान में दलितों, आदिवासियों, महिलाओं के उत्पीड़न की

समाप्ति हेतु प्रदत्त प्रावधानों एवं उनके अनुपालन में उठने वाले स्वरों, जनांदोलनों से शक्ति लेती है। यह मुक्ति

आध्यात्मिक परम्पराओं मूल्यों के नाम पर समाज में फैले प्रपंच, ढोंग, धार्मिक भ्रष्टाचार, अस्पृश्यता की खबर लेने के

साथ-साथ दलित बहुजन के अपमान, उत्पीड़न करने वाले हिंदू धर्मशास्त्रों, स्मृतियों और उनके तथाकथित जनकों के

विशेषाधिकारों की व्यवस्था पर अनेक सवाल उठाती है।" दलित लेखक व चिंतक जय प्रकाश कर्दम इस पर प्रकाश

डालते हुए कहते हैं कि "आग लगा दो उन जातिवादी जल्लादों को, क्यों कि जब तक स्मृतियाँ रहेंगी। वेद, रामायण,

गीता, पुराण, धार्मिक ग्रंथ रहेंगे तब तक वर्ण-व्यवस्था रहेगी, समाज में विघटन और विद्वेष रहेगा। "समाज को

प्रगतिशील बनाना है, जाति के जहर को मिटाना है, तो इन तथाकथित धर्म ग्रंथों को आग लगानी होगी, और नकारना

होगा वर्णित उस ईश्वर को जो कर्मानुसार फल देता है और मोक्ष भी वर्णों के अनुसार, जगानी होगी शुद्ध प्रज्ञा, ध्वस्त

करने होंगे विषमताओं के संरक्षण तभी तुमको मुक्ति की प्राप्ति होगी। दलित लेखक बुद्ध शरण हंस ने अस्मिता

लहू-लूहान कहानी में मुक्ति की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि "जिस कौम और समाज का अपना

साहित्य है, उस समाज और कौम का अपना सम्मान है। भारत के ब्राह्मण वर्ग का वेद, रामायण, महाभारत, स्मृतियों का

अपना साहित्य है। इस कारण उनका अपना सम्मान है। जब तक दलित के पास अपना साहित्य नहीं था, उनका अपना

सम्मान कुछ ही नहीं था। वेद, गीता, रामायण का आश्रय लेकर इस देश के प्रभुवर्ग ब्राह्मण कल तक जितना सम्मानित

थे और आज तक है, वह सम्मान भारत देश के बहजनों को इसलिए प्राप्त नहीं हुआ, क्यों उनका अपना साहित्य नहीं

था। बहुजनों के हाथ में क्रान्ति सूर्य ज्योतिबाफूले, रामास्वामी नायकर, डॉo अम्बेडकर अछूतानंद का साहित्य प्राप्त हुआ।

बहुजनों का समाज वैसे चार्ज हो गया जैसे डैड सेल में बिजली का करेन्ट जाने से बैटरी चार्ज हो जाती है।. अब

जरूरत इस बात की है कि ज्योतिबाफूले और डॉ० अम्बेडकर के वैचारिक साहित्य को घर-घर पहुँचाने का मिशन

साहित्यकार व विद्वान लोग पूरा करें ताकि भारत के दलित भारतीय बन सकें, इन्सान कहलवा सकें, न कि शू्र, असुर,

अछूत, हरिजन, दलित आदि न कहलवा सके।" डा० अम्बेडकर दतलित मुक्ति के प्रश्न पर "हर सम्मेलन व भाषणों में

दलितों को अपनी मुक्त के लिए स्वयं सुधारने का आहवान किया और उन्हें समझाया कि घृणित व गंदे काम छोड़ें,

साफ सफाई से रहें तथा अपनी दीनता त्याग कर पुरुषार्थी बनें। मृत पशुओं का मांस खाना बन्द करें। मदिरा व अन्य

नशे की लतों से अपने आप को बचाएं। अन्याय होने पर उसका खुल कर प्रतिकार करें और संघर्ष करें। सबसे अधिक

ध्यान स्वयं को जागृत करने एवं बच्चों को शिक्षित बनाने पर दें।.साथ ही तुमे अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ बनाने

की ओर अधिक ध्यान देना चाहिए। तुम्हें अपने संघर्ष और शक्ति को सुदृढ़ बनाना चाहिए, ताकि जीवन में भौतिक

उन्नति भी हो। जिससे तुम्हें सवर्णों के अत्याचारों व शोषण से मुव्ति प्राप्त हो सके।" समकालीन हिंदी - मराठी दलित

लेखक 'दलित मुक्ति की अवधारणा पर विचार करते हुए कहते हैं कि "दलितों को अस्पृश्य मानकर उन्हें समाज और

धर्म से बहिष्कृत किया गया, यहाँ तक कि धा्मिक संस्कार जैसे उपनयन संस्कार दलितों के लिए नहीं थे। मंदिरों में

पूजा करना निषेध था। विधापार्जन पर रोक थी। धनोपार्जन प्रतिबंधित थे। बस्तियों से बाहर रहने के लिए बाध्य किया

जाता था। तमाम अनुष्ठानों से वंचित रखना व्यवस्था का हिस्सा था। तब दलित लेखकों व वैचारिक विद्वानों ने ऐसी

सभी अवधारणा को नकारा है, जो मानव के अस्तित्व को नकारती हैं और मानव को अतार्किक कल्पनाओं की सता का

गुलाम बनाती है, जो सहज विकास में बाधा बनती है। अपित् राष्ट्र की एकता एवं अखंडता के लिए भी खतरा है। अतः

मानव मूल्य, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक-धार्मिक एकता के ताकिक आशय से समकालीन हिंदी- मराठी दलित लेखकों

ने हिंदू धर्म एवं मनुवादी संस्कृति का विरोध करते हुए उन सभी मान्यताओं के खिलाफ है, जो दलितों की प्रगति में

किसी न किसी रूप में बाधक है जो सामाजिक, धार्मिक व आर्थिक जीवन को विषाक्तपूर्ण बनाती है, तथा शोषण व

असमानता की पोषक है। वहीं डॉ० सुभाष चन्द्र 'दलित मुक्ति आंदोलन सीमाएं और संभावनाएं में लिखते हैं कि दलित

मुव्ति को "समग्र दृष्टि की आवश्यकता है, जो सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक सवालों को संबोधित करे। आर्थिक

सवालों को दरकिनार करके मात्र सामाजिक सम्मान प्राप्त करने का संघर्ष समाज में ठोस बदलाव नहीं ला सकता और

सामाजिक सवालों को छोड़कर केवल आर्थिक हितों के लिए संघर्ष की भी यही परिणति है। असल में दलितों को

सामाजिक तौर पर उनको निम्न घोषित करके उनका आर्थिक शोषण आसान हो जाता है। इस परिस्थति को बदलने

वाली दृष्टि अपनाकर व इस दिशा में संघर्ष से ही दलित मुक्ति की दिशा सही हो सकती है। डॉ० अम्बेडकर के विचारों

व सिद्धांतों के सूत्र समानता, स्वतंत्रता और भाईचारे को अपने चिंतन व संघर्ष का केन्द्रीय सूत्र बनाने की आवश्यकता

है। समानता, स्वतंत्रता और भाईचारे को तोड़ने या पोषित करने वाले रिवाजों, प्रथाओं, मूल्यों, विश्वासों, प्रणालियों,

विचारों को समाप्त करने के लिए संघर्ष करना तथा इनको मजबूत व स्थापित करने वाले चिंतन को आधार प्रदान करना

दलित मुक्त के चिंतन को दिशा दे सकते हैं। समकालीन मराठी दलित लेखक शरण कुमार लिम्बाले जवाब नहीं है

मेरे पास कहानी में दलित मुक्ति के प्रश्न पर कहते हैं कि इसका जन्म मूलतः वर्ण-व्यवस्था के विरोध के फलस्वरूप

हुआ है। यह मुक्ति प्रतिरोध और प्रतिकार की चेतना का दूसरा रूप है। प्रतिरोध से अभिप्राय है उस यथास्थिति को

आदर्श मानने से इन्कार करना, जो सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्तर पर मनुष्य-

मनुष्य में भेद पैदा करके उनमें

अलगाव की स्थिति पैदा करे। प्रतिकार का अभिप्राय है -रूढ़ियों से सामाजिक अपमान और उत्पीड़न को अपनी नियति

मानने से इन्कार करते हुए अपने सामूहिक स्वयं के पक्ष में लड़ने की क्षमता अर्जित करना। "यह विषमता कैरसे नष्ट हो

सकेगी?

अन्याय- अत्याचार कब खत्म हो जाएँगे? जाति भेद को मिटा ही देना चाहिए। इसके बिना हम राष्ट्र कहलाने

लायक नहीं रहेंगे ।..उठते- बैठते, खाते-पीते मैं सोचता रहता- क्या सचमुच सर्वहारा को समता स्वाधीनता, बंधुता और

न्याय प्राप्त होगा? वह दिन कब आएगा? जब भारत के 85 प्रतिशत आबादी को मानवतावादी दृष्टिकोण से देखा

जाएगा। समकालीन हिंदी-मराठी दलित लेखकों की कहानी के केन्द्र में वह मनुष्य है, जो सदियों से पशुवत् जीवन

जीता रहा, गाँव के दक्षिण में हाशिए पर बस रहा, जिसकी परछाई, हवा, गंध, स्पर्श बाकी गाँववासियों के लिए अछूत,

अशुभ मानी जाती रही। वर्तमान दलित मुक्ति उसे मनुष्यता का, उसकी गुलामी का अहसास करवाती है। तथा साथ ही

अपने को कुलीन व उच्च समझने वाले वर्गों की क्रुर मानसिकता का उद्घाटन करती है। वस्तुतः दलितों को सबसे

अधिक 'जाति के दारुण दंश को झेलना पड़ा है। इस जाति के कारण ही उन्हें अस्पृश्य, अछूत, पंचम, शुद्र कहकर

बार-बार उनके मनुष्य होने को भी नकारा जाता रहा है। यहाँ तक कि कु्तों को सवर्णों के घर, मन्दिर में पानी पीने की

इजाजत है, पर जाति के कारण दलितों को नहीं उनकी सभ्यता व संस्कृति में सलाम, जूठन, अस्पृश्यता जैसी मृत

परम्पराओं को जबरदस्ती थोपा गया, ताकि वे हमेशा दीन-हीन, दरिद्र और मानसिक रूप से गुलाम बने रहें। लेकिन

अब डॉ० अम्बेडकर के वैचारिक आंदो

लन व शिक्षा के प्रभाव के कारण वह इन सम्पूर्ण व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह कर ,

Part 2,

उठा है। देखो! देखो! हम कोई भिखमंगे नहीं है। हमने भी चन्दा दिया है। हमें पंगत में बिठाया जाएगा। यह आपका

वचन था। अब क्यों उलटे दिमागों वाले जैसा बर्ताव कर रहे हो? हमारे हाथ पैर देखो। क्या हमारे हाथ पैर कृष्ट रोग

से सड़ गए हैं। कुत्ते-बिल्लियों को तो पास बुलाकर पुचकारते हो, हमें दुत्कारते हो। अरे! हम भी तो उसी हाड-मांस के

जीव है जीते-जागते।"" इसी प्रकार का वर्णन हमें दलित लेखक सत्यप्रकाश की चंद्रमौलिका रक्तबीज कहानी में

दिखाई देता है जो "हे महानुभाव! ऐसे धूर्त और दंभियों का बहिष्कार करो जो वर्ग संघर्ष के नियामक हैं, और इंसान से

इंसान को जुदा करते हैं, जब तक आप स्वयं आवाज नहीं उठाओगे, संघर्ष नहीं करोगे, शोषक आपका शोषण करते

रहेंगे। कितने राजा, भगवान, देवी, देवता आए और चले गए। किसी ने आपकी दशा पर विचार किया? कब तक उस

ईश्वर के नामपर घुट-घुटकर जीते रहोगे जो सदैव सामर्थ्थवानों का साथ देता है।" विमल थोराट 'दलित मुक्ति

आंदोलन की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति । मराठी दलित कविता में 'दलित मुक्ति की अवधारणा' के प्रश्न पर कहती है कि

दलित मुक्ति उस हिंदू धर्म पर आधारित परम्पराओं, रुढ्ियों और विचारों से है और उस समाज के विरुद्ध जिसने उन्हें

पददलित, शूद्र और अस्पृश्यता नाम देकर अन्याय, अत्याचारों के द्वारा अपने मन में छिपी बर्बरता का पूरा-पूरा परिचय

दिया।.दलित मुक्ति का केन्द्र स्थान 'मनुष्य है। धर्म की साजिश के द्वारा छीनी हुई प्रतिष्ठा और सम्मान को प्राप्त

करने के लिए प्रतिबद्ध है। दलित लेखक सूरजपाल चौहान 'हिंदी के दलित कथाकारों की पहली कहानी की भूमिका

पुस्तक में लिखते हैं कि हिंदू धर्म और उसका वाड़मय ही दलित दुर्दशा के लिए उत्तरदायी है और जब तक दलित

उनमें आस्था रखते हैं, जीवित रहते उनकी मुक्ति नहीं।. हैरानी की बात तो यह है कि हिंदी गैर- दलित लेखकों ने

अपने-अपने लेखन में वर्ण-व्यवस्था के विरुद्ध ऊँगली तक उठाने का साहस नहीं किया, उल्टा लेखन द्वारा

वर्ण-व्यवस्था को मजबूत ही किया है। कुछ अपवादों को छोड़कर हिंदी के गैर दलित लेखकों ने हमेशा से अपनी

लेखनी द्वारा दलित समाज की छवि और दलित पात्रों का चरित्र बिगाडने के लिए ही चलाई। परन्तु बीसवीं शताब्दी में

बाबा साहेब डॉ० भीमराव अम्बेडकर जो दलित यातनाओं के भुक्त भोगी थे। ने गौतम बुद्ध व ज्योतिबा फूले के सिद्धान्तों

को आधार मानकर पूरी गम्भीरता से दलित दुःखों के कारणों का पता लगाकर राष्ट्रीय ही नहीं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर

दलित समस्या को उजागर कर दिखाया।"" जिसके कारण आज दलित अपनी मुकिति के लिए हमेशा तैयार रहता है।

इसका वर्णन हमें 'बन्धु माधव की 'जहरीली रोटी कहानी में दिखाई देता है। "क्या आप हमें अपने पैर की च्पल

समझते हो? क्या हम चप्पलों की तरह हैं? क्या हम आप लोगों की तरह हाडमांस के नहीं बने हैं और हमारे खुन का

रंग आप सबसे अलग हैं? हम भी आपकी तरह ही मॉँ की कोख में नौ महीने पलकर पैदा हुए हैं। क्या यह सब नहीं

है?" मैंने फिर चीखकर कहा, "हममें और तुममें कोई फ़र्क नहीं है।" लेखक कहता है यही 'दलित मुक्ति की सच्ची

अवधारणा है जो आदमी-आदमी में धर्म, परम्परा, रीति-रिवाज के आधार पर किसी प्रकार के अन्तर को स्वीकार नहीं

करती है।"' वहीं गुरु प्रसाद मदन 'झूठी आजादी लेख में मुक्ति की अवधारणा के विषय में लिखते हैं कि "आजादी के

पूर्व भारतीय दलितों ने सपना देखा था कि उन्हें भी आजादी मिलेगी। वे लोग भी दासता की जंजीों से छुटकारा पा

जाएंगे। किन्तु लगभग चार दशकों की स्वतंत्रता के बाद भी भारत के ऐतिहासिक पृष्ठों को पलट कर देखने पर यही

मिलता है कि दलितों के साथ किये गये वायदे केवल उन्हें भुलावे में ही रखने के लिए किये गए थे। उनकी अस्मिता के

साथ खिलवाड़ होता रहा। सवर्णों शोषकों द्वारा उनके संवैधानिक अधिकारों के साथ बलात्कार होता रहा।...किन्तु आज

का दलित शोषित समाज उनकी करतूतों को समझ रहा है। बहुत ही तेजी के साथ अपने कंधे पर रखे गुलामी के जुए

को फॅक देने के लिए प्रयासरत ही नहीं हैं अपित् तड़प रहा है। दलितों को भी यह समझना चाहिए कि उनकी अशिक्षा ,

अविधा, गरीबी के बंधन को दूसरा कोई तोड़ने वाला नहीं है। दलित समाज को स्वतः अपने पुरुषार्थ का भरोसा करके

उठना होगा। संगठित होकर गुलाम बनाये रखने वाली समस्त शक्तियों को चकनाचूर करना पड़ेगा। तभी तो वह सच्ची

आजादी प्राप्त कर सकता है।...

पराये पुरुषार्थ की आशा को छोड़कर अपनी कमर कस कर, आने वाली मार्ग की बाधाओं की परवाह किये बिना

आगे दलितों का कारवां बढ़ चला है। चतुर्दिक शोर हो रहा है कि दलितों के उत्थान में सम्पूर्ण सरकारी तंत्र से लेकर

नेता तंत्र तक इनकी ही भलाई व उत्थान के लिए उद्धत और प्रयत्नशील हैं। सरकार, सरकारी तंत्र, विभिन्न राजनैतिक

पार्टियां व उनमें शीर्षस्थ, मूर्धन्य नेतृत्च वर्ग की एक ही चिन्ता है। कि दलितों का उत्थान कैसे हो? तात्पर्य है कि सभी

दलित उत्थान के लिए बेचारे पतले होते जा रहे हैं। यह चिंता इस सीमा तक सता रही है कि उन्हें उस समय दलित

ही दलित दिखाई पड़ते हैं? चाहे आर्थिक मसला हो चाहे सामाजिक मसला जहाँ कहीं भी दलितों ने थोड़ी करवट

बदली, सम्पूर्ण राष्ट्र को इनकी चिन्ता सताने लगती है। ऐसा भ्रम अखबार वाले भी फैलाने से नहीं चुकते हैं। आखिर ये

हैं कौन? लिखने वाले कौन? चिल्लपों मचाने वाले कौन हैं? तथा व्यापक प्रचार करने वाले कौन हैं? अखबारों के मालिक

कौन हैं? ये वे ही सभी लोग हैं जो शोषकों की जमात से सम्बद्ध ही नहीं उसी शोषक खून से पले हैं। उनकी अभिरुचि

क्यों कर दलित आजादी की ओर हो सकती है? उत्तर है स्वार्थ सिद्धि। जब कभी कोई दलित या दलित समाज का एक

बड़ा हिस्सा आडम्बरी वर्ण व्यवस्था से मुक्ति पाने हेतु तथाकथित ईश्वर व वर्णव्यवस्था की गुलामी का ज़ुवां तोड़ कर

स्वतंत्र खड़ा हो जाना चाहता है तो जबरन धर्मातरण व साम्प्रदायिकता का ढोंग कहकर दबाने का प्रयत्न ही नहीं किया


देवी तुलिया चमारिन और बंसी सिंह ठाकुर की कहानी

 देवी तुलिया चमारिन और बंसी सिंह ठाकुर की कहानी 

साथियों आज की कहानी अद्भुत अद्तीय प्रेणात्मक भाव से ओतप्रोत प्रेम से सजी ठाकुर परिवार की मदद करने वाली चमार जाति की तुलिया चमारिन की कहानी जो देवी के नाम से चर्चित तुलिया देवी की कहानी है इस कहानी में अपने पति के प्रेम में 100 वर्षो से भी अधिक का समय उसके इंतजार में बीता देती है सच में साथियों आपने ढेरो कहानी सुनी पढ़ी होंगी लेकिन यह  कहानी आपको एक बार  सोचने पर मजबूर जरूर कर देगी तो साथियों आइए कहानी शुरू करते है उससे पहले साथियों से एक छोटी सी अपील है कि दोस्तो चैनल को भी subscribe कर लिया करो आप




बूढ़ों में जो एक तरह की बच्चों की-सी बेशर्मी आ जाती है वह इस वक्त भी तुलिया में न आई थी, यद्यपि उसके सिर के बाल चांदी हो गये थे। और गाल लटक कर दाढ़ों के नीचे आ गये थे। वह खुद भी निश्चित रूप से अपनी उम्र न बता सकती थी, लेकिन लोगों का अनुमान था कि वह सौ की सीमा को पार कर चुकी है। और अभी तक चलती तो अंचल से सिर दांककर, आंखें नीची किये हुए, मानो नवेली बहू है। थी तो चमारिन, पर क्या मजाल कि किसी घर का पकवान देखकर उसका जी ललचाया। गांव में ऊंची जातों के बहुत-से घर थे। तुलिया का सभी जगह आना-जाना था। सारा गांव उसकी इज्जत करता था और गृहिणियां तो उसे श्रद्धा की आंखों से देखती थीं। उसे आग्रह के साथ अपने घर बुलातीं, उसके सिर में तेल डालतीं, मांग में सेंदूर भरती, कोई अच्छी चीज पकाई होती, जैसे हलवा या खीर या पकौड़ियां, तो उसे खिलाना चाहतीं, लेकिन बुढ़िया को जीभ से सम्मान कहीं प्यारा था। कभी न खाती। उसके आगे-पीछे कोई न था। उसके टोले के लोग कुछ तो गांव छोड़कर भाग गये थे, कुछ प्लेग और मलेरिया की भेंट हो गये थे और अब थोड़े-से खंडहर मानो उनकी याद में नंगे सिर खड़े छाती-सी पीट रहे थे। केवल तुलिया की मंड़ैया ही जिन्दा बच रही थी, और यद्यपि तुलिया जीवन-यात्रा की उस सीमा के निकट पहुंच चुकी थी, जहा आदमी धर्म और समाज के सारे बन्धनों से मुक्त हो जाता हैं और अब श्रेष्ठ प्राणियों को भी उससे उसकी जात के कारण कोई भेद न था, सभी उसे अपने घर में आश्रय देने को तैयार थे, पर मान-प्रिय बुढ़िया क्यों किसी का एहसान ले, क्यों अपने मालिक की इज्जत में बट्टा लगाये, जिसकी उसने सौ बरस पहले केवल एक बार सूरत देखी थी। हां, केवल एक बार!

तुजिया की जब सगाई हुई तो वह केवल पांच साल की थी और उसका पति अठारह साल का बलिष्ठ युवक था। विवाह करके वह कमाने पूरब चला गया। सोचा, अभी इस लड़की के जवान होने में दस-बारह साल की देर है। इतने दिनों में क्यों न कुछ धन कमा लूं और फिर निश्चिन्त होकर खेती-बारी करूं। लेकिन तुलिया जवान भी हुई, बूढ़ी भी हो गई, वह लौटकर घर न आया। पचास साल तक उसके खत हर तीसरे महीने आते रहे। खत के साथ जवाब के लिए एक पता लिखा हुआ लिफाफा भी होता था और तीस रुपये का मनीआर्डर। खत में वह बराबर अपनी विवशता, पराधीनता और दुर्भाग्य का रोना रोता था—क्या करूं तूला, मन में तो बड़ी अभिलाषा है कि अपनी मंड़ैया को आबाद कर देता और तुम्हारे साथ सुख से रहता, पर सब कूछ नसीब के हाथ है, अपना कोई बस नहीं। जब भगवान लावेंगे तब आऊंगा। तुम धीरज रखना, मेरे जीते जी तुम्हें कोई कष्ट न होगा। तुम्हारी बांह पकड़ी है तो मरते दम तक निबाह करूंगा। जब आंखें बन्द हो जाएंगी तब क्या होगा, कौन जाने? प्राय: सभी पत्रों में थोड़े-से-फेर-फार के साथ यही शब्द और यही भाव होते थे। हां, जवानी के पत्रों में विरह की जो ज्वाला होती थी, उसकी जगह अब निराशा की राख ही रह गई थी। लेकिन तुलिया के लिए सभी पत्र एक-से प्यारे थे, मानो उसके हृदय के अंग हों। उसने एक खत भी कभी न फाड़ा था—ऐसे शगुन के पत्र कहीं फाड़े जाते हैं—उनका एक छोटा-सा पोथा जमा हो गया था। उनके कागज का रंग उड़ गया था, स्याही भी उड़ गई थी, लेकिन तुलिया के लिए वे अभी उतने ही सजीव, उतने ही सतृष्ण, उतने ही व्याकुल थे। सब के सब उसकी पेटारी में लाल डोरे से बंधे हुए, उसके दीर्घ जीवन से संचित सोहाग की भांति, रखे हुए थे। इन पत्रों को पाकर तुलिया गद गद हो जाती। उसके पांव जमीन पर न पड़ते, उन्हें बार-बार पढ़वाती और बार-बार रोती। उस दिन वह अवश्य केशों में तेल डालती, सिन्दूर से मांग भरवाती, रंगीन साड़ी पहनती, अपनी पुरखिनों के चरन छूती और आशीर्वाद लेती। उसका सोहाग जाग उठता था। गांव की बिरहिनियों के लिए पत्र पत्र नहीं, जो पढ़कर फेंक दिया जाता है, अपने प्यारे परदेसी के प्राण हैं, देह से मूल्यवान। उनमें देह की कठोरता नहीं, कलुषता नहीं, आत्मा की आकुलता और अनुराग है। तुलिया पति के पत्रों को ही शायद पति समझती थी। पति का कोई दूसरा रूप उसने कहां देखा था?

रमणियां हंसी से पूछती—क्यों बुआ, तुम्हें फूफा की कुछ याद आती है—तुमने उनको देखा तो होगा? और तुलिया के झुरिंयों से भरे हुए मुखमण्डल पर यौवन चमक उठता, आंखों में लाली आ जाती। फूलककर कहती—याद क्यों नहीं आती बेटा, उनकी सूरत तो आज भी मेरी आंखें के समाने हैं बड़ी-बड़ी आंखें, लाल-लाल ऊंचा माथा, चौड़ी छाती, गठी हुई देह, ऐसा तो अब यहां कोई पट्ठा ही नहीं है। मोतियों के-से दांत थे बेटा। लाल-लाल कुरता पहने हुए थे। जब ब्याह हो गया तो मैंने उनसे कहा, मेरे लिए बहुत-से गहने बनवाओगे न, नहीं मैं तुम्हारे घर नहीं रहूंगी। लड़कपन था बेटा, सरम-लिहाज कुछ थोड़ा ही था। मेरी बात सुनकर वह बड़े जोर से ठट्ठा मारकर हंसे और मुझे अपने कंधे पर बैठाकर बोले—मैं तुझे गहनों से लाद दूंगा, तुलिया, कितने गहने पहनेगी। मैं परदेस कमाने जाता हूं, वहां से रुपये भेजूंगा, तू बहुत-से गहने बनवाना। जब वहां से आऊंगा तो अपने साथ भी सन्दूक-भर गहने लाऊंगा। मेरा डोला हुआ था बेटा, मां-बाप की ऐसी हैसियत कहां थी कि उन्हें बारात के साथ अपने घर बुलातें उन्हीं के घर मेरी उनसे सगाई हुई और एक ही दिन में मुझे वह कुछ ऐसे भाये कि जब वह चलने लगे तो मैं उनके गले लिपट कर रोती थी और कहती थी कि मुझे भी अपने साथ ले चलो, मैं तुम्हारा खाना पकाऊंगी, तुम्हारी खाट बिछाऊंगी, तुम्हारी धेती छांटूगी। वहां उन्हीं के उमर के दो-तीन लड़के और बैठे हुए थे। उन्हीं के सामने वह मुस्करा कर मेरे कान में बोले—कुछ ऐसा की सबके सामने नही बस, मैं उनका गला छोड़कर अलग खड़ी हो गई और उनके ऊपर एक कंकड़ फेककर बोली—मुझे गाली दोगे तो कहे देती हूं, हां!

और यह जीवन-कथा नित्य के सुमिरन और जाप से जीवन-मन्त्र बन गयी थी। उस समय कोई उसका चेहरा देखता! खिल पड़ता था। घूंघट निकालकर भाव बताकर, मुंह फेरकर हंसती हुई, मानो उसके जीवन में दुख जैसी कोई चीज है ही नहीं। वह अपने जीवन की इस पुण्य स्मृति का वर्णन करती, अपने अन्तस्तल के इस प्रकाश को दर्शाती जो सौ बरसों से उसके जीवन-पथ को कांटों और गढ़ों से बचाता आता था। कैसी अनन्त अभिलाषा था, जिसे जीवन-सत्यों ने जरा भी धूमिल न कर पाया था।

वह दिन भी थे, जब तुलिया जवान थी, सुंदर थी और पतंगों को उसके रूप-दीपक पर मंछराने का नशा सवार था। उनके अनुराग और उन्माद तथा समर्पण की कथाएं जब वह कांपते हुए स्वरों और सजल नेत्रों से कहती तो शायद उन शहींदों की आत्माएं स्वर्ग में आनन्द से नाच उठती होंगी, क्योंकि जीते जी उन्हें जो कुछ न मिला वही अब तुलिया उन पर दोनों हाथों से निछावर कर रही थी। उसकी उठती हुई जवानी थी। जिधर से निकल जाती युवक समाज कलेजे पर हाथ रखकर रह जाता। तब बंसी सिंह नाम का एक ठाकुर था, बड़ा छैला, बड़ा रसिया, गांव का सबसे मनचला जवान, जिसकी तान रात के सन्नाटे में कोस-भर से सुनायी पड़ती थी। दिन में सैकड़ों बार तुलिया के घर के चक्कर लगाता। तालाब के किनारे, खेत में, खलिहान में, कुंए पर, जहां वह जाती, परछाईं की तरह उसके पीछे लगा रहता। कभी दूध लेकर उसके घर आता, कभी घी लेकर। कहता, तुलिया, मैं तुझसे कुछ नहीं चाहता, बस जो कुछ मैं तुझे भेंट किया करूं, वह ले लिया कर। तू मुझसे नहीं बोलना चाहती मत बोल, मेरा मुंह नहीं देखना चाहती, मत देख लेकिन मेरे चढ़ावों को ठुकरा मत। बस, मैं इसी से सन्तुष्ठ हो जाऊंगा। तुलिया ऐसी भोली न थी, जानती थी यह उंगली पकड़ने की बातें हैं, लेकिन न जाने कैसे वह एक दिन उसके धोखे में आ गयी—नहीं, धोखे में नहीं आयी—उसकी जवानी पर उसे दया आ गयी। एक दिन वह पके हुए कलमी आमों की एक टोकरी लाया! तुलिया ने कभी कलमी आम न खाये थे। टोकरी उससे ले ली। फिर तो आये दिन आम की डलियां आने लगीं। एक दिन जब तुलिया टोकरी लेकर घर में जाने लगी तो बंसी ने धीरे से उसका हाथ पकड़कर अपने सीने पर रख लिया और चट उसके पैरों पर गिर पड़ा। फिर बोला—तुलिया, अगर अब भी तुझे मुझ पर दया नहीं आती तो आज मुझे मार डाल। तेरे हाथों से मर जाऊं, बस यही साध है।

तुलिया ने टोकरी पटक दी, अपने पांव छुड़ाकर एक पग पीछे हट गयी ओर रोषभरी आंखों से ताकती हुई बोली—अच्छा ठाकुर, अब यहां से चले जाव, नहीं तो तुम या मैं न रहूंगी तुम्हारे आमों में आग लगे, और तुमको क्या कहूं! मेरा आदमी काले कोसों मेरे नाम पर बैठा हुआ है इसीलिए कि मैं यहां उसके साथ कपट करूं! वह मर्द है, चार पेसे कमाता है, क्या वह दूसरी न रख सकता था? क्या औरतों की संसार में कमी है? लेकिन वह मेरे नाम पर चाहे न हो। पढ़ोगे उसकी चिट्ठियां जो मेरे नाम भेजता है? आप चाहे जिस हाल में हो, मैं कौन यहां बेठी देखती हूं, लेकिन मेरे पास बराबर रुपये भेजता है। इसीलिए कि मैं यहां दूसरों से विहार करूं? जब तक मुझको अपनी और अपने को मेरा समझता रहेगा, तुलिया उसी की रहेगी, मन से भी, करम से भी। जब उससे मेरा ब्याह हुआ तब मैं पांच साल की अल्हड़ छोकरी थी। उसने मेरे साथ कौन-सा सुख उठाया? बांह पकड़ने की लाज ही तो निभा रहा है! जब वह मर्द होकर प्रीत निभाता है तो मैं औरत होकर उसके साथ दगा करूं!

यह कहकर वह भीतर गयी और पत्रों की पिटारी लाकर ठाकुर के सामने पटक दी। मगर ठाकुर की आंखों का तार बंधा हुआ था, ओठ बिचके जा रहे थे। ऐसा जान पड़ता था कि भूमि में धंसा जा रहा है।

एक क्षण के बाद उसने हाथ जोड़कर कहा—मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया तुलिया। मैंने तुझे पहचाना न था। अब इसकी यही सजा है कि इसी क्षण मुझे मार डाल। ऐसे पापी का उद्वार का यही एक मार्ग है।

तुलिया को उस पर दया नहीं आयी। वह समझती थी कि यह अभी तक शरारत किये जाता है। झल्लाकर बोली—मरने को जी चाहता है तो मर जाव। क्या संसार में कुए- तालाब नहीं, या तुम्हारे पास तलवार-कटार नहीं है। मैं किसी को क्यों मारूं?

ठाकुर ने हताश आंखों से देखा।

“तो यही तेरा हुक्म है?”

मेरा हुक्म क्यों होने लगा? मरने वाले किसी से हुक्म नहीं मांगते।’

ठाकुर चला गया और दूसरे दिन उसकी लाश नदी में तैरती हुई मिली। लोगों ने समझा तड़के नहाने आया होगा, पांव फिसल गया होगा। महीनों तक गांव में इसकी चर्चा रही, पर तुलिया ने जबान तक न खोली, उधर का आना-जाना बन्द कर दिया।

बंसी सिंह के मरते ही छोटे भाई ने जायदाद पर कब्जा कर लिया और उसकी स्त्री और बालक को सताने लगा। देवरानी ताने देती, देवर ऐब लगाता। आखिरं अनाथ विधवा एक दिन जिन्दगी से तंग आकर घर से निकल पड़ी। गांव में सोता पड़ गया था। तुलिया भोजन करके हाथ में लालटेन लिये गाय को रोटी खिलाने निकली थी। प्रकाश में उसने ठकुराइन को दबे पांव जाते देखा। सिसकती और अंचल से आंसु पोंछती जाती थी। तीन साल का बालक गोद में था।

तुलिया ने पूछा—इतनी रात गये कहां जाती हो ठकुराइन? सुनो, बात क्या है, तुम तो रो रही हो।

ठकुराइन घर से जा तो रही थी, पर उसे खुद न मालूम था कहां। तुलिया की ओर एक बार भीत नेत्रों से देखकर बिना कुछ जवाब दिये आगे बढ़ी। जवाब कैसे देती? गले में तो आंसू भरे हुए थे और इस समय न जाने क्यों और उमड़ आये थे।

तुलिया सामने आकर बोली—जब तक तुम बता न दोगी, मैं एक पग भी आगे न जाने दूंगी।

ठकुराइन खड़ी हो गयी और आंसू-भरी आंखों से क्रोध में भरकर बोली—तू क्या करेगी पूछकर? तुझसे मतलब?

‘मुझसे कोई मतलब ही नहीं? क्या मैं तुम्हारे गांव में नहीं रहती? गांव वाले एक-दूसरे के दुख-दर्द में साथ न देंगे तो कौन देगा?’

‘इस जमाने में कौन किसका साथ देता है तुलिया? जब अपने घरवालों ने ही साथ नहीं दिया और तेरे भैया के मरते ही मेरे खून के प्यासे हो गये, तो फिर मैं और किससे आशा रखूं? तुझसे मेरे घर का हाल कुछ छिपा है? वहां मेरे लिए अब जगह नहीं है। जिस देवर-देवरानी के लिए मैं प्राण देती थी, वही अब मेरे दुश्मन हैं। चाहते हैं कि यह एक रोटी खाय और अनाथों की तरह पड़ी रहे। मैं रखेली नहीं हूं उढ़री हूं, ब्याहता हूं, दस गांव के बीच में ब्याह के आयी हूं। अपनी रत्ती-भी जायदाद न छोडूंगी और अपना आधा लेकर रहूंगी।’

‘तेरे भैया’, ये दो शब्द तुलिया को इतने प्यारे लगे कि उसने ठकुराइन को गले लगा लिया ओर उसका हाथ पकड़कर बोली—तो बहिन, मेरे घर में चलकर रहो। और कोई साथ दे या न दे, तुलिया मरते दम तक तुम्हारा साथ देगी। मेरा घर तुम्हारे लायक नहीं है, लेकिन घर में और कुछ नहीं शान्ति तो है और मैं कितनी  ही नीच हूं, तुम्हारी बहिन तो हूं।

ठकुराइन ने तुलिया के चेहरे पर अपनी विस्मय-भरी आंखें जमा दीं।

‘ऐसा न हो मेरे पीछे मेरा देवर तुम्हारा भी दुश्मन हो जाय।’

‘मैं दुश्मनों से नहीं डरती, नहीं इस टोले में अकेली रहती हूं

‘लेकिन मैं तो नहीं चाहती कि मेरे कारन तुझ पर आफत आवे।’

‘तो उनसे कहने ही कौन जाता है, और किसे मालूम होगा कि अन्दर तुम हो।’

ठकुराइन को ढाढ़स बंधा। सकुचाती हुई  तुलिया के साथ अन्दर आयी। उसका हृदय भारी था। जो एक विशाल पक्के की स्वामिनी थी, आज इस झोपड़ी में पड़ी हुई है।

घर में एक ही खाट थी, ठकुराइन बच्चे के साथ उस पर सोती। तुलिया जमीन पर पडी रहती। एक ही कम्बल था, ठकुराइन उसको ओढ़ती, तुलिया टाट का टुकड़ा ओढ़कर रात काटती। मेहमान का क्या सत्कार करे, कैसे रक्खे, यही सोचा करती। ठकुराइन के जुठे बरतन मांजना, कपड़े छांटना, उसके बच्चे को खिलाना ये सारे काम वह इतने उमंग से करती, मानो देवी की उपासना कर रही हो। ठकुराइन इस विपत्ति में भी ठकुराइन थी, गर्विणी, विलासप्रिय, कल्पनाहीन। इस तरह रहती थी मानो उसी का घर है और तुलिया पर इस तरह रोब जमाती थी मानो वह उसकी लौंडी है। लेकिन तुलिया अपने अभागे प्रेमी के साथ प्रीति की रीति का निबाह कर रही थी, उसका मन कभी न मैला होता, माथे पर कभी न बल पड़ता।

एक दिन ठकुराइन ने कहा—तुला, तुम बच्चे को देखती रहना, मैं दो-चार दिन के लिए जरा बाहर जाऊंगी। इस तरह तो यहां जिन्दगी-भर तुम्हारी रोटीयां तोड़ती रहूंगी, पर दिल की आग कैसे ठण्डी होगी? इस बेहया को इसकी भनक कहां कि उसकी भावज कहां चली गयी। वह तो दिल में खुश होगा कि अच्छा हुआ उसके मार्ग का कांटा हट गया। ज्यों ही पता चला कि मैं अपने मैके नहीं गयी, कहीं और पड़ी हूं, वह तुरन्त मुझे बदनाम कर देगा और तब सारा समाज उसी का साथ देगा। अब मुझे कुछ अपनी फिक्र करनी चाहिए।

तुलिया ने पूछा—कहां जाना चाहती हो बहिन? कोई हर्ज न हो तो मैं भी साथ चलूं। अकेली कहां जाओगी?

‘उस सांप को कुचलने के लिए कोई लाठी खोजूंगी।’

तुलिया इसका अर्थ न समझ सकी। उसके मुख की ओर ताकने लगी। ठकुराइन ने निर्लज्ज्ता के साथ कहा—तू इतनी मोटी-सी बात भी नहीं समझी! साफ-साफ ही सुनना चाहती है? अनाथ स्त्री के पास अपनी रक्षा का अपने रूप के सिवा दूसरा कौन अस्त्र है? अब उसी अस्त्र से काम लूंगी। जानती है, इस रूप के क्या दाम होंगे? 

 देवी पार्ट 2

इस भेड़िये का सिर। इस परगने का हाकिम जो कोई भी हो उसी पर मेरा जादू चलेगा। और ऐसा कौन मर्द है जो किसी युवती के जादू से बच सके, चाहे वह ऋषि ही क्यों न हो। धर्म जाता है जाय, मुझे परवाह नहीं। मैं यह नहीं देख सकती कि मैं बन-बन की पत्तियां तोडूं और वह शोहदा मूंछों पर ताव देकर राज करे।

तुलिया को मालूम हुआ कि इस अभिमानिनी के हृदय पर कितनी गहरी चोट हैं इस व्यथा को शान्त करने के लिए वह जान ही पर नहीं खेल रही है, धर्म पर खेल रही है जिसे वह प्राणों से भी प्रिय समझती है। बंसी सिंह की वह प्रार्थी मूर्ति उसकी आंखों के समाने आ खड़ी हुई। वह बलिष्ठ था,

अपनी फौलादी शक्ति से वह बड़ी आसानी के साथ तुलिया पर बल प्रयोग कर सकता था, ओर उस रात के सन्नाटे में उस आनाथा की रक्षा करने वाला ही कौन बैठा हुआ था। पर उसकी सतीत्व-भरी भर्त्सना ने बंसी सिंह को किस तरह मोहित कर लिया, जैसे कोई काला भयंकर नाग महुअर का सुरीला राग सुनकर मस्त हो गया हो। उसी सच्चे सूरमा की कुली-मर्यादा आज संकट में है। क्या तुलिया उस मार्यादा को लुटने देगी और कुछ न करेगी? नहीं-नहीं! अगर बंसी सिंह ने उसके सत् को अपने प्राणों से प्रिय समझा तो वह भी उसकी आबरू को अपने धर्म से बचायेगी।

उसने ठकुराइन को तसल्ली देते हुए कहा—अभी तुम कहीं मत जाओ बहिन पहले मुझे अपनी शक्ति आजमा लेने दो। मेरी आबरू चली भी गयी तो कौन हंसेगा। तुम्हारी आबरू के पीछे तो एक कुल की आबरू है।

ठकुराइन ने मुस्कराकर उसको देखा। बोली—तू यह कला क्या जाने तुलिया?

‘कौन-सी कला?’

‘यही मर्दों को उल्लू बनाने की।’

‘मैं नारी हूं?’

‘लेकिन पुरुषों का चरित्र तो नहीं जानती?’

‘यह तो हम-तुम दोनों मां के पेट से सीखकर आयी हैं।’

‘कुछ बता तो क्या करेगी?’

‘वही जो तुम करने जा रही हो। तुम परगने के हाकिम पर अपना जादू डालना चाहती हो, मैं तुम्हारे देवर पर ज़ाला फेंकूगी।’

‘बड़ा घाघ है तुलिया।’

‘यही तो देखना है।’

तुलिया ने बाकी रात कार्यक्रम और उसका विधान सोचने में काटी। कुशल सेनापति की भांति उसने धावे और मार-काट की एक योजना-सी मन में बना ली। उसे अपनी विजय का विश्वास था। शुत्रु निश्शंक था, इस धावे की उसे जरा भी खबर न थी।

बंसी सिंह का छोटा भाई गिरधर कंधे पर छ: फीट का मोटा लट्ठ रखे अकड़ता चला आता था कि तुलिया ने पुकारा—ठाकुर, तनिक यह घास का गट्ठा उठाकर मेरे सिर पर रख दो। मुझसे नहीं उठता।

दोपहर हो गया था। मजदूर खेतों में लौटकर आ चुके थे। बगूले उठने लगे थे। तुलिया एक पेड़ के नीचे घास का गट्ठा रखे खड़ी थी। उसके माथे से पसीने की धार बह रही थी।

ठाकुन ने चौंककर तुलिया की ओर देखां उसी वक्त तुलिया का अंचल खिसक गया और नीचे की लाल ब्रा झलक पड़ी। उसने झट अंचल सम्हाल लिया, पर उतावली में जूड़े में गुंथी हुई फूलों की बेनी बिजली की तरह आंखो में कौंद गयी। गिरधर का मन चंचली हो उठा। आंखों में हल्का-सा नशा पैदा हुआ और चेहरे पर हल्की-सी सुर्खी और हल्की-सी मुस्कराहट। नस-नस में संगीत-सा गूंज उठा।

उसने तुलिया को हजारों बार देखा था, प्यासी आंखों, ललचायी आंखों से, मगर तुलिया अपने रूप और सत् के घमण्ड में उसकी तरह कभी आंखें तक न उठाती थी। उसकी मुद्रा और ढंग में कुछ ऐसी रुखाई, कुछ ऐसी निठुरता होती थी कि ठाकुर के सारे हौसले पस्त हो जाते थे, सारा शौक ठण्डा पड़ जाता था। आकाश में उड़ने वाले पंछी पर उसके जाल और दाने का क्या असर हो सकता था? मगर आज वह पंछी सामने वाली डाली पर आ बैठा था और ऐसा जान पड़ता था कि भूखा है। फिर वह क्यों न दाना और जाल लेकर दौड़े।

उसने मस्त होकर कहा—मैं पहुंचाये देता हूं तुलिया, तू क्यों सिर पर उठायेगी।

‘और कोई देख ले तो यही कहे कि ठाकुर को क्या हो गया है?’

‘मुझे कुत्तों के भौंकने की परवा नहीं है।’

‘लेकिन मुझे तो है।’

ठाकुर ने न माना। गट्ठा सिर पर उठा लिया और इस तरह आकाश में पांव रखता चला मानो तीनों लोक का खजाना लूटे लिये जाता है।

एक महिना गुजर गया। तुलिया ने ठाकुर पर मोहिनी डाल दी थी और अब उसे मछली की तरह खेला रही थी। कभी बंसी ढीली कर देती, कभी कड़ी। ठाकुर शिकार करने चला था, खुद जाल में फंस गया। अपना इंसान और धर्म और प्रतिष्ठा सब कुछ दांव पर लगा कर वह देवी का वरदान न पा सकता था। तुलिया आज भी उससे उतनी ही दूर थी जितनी पहले।

एक दिन वह तुलिया से बोला—इस तरह कब तक जलायेगी तुलिया? चल कहीं भाग चलें।

तुलिया ने फंदे को और कसा—हां, और क्या। जब तुम मुंह फेर लो तो कहीं की न रहूं। दीन से भी जाऊं, दुनिया से भी!

ठाकुर ने शिकायत के स्वर में कहा—अब भी तुझे मुझ पर विश्वास नहीं आता?

‘भौंरे फूल का रस लेकर उड़ जाते हैं।’

‘और पतंगे जलकर राख नहीं हो जाते?’

‘बतियाऊं कैसे?’

‘मैंने तेरा कोई हुक्म टाला है कभी

‘तुम समझते होगे कि तुलिया को एक रंगीन साड़ी और दो-एक छोटे-मोटे गहने देकर फंसा लूंगा। मैं ऐसी भोली नहीं हूं।’

तुलिया ने ठाकुर के दिल की बात भांप ली थी। ठाकुर हैरत में आकर उसका मुंह ताकने लगा।

तुलिया ने फिर कहा—आदमी अपना घर छोड़ता है तो पहले कहीं बैठने का ठिकाना कर लेता है।

ठाकुर प्रसन्न होकर बोला—तो तू चलकर मेरे घर में मालकिन बनकर रह। मैं तुझसे कितनी बार कह चुका।

तुलिया आंखें मटकाकर बोली—आज मालकिन बनकर रहूं कल लौंडी बनकर भी न रहने पाऊं, क्यों?

‘तो जिस तरह तेरा मन भरे वह कर। मैं तो तेरा गुलाम हूं।’

‘बचन दे तो’

‘हां, देता हूं। एक बार नहीं, सौ बार, हजार बार।’

‘फिर तो न जाओगे?’

‘वचन देकर फिर जाना नामर्दों का काम है।’

‘तो अपनी आधी जमीन-जायदाद मेरे नाम लिख दो।’

ठाकुर अपने घर की एक कोठरी, दस-पांच बीघे खेत, गहने-कपड़े तो उसके चरणों पर चढ़ा देने को तैयार था, लेकिन आधी जायदाद उसके नाम लिख देने का साहस उसमें न था। कल को तुलिया उससे किसी बात पर नाराज हो जाय, तो उसे आधी जायदाद से हाथ धोना पड़े। ऐसी औरत का क्या एतबार! उसे गुमान तक न था कि तुलिया उसके प्रेम की इतनी कड़ी परीक्षा लेगी। उसे तुलिया पर क्रोध आया। यह चमार की बिटिया जरा सुन्दर क्या हो गयी है कि समझती है, मैं अप्सरा हूं। उसकी मुहब्बत केवल उसके रूप का मोह थी। वह मुहब्बत, जो अपने को मिटा देती है और मिट जाना ही अपने जीवन की सफलता समझती है, उसमें न थी।

उसने माथे पर बल लाकर कहा—मैं न जानता था, तुझे मेरी जमीन-जायदा से प्रेम है तुलिया, मुझसे नहीं!

तुलिया ने छूटते ही जवाब दिया—तो क्या मैं न जानती थी कि तुम्हें मेरे रूप और जवानी से ही प्रेम है, मुझसे नहीं?

‘तू प्रेम को बाजार का सौदा समझती है?’

‘हां, समझती हूं। तुम्हारे लिए प्रेम चार दिन की चांदनी होगी, मेरे लिए तो अंधेरा पाख हो जायगा। मैं जब अपना सब कुछ तुम्हें दे रही हूं तो उसके बदले में सब कुछ लेना भी चाहती हूं। तुम्हें अगर मुझसे प्रेम होता तो तुम आधी क्या पूरी जायदाद मेरे नाम लिख देते। मैं जायदाद क्या सिर पर उठा ले जाऊंगी? लेकिन तुम्हारी नीयत मालूम हो गयी। अच्छा ही हुआ। भगवान न करे कि ऐसा कोई समय आवे, लेकिन दिन किसी के बराबर नहीं जाते, अगर ऐसा कोई समय आया कि तुमको मेरे सामने हाथ पसारना पड़ा तो तुलिया दिखा देगी कि औरत का दिल कितना उदार हो सकता है।’

तुलिया झल्लायी हुई वहां से चली गयी, पर निराश न थी, न बेदिल। जो कुछ हुआ वह उसके सोचे हुए विधान का एक अंग था। इसके आगे क्या होने वाला है इसके बारे में भी उसे कोई सन्देह न था।

ठाकुर ने जायदाद तो बचा ली थी, पर बड़े मंहगे दामो पर उसके दिल का इत्मीनान गायब हो गया था। जिन्दगी में जैसे कुछ रह न गया हो। जायदाद आंखों के समाने थी, तुलिया दिल के अन्दर। तुलिया जब रोज समाने आकर अपनी तिर्छी चितवनों से उसके हृदय में बाण चलाती थी, तब वह ठोस सत्य थी। अब जो तुलिया उसके हृदय में बैठी हुई थी, वह स्वप्न थी जो सत्य से कहीं ज्यादा मादक है, विदरक है।

कभी-कभी तुलिया स्वप्न की एक झलक-सी नजर आ जाती, और स्वप्न ही की भांति विलीन भी हो जाती। गिरधर उससे अपने दिल का दर्द कहने का अवसर ढूंढ़ता रहता लेकिन तुलिया उसके साये से भी परहेज करती। गिरधर को अब अनुभव हो रहा था कि उसके जीवन को सूखी बनाने के लिए उसकी जायदाद जितनी जरूरी है, उससे कहीं ज्यादा जरूरी तुलिया है। उसे अब अपनी कृपणता पर क्रोध आता। जायदाद क्या तुलिया के नाम रही, क्या उसके नाम। इस जरा-सी बात में क्या रक्खा है। तुलिया तो इसलिए अपने नाम लिखा रही थी कि कहीं मैं उसके साथ बेवफाई कर जाऊं तो वह अनाथ न हो जाय। जब मैं उसका बिना कौड़ी का गुलाम हूं तो बेवफाई कैसी? मैं उसके साथ बेवफाई करूंगा, जिसकी एक निगाह के लिए, एक शब्द के लिए तरसता रहता हूं। कहीं उससे एक बार एकान्त में भेंट हो जाती तो उससे कह देता—तूला, मेरे पास जो कुछ है, वह सब तुम्हारा है। कहो बखशिशनामा लिख दूं, कहो बयनामा लिख दूं। मुझसे जो अपराध हुआ उसके लिए नादिम हूं। जायदाद से मनुष्य को जो एक संस्कार-गत प्रेम है, उसी ने मेरे मुंह से वह शब्द निकलवाये। यही रिवाजी लोभ मेरे और तुम्हारे बीच में आकर खड़ा हो गया। पर अब मैंने जाना कि दुनिया में वही चीज सबसे कीमती है जिससे जीवन में आनन्द और अनुराग पैदा हो। अगर दरिद्रता और वैराग्य में आनन्द मिले तो वही सबसे प्रिय वस्तु है, जिस पर आदमी जमीन और मिल्कियत सब कुछ नष्ट कर देगा। आज भी लाखों माई के लाल हैं, जो संसार के सुखों पर लात मारकर जंगलों और पहाड़ों की सैर करने में मस्त हैं। और उस वक्त मैं इतनी मोटी-सी बात न समझा। हाय रे दुर्भाग्य!

एक दिन ठाकुर के पास तुलिया ने पैगाम भेजा—मैं बीमार हूं, आकर देख जाव, कौन जाने बचूं कि न बचूं।

इधर कई दिन से ठाकुर ने तुलिया को न देखा था। कई बार उसके द्वार के चक्कर भी लगाए, पर वह न दीख पड़ी। अब जो यह संदेशा मिला तो वह जैसे पहाड़ से नीचे गिर पड़ा। रात के दस बजे होंगे। पूरी बात भी न सुनी और दौड़ा। छाती धड़क रही थी और सिर उड़ा जाता था, तुलिया बीमार है! क्या होगा भगवान्! तुम मुझे क्यों नहीं बीमार कर देते? मैं तो उसके बदले मरने को भी तैयार हूं। दोनों ओर के काले-काले वृक्ष मौत के दूतों की तरह दौड़े चले आते थे। रह-रहकर उसके प्राणों से एक ध्वनि निकलती थी, हसरत और दर्द में डूबी हुई—तुलिया बीमार है!

उसकी तुलिया ने उसे बुलाया है। उस कृतघ्नी, अधम, नीच, हत्यारे को बुलाया है कि आकर मुझे देख जाओ, कौन जाने बचूं कि न बचूं। तू अगर न बचेगी तुलिया तो मैं भी न बचूंगा, हाय, न बचूंगा!! दीवार से सिर फोड़कर मर जाऊंगा। फिर मेरी और तेरी चिता एक साथ बनेगी, दोनों के जनाजे एक साथ निकलेंगे।

उसने कदम और तेज किए। आज वह अपना सब कुछ तुलिया के कदमों पर रख देगा। तुलिया उसे बेवफा समझती है। आज वह दिखाएगा, वफा किसे कहते हैं। जीवन में अगर उसने वफा न की तो मरने के बाद करेगा। इस चार दिन की जिन्दगी में जो कुछ न कर सका वह अनन्त युगों तक करता रहेगा। उसका प्रेम कहानी बनकर घर-घर फैल जाएगा।

मन में शंका हुई, तुम अपने प्राणों का मोह छोड़ सकोगे? उसने जोर से छाती पीटी ओर चिल्ला उठा—प्राणों का मोह किसके लिए? और प्राण भी तो वही है, जो बीमार है। देखूं मौत कैसे प्राण ले जाती है, और देह को छोड़ देती है।

उसने धड़कते हुए दिल और थरथराते हुए पांवों से तुलिया के घर में कदम रक्खा। तुलिया अपनी खाट पर एक चादर ओढ़े सिमटी पड़ी थी, और लालटेन के अन्धे प्रकाश में उसका पीला मुख मानो मौत की गोद में विश्राम कर रहा था।

उसने उसके चरणों पर सिर रख दिया और आंसुओं में डूबी हुई आवाज से बोला—तूला, यह अभाग तुम्हारे चरणों पर पड़ा हुआ है। क्या आंखें न खोलेगी?

तुलिया ने आंखें खोल दीं और उसकी ओर करुण दृष्टि डालकर कराहती हुई बोली—तुम हो गिरधर सिंह, तुम आ गए? अब मैं आराम से मरूंगी। तुम्हें एक बार देखने के लिए जी बहुत बेचैन था। मेरा कहा-सुना माफ कर देना और मेरे लिए रोना मत। इस मिट्टी की देह में क्या रक्खा है गिरधर! वह तो मिट्टी में मिल जाएगी। लेकिन मैं कभी तुम्हारा साथ न छोडूंगी। परछाईं की तरह नित्य तुम्हारे साथ रहूंगी। तुम मुझे देख न सकोगे, मेरी बातें सुन न सकोगे, लेकिन तुलिया आठों पहर सोते-जागते तुम्हारे साथ रहेगी। मेरे लिए अपने को बदनाम मत करना गिरधर! कभी किसी के सामने मेरा नाम जबान पर न लाना। हां, एक बार मेरी चिता पर पानी के छींटे मार देना। इससे मेरे हृदय की ज्वाला शान्त हो जायगी।

गिरघर फूट-फूटकर रो रहा था। हाथ में कटार होती तो इस वक्त जिगर में मार लेता और उसके सामने तड़पकर मर जाता।

जरा दम लेकर तुलिया ने फिर कहा—मैं बचूंगी नहीं गिरधर, तुमसे एक बिनती करती हूं, मानोगी?

गिरधर ने छाती ठोककर कहा—मेरी लाश भी तेरे साथ ही निकलेगी तुलिया। अब जीकर क्या करूंगा और जिऊं भी तो कैसे? तू मेरा प्राण हे तुलिया।

उसे ऐसा मालूम हुआ तुलिया मुस्कराई।

‘नहीं-नहीं, ऐसी नादानी मत करना। तुम्हारे बाल-बच्चे हैं, उनका पालन करना। अगर तुम्हें मुझसे सच्चा प्रेम है, तो ऐसा कोई काम मत करना जिससे किसी को इस प्रेम की गन्ध भी मिले। अपनी तुलिया को मरने के पीछे बदनाम मत करना।

गिरधर ने रोकर कहा—जैसी तेरी इच्छा।

‘मेरी तुमसे एक बिनती है।’

‘अब तो जिऊंगी ही इसीलिए कि तेरा हुक्म पूरा करूं, यही मेरे जीवन का ध्येय होगा।’

‘मेरी यही विनती है कि अपनी भाभी को उसी मान-मार्यादा के साथ रखना जैसे वह बंसीसिंह के सामने रहती थी। उसका आधा उसको दे देना।

‘लेकिन भाभी तो तीन महीने से अपने मैके में है, और कह गई है कि अब कभी न आऊंगी।’

‘यह तुमने बुरा किया है गिरधर, बहुत बुरा किया है। अब मेरी समझ में आया कि क्यों मुझे बुर-बुरे सपने आ रहे थे। अगर चाहते हो कि मैं अच्छी हो जाऊं, तो जितनी जल्दी हो सके, लिखा-पढ़ी करके कागज-पत्तर मेरे पास रख दो। तुम्हारी यह बददियानती ही मेरी जान का गाहक हो रही है। अब मुझे मालूम हुआ कि बंसीसिंह क्यों मुझे बार-बार सपना देते थे। मुझे और कोई रोग नहीं है। बंसीसिंह ही मुझे सता रहे हैं। बस, अभी जाओ। देर की तो मुझे जीता न पाओगे। तुम्हारी बेइन्साफी का दंड बंसीसिंह मुझे दे रहे हैं।’

गिरधर ने दबी जबान से कहा—लेकिन रात को कैसे लिखा-पढ़ी होगी तूली। स्टाम्प कहां मिलेगा? लिखेगा कौन? गवाह कहां हैं?

‘कल सांझ तक भी तुमने लिखा-पढ़ी कर ली तो मेरी जान बच जाएगी, गिरधर। मुझे बंसीसिंह लगे हुए हैं, वही मुझे सता रहे हैं, इसीलिए कि वह जानते हैं तुम्हें मुझसे प्रेम है। मैं तुम्हारे ही प्रेम के कारन मारी जा रही हूं। अगर तुमने देर की तो तुलिया को जीता न पाओगे।’

‘मैं अभी जाता हूं तुलिया। तेरा हुक्म सिर और आंखों पर। अगर तूने पहले ही यह बात मुझसे कह दी होती तो क्यों यह हालत होती? लेकिन कहीं ऐसा न हो, मैं तुझे देख न सकूं और मन की लालसा मन में ही रह जाय।’

‘नहीं-नहीं, मैं कल सांझ तक नहीं मरूंगी, विश्वास रक्खो।’

गिरधर उसी छन वहां से निकला और रातों-रात पच्चीस कोस की मंजिल काट दी। दिन निकलते-निकलते सदर पहुंचा, वकीलों से सलाह-मशविरा किया, स्टाम्प लिया, भावज के नाम आधी जायदाद लिखी, रजिस्ट्री कराई, और चिराग जलते-जलते हैरान-परीशान, थका-मांदा, बेदाना-पानी, आशा और दुराशा से कांपता हुआ आकर तुलिया के सामने खड़ा हो गया। रात के दस बज गए थे। उस ववत न रेलें थीं, न लारियां, बेचारे को पचास कोस की कठिन यात्रा करनी पड़ी। ऐसा थक गया था कि एक-एक पग पहाड़ मालूम होता था। पर भय था कि कहीं देर तो अनर्थ हो जाएगा।

तुलिया ने प्रसन्न मन से पूछा—तुम आ गए गिरधर? काम कर आए?

देवी पार्ट 3 
गिरधर ने कागज उसके सामने रख दिया और बोला—हां तूला, कर आया, मगर अब भी तुम अच्छी न हुई तो तुम्हारे साथ मेरी जान भी जायगी। दुनिया चाहे हंसे, चाहे रोये, मुझे परवाह नहीं है। कसम ले लो, जो एक घूंट पानी भी पिया हो।
तुलिया उठ बैठी और कागज को अपने सिरहाने रखकर बोली—अब मैं बहुत अच्छी हूं। सबेरे तक बिलकुल अच्छी हो जाऊंगीं तुमने मेरे साथ जो नेकी की है, वह मरते दम तक न भूलूंगी। लेकिन अभी-अभी मुझे जरा नींद आ गई थी। मैंने सपना देखा कि बंसीसिंह मेरे सिरहाने खड़े हैं और मुझसे कह रहे हैं, तुलिया, तू ब्याहता है, तेरा आदमी हजार कोस पर बैठा तेरे नाम की माला जप रहा 


तुलिया, तू ब्याहता है, तेरा आदमी हजार कोस पर बैठा तेरे नाम की माला जप रहा है। चाहता तो दूसरी कर लेता, लेकिन तेरे नाम पर बैठा हुआ है और जन्म-भर बैठा रहेगा। अगर तूने उससे दगा की तो मैं तेरा दुश्मन हो जाऊंगा, और फिर जान लेकर ही छोडूंगा। अपना भला चाहती है तो अपने सत् पर रह। तूने उससे कपट किया, उसी दिन मैं तेरी सांसत कर डालूंगा। बस, यह कहकर वह लाल-लाल आंखों से मुझे तरेरते हुए चले गए।
गिरधर ने एक छन तुलिया के चेहरे की तरफ देखा, जिस पर इस समय एक दैवी तेज विराज रहा था, एकाएक जैसे उसकी आंखों के सामने से पर्दा हट गया और सारी साजिश समझ में आ गई। उसने सच्ची श्रद्धा से तुलिया के चरणों को चूमा और बोला—समझ गया तुलिया, तू देवी है।

Deepak kumar

Monday, October 2, 2023

दलित महिला ने ठाकुरों का डटकर सामना किया || दलित उत्पीड़न की कहानी

दलित महिला ने ठाकुरों का डटकर सामना किया || दलित उत्पीड़न की कहानी

 दलितों की पीड़ा और दलितों के साथ होने वाले शोषण अत्याचार के चलते हमने आज की वीडियो में एक दलित महिला की कहानी को सामिल किया है यह कहानी उनके जीवन पर आधारित है और आपको जुल्म और शोषण के खिलाफ अपनी आवाज को डटकर सामना करने की हिम्मत देती है 



एक दलित महिला की कहानी 

दलित महिला ने ठाकुरों का डटकर सामना किया 

दलित उत्पीड़न की कहानी

ये कहानी है उत्तर प्रदेश के जालौन के नरहान गांव की रहने वाली रीता देवी की। यह कहानी डाकू बनी फूलन देवी के गांव के ठीक पड़ोस के गांव की है।